अंतरिक्ष में एक और छलांग

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चंद्रयान-3 के प्रक्षेपण की घोषणा

हमारे मानवीय सभ्यता के प्रारम्भिक काल से ही आकाश और अंतरिक्ष हमारे लिये रहस्यभय बना हुआ है। मानव सभ्यता के विकास के चर्मोउत्कर्ष तक आते -आते वैज्ञानिकों ने हमारे सौरमंडल के ग्रहों एवं उनकी स्थितियों के बारे में पता अवश्य लगा लिया हैं, लेकिन अभी भी अनेकों ग्रहों के विषय मे सटीक जानकारी अभी वैज्ञानिकों के पास उपलब्ध नही है। चंद्रमा एवं मंगल जैसे ग्रहों के विषय में हमारे पास जो जानकारियां उपलब्ध हैं, उसे हम विल्कुल सटीक नही कह सकते हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र “इसरो” इस क्षेत्र में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर चुका है। विशेषतः उपग्रह प्रक्षेपण के मामले में इसरो न सिर्फ अत्मनिर्भर बन चुका है, बल्कि इस कारोबार में दुनिया के अन्य विकसित देशों से होड़ लेने में वह पीछे नही है। इसी क्रम में चंद्रमा एवं अन्य ग्रहों पर बस्तियां निर्मित करने के मामले को लेकर वह इस क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान कार्य कर रहा हैं। अभी पिछले ही दिनों चंद्रयान-2 अपनी मंजिल के करीब पहुंच कर नष्ट हो जाने जैसे दुर्घटना से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के वैज्ञानिक हताश होने के स्थान पर इसरो ने अगले वर्ष चंद्रयान-3 के प्रक्षेपण की घोषणा कर दी है। इसके अतिरिक्त एक गगनयान भेजने की भी घोषणा कर दी है। गगनयान में यात्रा करने वाले चार वैज्ञानिकों को चिह्नित भी कर लिया गया है, जिनका रूस में प्रशिक्षण लेना भी शुरू हो जायेगा। इसरो अपने गगनयान मिशन के लिए रूस एवं फ्रांस से सहयोग प्राप्त करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर भी किये है। यह पहला इस अंतरिक्षयान की खास बात यह है कि इस यान में भारत स्वमं के दम पर अपने वैज्ञानिकों को अध्ययन के लिए अंतरिक्ष में भेजेगा। इस तरह भारत अमेरिका, रूस एवं चीन जैसे देशों की कतार में आ खड़ा होगा जो अपने ही वल पर अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों को भेज कर अध्ययन करने में सक्षम है।

पूरी दुनियां में किसी भी देश की ताकत इस बात से आंकलन करने की परम्परा कायम है कि उसके वैज्ञानिको की क्या-क्या उपलब्धियां हैं। हमारे देश ने अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर तीब्र गति से सम्पूर्ण विश्व के उन विकसित देशों की कतार में अपने आप को ला खड़ा किया है। हमारे देश के विज्ञान ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अनेको विषम परिस्थितियों के बावजूद कई तरह के उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। अंतरिक्ष मे उपग्रहों को प्रक्षेपित करने से लेकर प्रक्षेपण यानो को अपने देश मे निर्मित करने के लिए उसे रूस जैसे देशों से राकेट के इंजन को खरीदना पड़ता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान रूस के इंजन देने से इनकार कर दिये जाने के बाद से इसरो के वैज्ञानिकों ने अपना इंजन विकसित कर प्रक्षेपण यान को सफलतापूर्वक अपने यहां ही निर्मित कर लिया।

अब इसरो दुनिया के तमामों विकसित देशों की अपेक्षा सस्ती दरों पर ही उपग्रह भेजने लगा। है। अंतरिक्ष की वास्तविक स्थितियों को पता लगाने के लिए अंतरिक्ष यान में वैज्ञानिकों को भी भेजना नितान्त आवश्यकता महसूस किया जाने लगा क्योंकि केवल कैमरे से खींची गई तस्वीरों के सहारे ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना तो कठिन होता ही है इसके साथ ही अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों को भेजना भी जोखिम भरा होता है, इसके लिए गहन प्रशिक्षण और अचूक तकनीको की आवश्यकता पड़ती है फिर भी हमारे देश ने भारत यह सभी तरह की काबलियत हासिल कर लिया है, यह निस्संदेह ही हमारे देश एवं देशवासियों ले लिए बड़े ही गर्व की बात है।

  • प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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