दुकानदारी ही लाइक्स पर टिकी है

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अंशुमाली रस्तोगी

खबर है, फेसबुक अब किसी के भी ‘लाइक’ किसी को नहीं दिखाएगा। ऐसा उसने लाइक के प्रति लोगों में बढ़ती ‘दीवानगी’ के चलते किया है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसके समर्थन में हैं तो कुछ विरोध में। विरोध करने वालों का तबका बड़ा है। जाहिर है, बड़ा होगा ही। कुछ लोगों की तो दुकानदारी ही लाइक्स पर टिकी है। जितने ज्यादा लाइक, उतनी ही आत्मसंतुष्टि।

लाइक का भी अपना बाजार है। लाइक के भी अपने खरीददार हैं। जिसके पेज पर लाइक की भरमार रहती है, उसकी सोशल मीडिया के संसार में ‘तूती’ बोलती है। एक तरह से वो फेसबुक का ‘शहंशाह’ है।कुछ ऐसे भी महापुरुष हैं यहां जिनके खांस-खंखार भर देने से ही हजार लाइक यों ही टपक पड़ते हैं। केवल ‘बुखार’ ही लिख दें तो एक से एक नायाब नुस्खे उनके लिए तैयार रहते हैं लाइक के साथ। आस-पड़ोस की दीवारों से फांदकर भी लोग इलाज बताने आ जाते हैं।

फेसबुक की पूरी कायनात ही लाइक पर टिकी है। अगर इसे वो अन्य को दिखाना बंद कर देगा तो जाने कितने लोग ‘अवसाद’ में चले जाएंगे। कितने तो दो वक्त का खाना ही छोड़ देंगे। कितनों को ठीक से नींद नहीं आएगी।

जरा सोचिए उनका क्या होगा, जो रात-दिन अपने खाने और पकाने ही तस्वीरें ही फेसबुक पर शेयर करते रहते हैं। आज किस होटल में बैठकर क्या खा रहे हैं, किस बार में बैठकर क्या पी रहे हैं, कहां के ढाबे खाना कैसा था। फिर वो परियां कहां जाएंगी, जिनकी सुबह ही बतख समान सेल्फी पोस्ट करने से होती है। दिनभर में भिन्न-भिन्न एंगल से कितनी ही सेल्फियां ले यहां डालती रहती हैं। एक-एक सेल्फी पर हजार-हजार लाइक पाती हैं।

खाली समय में ‘टिक-टॉक’ पर बनाए गए वीडियो तो फिर बेकार ही चले जाएंगे।

फेसबुक समझ नहीं रहा है, अगर लाइक नहीं दिखेंगे तो लोगों की जिंदगी में सूनापन बेइंतहा बढ़ जाएगा। जल बिन मछली समान हो जाएंगे।

हाल यह है कि अभी ही लोग अपनी पोस्ट पर कम या न के बराबर लाइक पाकर डिप्रेशन में चले जाते हैं, जब किसी को यह दिखेंगे ही नहीं तब क्या हाल होगा। बिना लाइक के तो चार लोगों के साथ बैठने में भी अगले को शर्म आएगी। तब तो फेसबुक पर होना न होने के बराबर ही रह जाएगा।

चुनावों में क्या होगा। कैसे लाइक खरीदे जाएंगे। कैसे नेता खुद को सोशल मीडिया का सबसे आकर्षक चेहरा बताएगा। लाइक वोट में कैसे तब्दील हो पाएंगे।

आज के समय में यह मायने नहीं रखता कि हाइस्कूल, इंटर या ग्रेजुएशन में अपनी परसेंटेज क्या थी, मायने यह रखता है कि फलां पोस्ट पर आपको लाइक कितने मिले।

मैं तो उन लोगों के प्रति बहुत चिंतित-सा हो गया हूं, जिनकी फेसबुक की दुकान ही लाइक के दम पर चला करती है। वो यहां हैं ही सिर्फ लाइक पाने के लिए। पोस्ट करने के दो-चार मिनट में अगर उन्हें लाइक न मिलें तो बेचैन से हो जाते हैं। धरती-आकाश एक कर डालते हैं।

मेरी राय में फेसबुक को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। हजारों-लाखों लोगों को अवसाद में जाने से बचाना चाहिए। लाइक ही छिप जाएंगे तो फेसबुक भला फिर किस काम का रह जाएगा।

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