करंट विश्लेषण: जी के चक्रवर्ती
अभी देश के दो राज्यों हरियाणा एवं महाराष्ट्र में समपन्न हुये विधान सभा चुनावों के नतीजे अनुमान के ठीक विपरीत आए हैं। जहां भाजपा को पूर्ण विश्वास प्राप्त होने को लेकर अस्वस्थ होने के साथ ही साथ सर्वेक्षण के परिणामों से ऐसा लग रहा था कि इन दोनों राज्यों में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने वाली है। निश्चित रूप से इसके कुछ कारण अवश्य रहे होंगे लेकिन हरियाणा एवं महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में कोई सत्ता विरोधी लहर नजर नहीं आ रही थी। क्योंकि इन दोनों ही राज्यों में देवेंद्र फडणवीस, महाराष्ट्र में एवं हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर के कार्यकाल के दौरान यहां के कामकाज कमोबेश संतोषजनक रहने के कारण इन दोनों जगहों पर भाजपा अपनी सीटों में बढ़ोत्तरी की उम्मीद तो कर ही रही थी साथ ही हरियाणा राज्य में उसे 90 में से 75 सीटें जीतने की भी उसे आशा थी। पिछली दफे उसने तकरीबन 8 सीटें गंवा दिया था।
हरियाणा में अभी नयी बनी दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी (JJP) यहां किंगमेकर के रूप में उभरकर सामने आई है। जेजेपी ने यहां 10 सीटें हासिल कर अपनी पारी की श्रीगणेश की है। वहीं पर यदि इंडियन नेशनल लोकदल की बात की जाये तो एक तरह से उसका अस्तित्व ही खतरे में दिखाई दे रहा है।
अब अगर कांगेस पार्टी की बात करें तो जैसा कि अंदेशा जाहिर किया जा रहा था इस सबके उलट दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सीटों बढ़ोत्तरी में अवश्य हुई है लेकिन यह बढ़ोत्तरी ऐसे वक्त हुई है जब कांग्रेस अपने अन्तर कलह से घिरी हुई है, उसके बहुत सारे नेता पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं और कुछ नाराज भी चल रहे हैं, इन दोनों ही राज्यों में वह बहुत कमजोर तरीके से चुनाव मैदान में उतरी थी, अब चुनावी परिणाम के मद्देनजर भाजपा को कांटे का टक्कर देना और चुनाव में उसके नतीजे चौंकाने वाले होना कम आश्चर्य की बात नही है। फिलहाल मौजूदा समय के इस चुनाव के परिणामों को देख कर तो ऐसा लगता है कि जनता जनार्दन ने एक मजबूत विपक्ष होने की जरूरत को अच्छी तरह समझ लिया है।
जीत हार के इस खेल में आखिरकार भाजपा ने जेजेपी के सहयोग से हरियाणा में और बजरंग दल के सहारे महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही। जहां तक दूसरे दलों के साहारे सरकार बनाने वाली बात जुगाड़ लगने वाली ही बात का ही आभास करता है।

जहां तक हम महाराष्ट्र एवं हरियाणा में भाजपा को हुए नुकसान की बात करें तो इसके कुछ कारणें इसके विल्कुल स्प्ष्ट हैं। प्रथम तो यह कि उसने स्थानीय मुद्दों के बजाय राष्ट्रवाद, कश्मीर, पाकिस्तान, सुरक्षा आदि जैसे मुद्दों को उठाया। जबकि स्थानीय मुद्दों की तरफ विल्कुल ध्यान ही नहीं दिया, जबकि विपक्षी दलें उसे महंगाई, बेरोजगारी, खराब अर्थव्यवस्था, किसानों की बदहाली आदि जैसे मुद्दों पर उसे घेर रहे थे। इसके अलावा, भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं में जीत का अतिरिक्त आत्मविश्वास नजर आने लगा था, जिसके चलते कई नेता ईवीएम और जीत आदि से जुड़े बयान देते नजर आये।
महाराष्ट्र में बाढ़ के दौरान पैदा अव्यवस्था से निपटने में जिस कदर फडणवीस सरकार विफल हुई और आरे कॉलोनी के वन क्षेत्र को काटा गया, उससे भी लोगों में उसके प्रति रोष व्याप्त होना स्वाभाविक था। इसके अलावा उपचुनावों के परिणाम भी भाजपा के लिए बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहे। ऐसे में चुनाव के ताजे नतीजे भाजपा को अपनी रणनीति पर पुनः विचार करने की ओर इशारा कर रहे हैं। हमारे देश के नीति निर्धारित करने वाले और कानून बनाने वाले लोगों द्वरा इसके लिए भी कानून बनाये जाने की अब आवश्यकता है कि यदि कोई पार्टी कमसे कम 30 प्रतिशत वोट हासिल करने में कामयाब रहती है तो उसे सरकार बनाने का अधिकार होगा अन्यथा कीसी अन्य पार्टी के सहयोग से सरकार बनाये जाने का कानून नही होना चाहिये।
अब यहां यह प्रश्न भी उठता है कि क्या ऐसी अवस्था मे वहां किसी की भी सरकार के न होने से वहां पर राष्ट्रपति साशन लागू हो जायेगी, ऐसी अवस्था मे केवल निर्दलीय पार्टी के जीते उम्मीदवारों में से दो या तीन सदस्यों तक लोगों को साथ लिये जाने की अनुमति होनी चाहिये लेकिन जो लोग अपनी पार्टी छोड़ सरकार बनाने वाली पार्टी के साथ आएंगे उन्हें पूरे पाँच वर्षों तक उस पार्टी को छोड़ कर अन्य पार्टी में जाने की अनुमति नही होना चाहिये। यदि ऐसी व्यवस्था की जाएगी तो शायद दल बदलू लोगों पर तो अंकुश लगेगा ही इससे सत्तासीन पार्टी की यह जिम्मेदारी होगी कि वह ठीक-ठाक ढंग से कम काज को संम्भाल कर सुसाशन करें अन्यथा अगली बार तो क्या कभी भी उसे पूनः सत्ता में वापस आने का मौका प्राप्त नही होगा।







