भारत के खिलाफ हर तरह की नाकेबंदी में जुटे पाकिस्तान ने चीन से रिश्ते बनाए तो लेकिन वह इस बात को सही ढंग से समझ पाने में असफल रहा कि दोनों के गठजोड़ की स्वीकार्यता क्या अन्य लोगों को भी स्वीकार्य है या फिर विशुद्ध स्वार्थों पर आधारित यह सम्बन्ध केवल दुनिया को बेवकूफ बनाने के लिये ही अमल में लाया गया है। पाक का भारत विरोध कुछ इस ढंग की शक्ल ले चुका है कि वह इसके लिये कुछ भी करने को तैयार है। भारत की जमीन को आतंक और अपराध की गुत्थी में उलझाए रखने के लिये उसने पूरी दुनिया में बेशर्मी के साथ जलालत सही, नुकसान उठाया और अमेरिका जैसे सरपरस्त से हाथ धो बैठा।
चीन के साथ उसकी दोस्ती दो कारणों से परवान चढ़ी। पहली यह कि भारत विरोध चीन का भी काफी पुराना कार्यक्रम है जिसके लिये उसने सन 1962 में धोखा देकर भारत पर हमला भी किया और हमारे एक बड़े भूभाग पर कब्जा भी कर लिया। यह कब्जा आज तक कायम तो है ही, साथ में डोकलम जैसे विवाद भी आते रहते हैं।

साम्राज्यवाद चीन की बहुत प्रमुख नीति रही है जिसके तहत वह अपनी सीमाओं के विस्तार के लिये प्रयत्नशील रहता है। इसी को परवान चढ़ाने के लिये उसे पाकिस्तान के रूप में बहुत आसान मोहरा मिल गया जहां विकास कार्यक्रमों के नाम पर उसने अपना दखल काफी बढ़ा लिया है और विश्व मंच पर भारत विरोध के लिये एक हमसफर भी मिल गया। अब दोनों ही देश आपस में कितना भी क्यों न खुश हो लें पर यह हकीकत एक बार फिर सामने आ ही गई है कि इस फरेबी नीति की दुनिया में कोई भी स्वीकार्यता नहीं है।
स्थिति ये है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से एक चीन को छोड़कर अन्य सभी देश कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ खड़े हो गए हैं। परिषद के अधिकांश सदस्यों का मानना है कि कश्मीर पर चर्चा के लिये सुरक्षा परिषद उचित मंच नहीं है।
भारत भी यही मानता और कहता रहा है। पहली बात तो पाक के साथ सम्बन्धों में कश्मीर कोई मसला है ही नहीं और दूसरी बात यह कि पाक के साथ होने वाली सभी वार्ताएं द्विपक्षीय बातचीत का अंग हैं। इसमें किसी तीसरे पक्ष की न तो आवश्यकता है और न ही औचित्य। यहां ध्यान रखने की बात यह है कि भारत ने पिछले साल जिस समझदारी भरे कदम से कश्मीर की स्थिति को सामान्य करने के लिये कदम उठाये हैं व उनका जो सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, उससे चीन और पाक की नापाक जोड़ी की उलझने बढ़ गई हैं क्योंकि हाथ सेंकने का लम्बे समय से चला आ रहा माध्यम उनकी पकड़ से बाहर हो गया है।
सम्भव है कि दोनों देश निकट भविष्य में भारत के खिलाफ कोई और चाल चलें जिससे निपटने को हमें सजग रहना होगा।







