यह सुझाव ही जनता का दर्द है

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अरविन्द साहू

अगर भाजपा चाहती है कि राज्यों में हार का सिलसिला रुके, तो उसको केंद्रीय और राज्यों की नीतियों में अन्तर करना पड़ेगा। केंद्र की नीतियाँ बेशक अच्छी हैं, वे राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभावी भी हैं, किन्तु राज्यों में अधिक लोक कल्याणकारी व जनहितैषी नीतियों की जरुरत है। मंहगाई व भ्रष्टाचार दो ऐसे मुद्दे हैं जिनपर हमेशा राहत व सख्ती की जरुरत रहती है।

उत्तर प्रदेश की बात करें तो जहाँ वीआइपी और भ्रष्टाचारी मजे में है, वहीं आम आदमी के लिये कोई राहत नही है। पिछले दिनों में बिजली की कीमतें जिस तेजी से बढी हैं उनसे ईमानदार उपभोक्ताओं का बजट गड़बड़ा गया है।जबकि दस-बीस वर्षों से लाखों का बिजली बिल दबाए बैठे मुफ्तखोर अब भी माफी योजना के इन्तजार में पड़े हैं। सभी सरकारी नीतियों का लाभ उठाने वाले उद्योगों व अन्य बहुत से करोडों रूपए के बड़े बकायेदारों से बिजली विभाग के भ्रष्टकर्मी सांठगांठ करके राजस्व को लम्बा चूना लगा रहे हैं। जिसकी परिणति आम ईमानदार जनता को बढ़े बिल के रुप में भुगतना पड़ रहा है। एक ओर दिल्ली सरकार 200 यूनिट तक आम उपभोक्ता को राहत दे रही है दूसरी ओर प्रदेश सरकार 100 से एक भी यूनिट अधिक वाले शहरी उपभोक्ताओं की दो से चार गुनी तक वसूली करके कमर तोडने पर अमादा है।

परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार कम करके साधारण बसों में किराया घटाने की जरुरत है, जबकि इस मूलभूत सुविधा पर किराया बढाकर आम आदमी को रोडवेज से दूर किया जा रहा है। जहाँ दिल्ली सरकार महिलाओं को मुफ्त यात्रा करवा रही है, वही योगी सरकार साधारण बसों में भी किराया बढाती जा रही है। जिसके चलते लोग फिर से डग्गामार व सस्ते साधनों से यात्रा को विवश हो रहे है।

रात रात भर नींद हराम करके आवारा जानवरों की समस्या से जूझते किसानों के घावों पर मरहम लगाने के लिये 6हजार रुपए सालाना व अन्य सुविधाएं भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। किसी भी किसान से बात कीजिये तो इसी मुद्दे पर कोसता मिल जायेगा। आवारा जानवरों को पकड़ने व पालने की सरकारी योजना व सुविधाएं भ्रष्ट व आलसी तन्त्र के चलते सिर्फ मजाक बनकर रह गयी हैं।

फिलहाल सिर्फ बिजली, परिवहन जैसे मुद्दों पर यदि सरकार अपनी दरें न्यूनतम कर दे तो भी जनता खुश हो सकती है।

और सबसे बड़ी बात यह कि भाजपा मूल कैडर के बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं को, जिन्हे सत्ता में सम्मान व स्थानीय स्तर पर कोई रोजगार हासिल नही है। वो भूखे पेट अब बूथों तक नही जाना चाहता । दूसरे दलों से मलाई खाने आये नेताओं व मंत्रियों को इसकी कोई फिक्र नही है।सत्ता में माहौल गड़बड़ाया तो वे फिर दूसरी पार्टी ढूंढ़ लेंगे।

इसलिये भाजपा भी यदि अपने लोगों के लिये केजरीवाल मॉडल पर सत्ता में भागीदारी व सम्मानजनक आमदनी का कोई सीधा रास्ता बना सके तो मूल भाजपा कार्यकर्ता जनता में दोबारा भाजपा की मजबूत पैठ बना सकते है।

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