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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    चंद्रबाबू का चुनावी पैतरा!

    By March 9, 2018Updated:March 9, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    Post Views: 527

    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

    आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के एक वर्ष पहले तेलगु देशम ने केंद्रीय मंत्री परिषद से हटने का निर्णय लिया। मुख्यमंत्री और तेलगु देशम के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के फैसले पर किसी शायर की यह लाइन सटीक बैठती है–

    रात भर पी
    सुबह तौबा कर ली।
    रिन्द के रिन्द रहे,
    हाँथ से जन्नत न गई।।

    चार वर्ष तक चंद्रबाबू नायडू को जिस गठबन्धन पर पूरा विश्वास था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर वह आंध्र प्रदेश के विकास का दावा कर रहे थे, उन्हीं से शिकवा शिकायत होने लगी। नायडू जानते है कि उनकी बातों का कोई महत्व नहीं है। किसी भी केंद्र सरकार के लिए उनकी मांग पूरी करना संभव नहीं है। फिर भी चंद्रबाबू दिखावे के लिए भाजपा से अलगाव का राग अलाप रहे है। वैसे यह उनकी फितरत भी है। पहले भी वह राजग के साथ ऐसा कर चुके है। लेकिन तब उन्हें इस पैतरे का नुकसान उठाना पड़ा था। वह विधानसभा चुनाव में पराजित हुए थे। लेकिन अपने ही उदाहरण से उन्होंने सबक नहीं लिया। एक बार फिर वह जोखिम उठाने जा रहे है।

    चंद्रबाबू नायडू को एकदम से ख्याल आया कि केंद्र सरकार आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा नहीं दे रही है। फिर क्या था, इसी मांग को लेकर उन्होंने केंद्रीय मंत्रिपरिषद से अपने मंत्री हटा लेने का फरमान सुना दिया। नायडू ने जानबूझ कर ऐसा मसला चुना है, जिसे पूरा नहीं किया जा सकता। इसे वह विधानसभा चुनाव तक दोहराना चाहते है। वह बताएंगे कि आंध्र के लिए विशेष दर्जा और विशेष सहायता मांग रहे थे, लेकिन नहीं मिली। इस आधार पर वह अपनी कमिया भी छिपाने का प्रयास करेंगे। लेकिन मतदाता इन नेताओं से ज्यादा समझदार है। वह वास्तविकता समझते है। इसी के चलते नायडू को अटल बिहारी वाजपेयी के समय भी नुकसान उठाना पड़ा था।

    विधानसभा चुनाव के पहले अलगाव के ऐसे पैंतरे संबंधित पार्टी और नेता के प्रति अविश्वास ही बढ़ाते है। इसे अवसरवादी निर्णय माना जाता है। चार वर्ष तक जिस गठबन्धन या सरकार में रहने पर आपत्ति नहीं थी, उसे विधानसभा चुनाव के मद्देनजर छोड़ना अनैतिक माना जाता है। मित्रता ऐसी होनी चाहिए जो इम्तिहान तक साथ रहे। यह बात निजी रिश्तों में ही नहीं, राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है। इसमें लाभ हानि की चिंता किये बिना जनता के सामने जाना चाहिए।

    भारतीय जनता पार्टी इसका उदाहरण भी पेश कर चुकी है। पंजाब विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा को अकाली दल से अलग होकर चुनाव लड़ने के सुझाव मिले थे। तब सत्तारूढ़ अकाली दल के प्रति लोगों की नाराजगी बताई जा रही थी। भाजपा का रिकॉर्ड बढ़िया था। लेकिन भाजपा ने इस सुझाव पर अमल नहीं किया। पांच वर्ष वह अकेली दल के साथ सत्ता में रही थी । चुनाव से पहले पैतरा बदलना भाजपा को मंजूर नहीं था। वह जानती थी कि चुनाव में नुकसान होगा। लेकिन मतदाताओं के साथ कोई धोखा नही किया। गठबन्धन धर्म का निर्वाह किया। नवजोत सिंह सिद्धू जैसे तत्कालीन भाजपा सांसद अवसरवादी निकले। वह अकाली मुद्दे पर भाजपा को छोड़ गए,लेकिन भाजपा ने समझौते का सम्मान किया।
    किन्तु चंद्रबाबू इस गठबंधन धर्म का निर्वाह नही कर सके। वह वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगनमोहन रेड्डी द्वारा मिल रही चुनौती से चंद्रबाबू परेशान है। इसके मद्देनजर वह दोहरी चाल चल रहे है। एक यह कि विशेष दर्जे की मांग पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद से अलग हो गए। दूसरा यह कि राजग में बने रहने का निर्णय लिया। मंत्रिपरिषद से अलग होकर वह बताना चाहते है कि विशेष दर्जे के लिए बड़ा त्याग किया है। वही राजग में बने रहने के पीछे भी उनका भय है। उन्हें लगता है कि वह राजग से अलग होंगे तो जगनमोहन को भाजपा से चुनावी गठबन्धन का मौका मिल जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की आंध्र प्रदेश में ताकत बढ़ी है। यदि जगनमोहन से समझौता होता है,तो इस गठबंधन की स्थिति तेलगु देशम के मुकाबले मजबूत हो जाएगी।

    फिलहाल चन्द्र बाबू और जगनमोहन के बीच विवादचरम पर है। दोनो ने एक दूसरे पर आर्थिक अनियमितता के आरोप लगाए है। यह शिकायत प्रधानमंत्री तक पहुंच गई है।

    बताया जा रहा है कि केंद्र ने चंद्रबाबू की मांग को गंभीरता से न लेने का फैसला लिया है। विशेष दर्जा अंतिम विकल्प होता है। यदि आंध्र को मिला, तो अन्य राज्य भी इसकी मांग करेंगे। ऐसे में केंद्र के फैसले को गलत नहीं कहा जा सकता। मोदी सरकार नीति आयोग के माध्यम से राज्यो को भरपूर सहायता देने को तैयार है। इसी का सही उपयोग राज्य सरकारों को करना चाहिए। लेकिन चंद्रबाबू ने चुनावी मुद्दे के रूप में विशेष दर्जे का मुद्दा उठाया है। तेलगु देशम के दोनों मंत्रियों अशोक गणपति राजू और वाईएस चौधरी ने केंद्रीय मंत्री परिषद से त्यागपत्र दे दिया। इसका केंद्र सरकार पर कोई असर नहीं होगा। लेकिन चंद्रबाबू नायडू को इसका नुकसान अवश्य होगा।

    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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