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    Home»राजनीति

    सोनिया गांधी का समर्पण और आज की कुर्सी-लोलुप सियासत

    ShagunBy ShagunJune 7, 2026Updated:June 7, 2026 राजनीति No Comments8 Mins Read
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    एक तरफ आज की राजनीति है जहाँ देश के भविष्य के रोने और चिल्लाने पर भी सत्ता का मोह नहीं छूटता, और दूसरी तरफ सोनिया गांधी का वह चरित्र है जिन्होंने खुद चलकर आते हुए प्रधानमंत्री पद को मुस्कुराते हुए ठुकरा दिया था। सोनिया गांधी के इस महान त्याग, सर्वोच्च बलिदान और हिंदुस्तान के लिए उनके संपूर्ण समर्पण की कहानी किसी एक दल की सीमा में नहीं बांधी जा सकती…

    राम प्रताप गुप्ता

    भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास में त्याग, धैर्य और समर्पण की जब भी निष्पक्ष समीक्षा होगी, सोनिया गांधी का नाम एक असाधारण और विरल अध्याय के रूप में दर्ज किया जाएगा। सत्ता की आपाधापी, कुर्सी की अंतहीन दौड़ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के इस कोलाहल भरे दौर में, किसी का सत्ता के शिखर पर पहुंचकर उसे सहजता से ठुकरा देना मानवीय गरिमा की एक अद्भुत मिसाल है। यदि हम भारत या किसी भी अन्य देश के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अतीत के पन्नों को पलटें, तो वहाँ सिंहासन और राजपाट के लिए संघर्ष की एक लंबी और रक्तरंजित परंपरा दिखाई देती है। द्वापर युग का महाभारत, अपनों के बीच राजपाट के लिए लड़े गए विनाशकारी युद्ध का ऐसा जीवंत उदाहरण है जिसकी विभीषिका से इतिहास आज तक कांप उठता है। वहीं, त्रेता युग के रामायण में माता कैकेयी द्वारा अपने पुत्र भरत के मोह में आकर न्यायसंगत उत्तराधिकारी भगवान राम के लिए चौदह वर्ष का कठोर वनवास मांगना, पुत्र-मोह और सत्ता-लोभ की शाश्वत मानवीय कमजोरी को दर्शाता है।

    लेकिन, आधुनिक भारत के इतिहास ने एक ऐसा भी अभूपूर्व दौर देखा जब सत्ता के सारे स्थापित नियम उलट गए। साल 2004 के आम चुनावों में जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को स्पष्ट बहुमत मिला, तो पूरे देश और वैश्विक मीडिया को पूरा विश्वास था कि सोनिया गांधी ही भारत की अगली प्रधानमंत्री बनेंगी। राष्ट्रपति भवन से बुलावा आ चुका था और वे सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर कदम रखने ही वाली थीं, लेकिन 18 मई 2004 को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में उन्होंने अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। यह त्याग केवल अपने लिए पद छोड़ना भर नहीं था, बल्कि उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में अपने पुत्र राहुल गांधी को भी सत्ता सौंपने की कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। इसके विपरीत, उन्होंने देश की कमान एक प्रखर अर्थशास्त्री और बेहद शालीन छवि वाले नेता डॉ. मनमोहन सिंह को सौंप दी। धरती जैसा धैर्य और मातृत्व की ऐसी अप्रतिम गरिमा, जो सत्ता के तात्कालिक मोह से ऊपर उठकर देश हित को चुने, वास्तव में इस धरा पर विरल है।

    सोनिया गांधी और राजीव गांधी के जीवन का अवलोकन करें, तो स्पष्ट होता है कि दोनों में से किसी की भी रुचि सक्रिय राजनीति में कभी नहीं थी। राजीव गांधी एक पेशेवर पायलट के रूप में अपनी शांत, सुंदर और एकांत जिंदगी जी रहे थे और सोनिया जी एक समर्पित गृहणी के रूप में अपने छोटे से परिवार को संभाल रही थीं। लेकिन नियति की योजना कुछ और ही थी। 31 अक्टूबर 1984 का वह काला दिन, जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके ही आवास पर गोलियों से छलनी कर क्रूर हत्या कर दी गई, उसने सब कुछ बदल कर रख दिया। देश एक गहरे संकट में था, ऐसे में राजीव गांधी को बेहद अनमने मन से, केवल देश को संभालने और अपनी मां की विरासत को अक्षुण्ण रखने के लिए राजनीति के कांटों भरे मैदान में उतरना पड़ा। सोनिया गांधी उस समय इस फैसले के सख्त खिलाफ थीं, क्योंकि वे राजनीति की क्रूरता और उसके प्राणघातक खतरों से अच्छी तरह वाकिफ थीं।

    उनकी यह आशंका 21 मई 1991 को तब सच साबित हुई, जब तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक आत्मघाती आतंकी हमले में उनके जीवनसाथी राजीव गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई। सोनिया गांधी का पूरा संसार उजड़ चुका था। इस गहरे आघात के बाद उन्होंने खुद को राजनीति से पूरी तरह दूर कर लिया। लेकिन 90 के दशक के उत्तरार्ध में जब कांग्रेस बिखर रही थी और देश के सामने एक मजबूत लोकतांत्रिक विमर्श को बचाए रखने की चुनौती थी, तो कार्यकर्ताओं के भारी दबाव में उन्होंने मजबूरन और बेहद अनमने मन से राजनीति में कदम रखा। यह कदम भी सत्ता की भूख से नहीं, बल्कि देश के प्रति कर्तव्य के अहसास से प्रेरित था। इटली की धरती पर जन्मीं सोनिया गांधी ने जब भारत को अपना घर बनाया, तो उन्होंने यहाँ की संस्कृति को सिर्फ अपनाया नहीं, बल्कि उसे अपनी आत्मा में बसा लिया। राजनीति के शीर्ष पर रहते हुए भी उनकी बोली और व्यवहार में सदैव एक विशिष्ट नम्रता और शालीनता रही। उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में, पक्ष हो या विपक्ष, किसी भी नेता के खिलाफ कभी अमर्यादित शब्दों का प्रयोग नहीं किया।Sonia Gandhi’s dedication versus today’s power-hungry politics.

    लेकिन इस महान त्याग और शालीनता के विपरीत, आज की समकालीन राजनीति का परिदृश्य एक बेहद चिंताजनक और स्याह तस्वीर पेश करता है। कहाँ वो दौर था जब शुचिता और नैतिक जिम्मेदारी राजनीति का मूल तत्व हुआ करती थी, और कहाँ आज का दौर है जहाँ ‘सिद्धांत नहीं, बल्कि कुर्सी का मोह’ सर्वोपरि हो चुका है। वर्तमान समय में नैतिक जिम्मेदारी और राजनीतिक शुचिता के मायने पूरी तरह बदल चुके हैं। आज व्यवस्था की बड़ी से बड़ी खामी, नीतिगत विफलताओं और भ्रष्टाचार के संगीन मामलों के बाद भी किसी मंत्री या जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति के भीतर से इस्तीफे की आवाज नहीं गूंजती। अंतरात्मा की आवाज सुनना तो दूर, आज की सत्ता का आचरण पूरी तरह संवेदनहीन हो चुका है।

    इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ के रूप में सामने आ रहा है। देश की तमाम प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाएं आज भ्रष्टाचार, पेपर लीक और घोटालों की भेंट चढ़ रही हैं। महीनों-सालों तक रात-दिन एक कर, अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई लगाकर तैयारी करने वाले बेरोजगार युवा आज अवसाद और आत्महत्या की कगार पर खड़े होने को मजबूर हैं। हाल ही में सीजेपी के नेतृत्व में लाखों युवाओं ने देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। अपनी आँखों में टूटते सपनों का दर्द और व्यवस्था के प्रति आक्रोश लिए इन युवाओं ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग की, ताकि जवाबदेही तय हो सके। लेकिन अफ़सोस, सत्ता की बहरी हो चुकी दीवारों से इस चीख की कोई सुनवाई नहीं हुई। नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ने की स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा अब गुजरे जमाने की बात बन चुकी है। आज गलतियाँ होने पर, युवाओं का भविष्य बर्बाद होने पर भी मंत्रियों को अपनी कुर्सी से चिपके रहने का मोह है, जो यह दिखाता है कि समकालीन राजनीति जनहित से कितनी दूर जा चुकी है।

    आज भाषाई मर्यादा का स्तर भी लगातार पाताल की ओर गिरा है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे ज़िम्मेदार लोगों के पास जैसे विपक्ष के नेताओं के लिए अपशब्दों का एक अंतहीन भंडार है। जब से देश की राजनीतिक फिजा बदली है, तब से कड़वाहट का बोलबाला हो गया है। यह एक कड़वा सच है कि जो राजा आचरण करता है, वही उसके मातहत और कार्यकर्ता सीखते हैं। देश के सर्वोच्च पद पर बैठकर जब सोनिया गांधी जैसी सम्मानित महिला, जिसने देश के लिए अपना सब कुछ खो दिया, उन्हें “बार बाला” कहकर संबोधित और प्रचारित किया जाता रहा, तो यह कृत्य उस नेतृत्व और उसके समर्थकों के संस्कारों के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर देता है। भारत एक ऐसा देश है जहां नारी को देवी और शक्ति का रूप माना जाता रहा है, लेकिन आज बिना अमर्यादित शब्दों के जैसे सियासत संभव ही नहीं लगती। राजनीति में वैचारिक मतभेद लोकतांत्रिक विमर्श की आत्मा है, लेकिन जब विरोध व्यक्तिगत कीचड़ उछालने और किसी महिला के स्त्रीत्व को अपमानित करने पर उतर आए, तो यह पूरे समाज को शर्मसार करता है।

    एक तरफ आज की राजनीति है जहाँ देश के भविष्य के रोने और चिल्लाने पर भी सत्ता का मोह नहीं छूटता, और दूसरी तरफ सोनिया गांधी का वह चरित्र है जिन्होंने खुद चलकर आते हुए प्रधानमंत्री पद को मुस्कुराते हुए ठुकरा दिया था। सोनिया गांधी के इस महान त्याग, सर्वोच्च बलिदान और हिंदुस्तान के लिए उनके संपूर्ण समर्पण की कहानी किसी एक दल की सीमा में नहीं बांधी जा सकती। धार्मिक ग्रंथों के पात्रों या ऐतिहासिक नायकों से उनका यह मौन त्याग कहीं आगे निकल जाता है, जिसने आधुनिक भारत की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। एक विदेशी मूल की महिला का भारत आकर यहाँ की मिट्टी से ऐसा अनन्य, सच्चा और अटूट प्रेम करना कि वह अपने जीवन के सबसे बड़े व्यक्तिगत दुखों के बाद भी इसी देश की सेवा में मुस्कुराते हुए जुटी रही, अपने आप में एक हृदयस्पर्शी मिसाल है, जो आज की स्वार्थी और कुर्सी-लोलुप राजनीति को आईना दिखाती रहेगी। (लेखक वरिष्ठ व अनुभवी राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ हैं )

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