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    भ्रष्टाचार दूर करने की शुरूआत हमें स्वयं अपने से तथा अपने आसपास से करनी चाहिए!

    By December 9, 2019Updated:December 9, 2019 Current Issues No Comments9 Mins Read
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    प्रदीप कुमार सिंह

     

    संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक समस्या भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए 9 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस के रूप में घोषित था। भ्रष्टाचार एक जटिल सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ऐसी घटना है जो कि सभी देशों को प्रभावित करता है। भ्रष्टाचार लोकतांत्रिक संस्थानों को नजरअंदाज कर, आर्थिक विकास को धीमा कर देता है और सरकारी अस्थिरता में भी योगदान देता है। इस दिवस के उपरोक्त लक्ष्यों को प्रिन्ट, इलेक्ट्रिानिक्स तथा सोशल मीडिया, शिक्षण संस्थानों, भाषणों, वाद-विवाद, संगठनों आदि के माध्यम से अधिक से अधिक प्रचारित तथा प्रसारित करना चाहिए। नोबेल शान्ति पुरस्कार प्राप्त श्री नेल्सन मण्डेला के अनुसार शिक्षा सबसे शक्तिशाली उपकरण है जिससे सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है। बच्चों को बाल्यावस्था से ही कानून तथा संविधान को सम्मान देने की सीख देना चाहिए।  

    भ्रष्टाचार अर्थात भ्रष्ट आचार। भ्रष्ट यानी बुरा या बिगड़ा हुआ तथा आचार का मतलब है आचरण। अर्थात भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है वह आचरण जो किसी भी प्रकार से अनैतिक और अनुचित हो। जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था के मान्य नियमों के विरूद्ध जाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गलत आचरण करने लगता है तो वह व्यक्ति भ्रष्टाचारी कहलाता है। भ्रष्टाचार के कई रंग-रूप है जैसे रिश्वत, काला-बाजारी, जान-बूझकर दाम बढ़ाना, पैसा लेकर काम करना, सस्ता सामान लाकर महंगा बेचना आदि। जैसा कि सर्वत्र देखने व सुनने में आ रहा है कि भ्रष्टाचार की विकराल समस्या ने देश सहित पूरे विश्व के लोगों को दुःखी कर रखा है तथा सभी उससे छुटकारा पाने के लिए बहुत ही चिंतित व प्रयत्नशील हैं। हमारा मानना है कि सभी कानूनों का निर्माण एवं उसकी व्याख्या उस युग की सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार की जानी चाहिए। न्याय तभी सच्चा न्याय है जबकि वह निर्दोषों, बच्चों, गरीबों, असहायों एवं कमजोर लोगों के अधिकारों की रक्षा कर सके। आज की चकाचैंध में मनुष्य भौतिक जगत को ही सब कुछ मान बैठा है और उसी में प्रसन्नता तलाश रहा है। जब तक उसका यह भ्रम दूर नहीं होता कि प्रसन्नता मन की आंतरिक स्थिति है, तब तक भ्रष्टाचार दूर करने के वाह्य प्रयास शत-प्रतिशत सफल नहीं होंगे।

    प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाने के लिए कोई न कोई छोटे से छोटा कार्य या बड़ा अपना उद्योग, व्यवसाय, नौकरी या मेहनत मजदूरी करना, अखबार बेचना, जूतों में पालिश करना, ठेेला लगाना, कुली का कार्य करना, कमजोर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना, आटो-रिक्शा चलाना आदि-आदि अवश्य करना चाहिये। दूसरों की कमाई खाने या झूठ और पाप की कमाई खाने से हमारी आत्मा कमजोर होती है। जबकि छोटे से छोटा किन्तु परिश्रम व ईमानदारी से कमाया हुआ एक पैसा भी हमारी आत्मा के विकास में सहायक होता है। अनेक लोग पवित्र सेवा भावना से सरकारी, प्राइवेट या समाज सेवी संस्थाओं में नौकरियाँ करते हैं या किसानी, मेहनत-मजदूरी का कोई कार्य करते हैं। जैसे- खेतीबाड़ी, शिक्षा, न्यायिक, प्रशासनिक, सफाई, यातायात, मीडिया, चिकित्सा, रेलवे, पुलिस, सेना, बैकिंग, जल संस्थान, बिजली, सड़क, निर्माण आदि विभागों में कार्यरत रहते हुए जनता को अनेक प्रकार की जन सुविधायें उपलब्ध कराते हैं और समाज का संचालन एवं सुचारु व्यवस्था बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। किन्तु जो व्यक्ति अपने कार्यों को जनहित की पवित्र सेवाभावना से न करके निपट अपनी आजीविका कमाने तथा अनुचित तरीके से अतिरिक्त कमाई की भावना से करते हैं वे स्वयं ही अपनी आत्मा का विनाश कर लेते हैं। भ्रष्टाचार के कारण हम बड़े-बड़े व्यक्तियों को ऊँचाइयों से नीचे गिरता देख रहे हैं।

    हमारा यह मानना है कि भ्रष्टाचार का मामला कानून-व्यवस्था का नहीं, चारित्रिक गिरावट और नैतिक मूल्यों की गिरावट का मामला है। सच्चाई तो यह है कि इसके लिए पूरा समाज दोषी है। आज फिल्मों में अश्लीलता, सैक्स, हिंसा तथा मंहगी जीवन शैली बुरी तरह से समाज में परोसी जा रही है, इंटरनेट पर नंगी तस्वीरों की भरमार है। ये सब बाल तथा युवा पीढ़ी को भ्रष्ट कर रही हैं। हालत यह है कि आप परिवार के साथ टीवी पर समाचार भी नहीं देख सकते। न्यूज चैनलों में भी बीच-बीच में गंदे विज्ञापन आते रहते हैं। आप इस पर क्या कहेंगे? हमारा मानना है कि इस सामाजिक बुराई को सिर्फ आध्यात्मिक और सामाजिक शिक्षा से ही रोका जा सकता है। शिक्षा के मंदिरों को भौतिकता की बजाय सामाजिकता और आध्यात्मिकता का केन्द्र बनाना होगा, क्योंकि स्कूल ही ऐसी जगह है, जहां सभी धर्मों के बच्चे एक साथ ईश्वर की एक ही प्रार्थना करते हैं। बच्चे अपनी पवित्रता से भरे अपने जीवन आचरण से राह भटके अपने माता-पिता को भी ‘‘अपना अपना करो सुधार तभी मिटेगा भ्रष्टाचार’’ की सीख दे सकते हैं।

    समाज में आज जो भी आपाधापी मची है उसका कारण उद्देश्यहीन शिक्षा है तथा इसका समाधान भी ध्येयपूर्वक शिक्षा को उद्देश्यपूर्ण बनाकर मिलेगा। प्रत्येक बच्चे को भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षा के साथ ही साथ बाल्यावस्था से ही कानून, व्यवस्था एवं न्याय की शिक्षा दी जानी चाहिए। कानून व्यवस्था और न्याय की शिक्षा को बच्चों को बाल्यावस्था से देने का उद्देश्य संसार के प्रत्येक बच्चे को बचपन से ही कानून को मानने वाला बनाना है। पृथ्वी पर तीव्रता से बढ़ रही आपसी दूरियाँ, अमानवीयता, कानून विहीनता, अन्याय एवं शैतानी सभ्यता की स्थापना के स्थान पर आध्यात्मिक सभ्यता की स्थापना के लिए हमें सारे विश्व के बच्चों को बचपन से ही कानून, व्यवस्था और न्याय की शिक्षा अनिवार्य रुप से दी जानी चाहिए।

    विद्यालय द्वारा बालकों को बाल्यावस्था से ही सभी धर्मों की आध्यात्मिक शिक्षा दी जानी चाहिए। सभी धर्मों के अवतार-राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा, महावीर, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि युग-युग अपने श्रेष्ठ आचरण के कारण सारी मानव जाति के मार्गदर्शक तथा उद्धारक में बने। आध्यात्मिक शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य मानव जाति की सुरक्षा तथा उनके बीच एकता व प्रेम विकसित करके धरती में एकताबद्ध आध्यात्मिक सभ्यता स्थापित करने में सहायता करना है। सभी धर्मों की मूल आध्यात्मिक शिक्षायें एक जैसी हैं। अलग-अलग पूजा स्थलों में जाकर प्रार्थना, इबादत, पूजा, अरदास करने से यह अज्ञान संसार में फैल गया कि परमात्मा एक नहीं अनेक है। जबकि ईश्वर एक है। धर्म एक है तथा हम सभी पृथ्वीवासी एक ही परमात्मा की संतानें हैं। इस प्रकार यह सारी वसुधा एक कुटुम्ब के समान है और इसे भ्रष्टाचार मुक्त बनाना इसके प्रत्येक सदस्य का नैतिक कर्तव्य है।

    कुछ अवकाश प्राप्त सिविल, पुलिस और न्यायपालिका के अधिकारियों ने एक नयी पहल शुरू की है जिसके तहत सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को खत्म करने में मदद मिलेगी। इन अधिकारियों ने एक सार्वजनिक अपील भी जारी की है और आम जनता से कहा है कि अगर सब चैकन्ना रहें तो अपने देश को भ्रष्टाचार से बचाया जा सकता है। भारत के पूर्व मुख्य नायाधीश, जस्टिस आर.सी. लाहोटी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिन्दोह, पूर्व सीएजी वी.के. शुंगलू पूर्व पुलिस महानिदेशकों प्रकाश सिंह और जेएफ रिबेरो आदि जैसे कुछ महत्वपूर्ण लोगों की तरफ से जारी एक बयान में लोगों से अपील की गयी है कि भ्रष्ट व्यक्तियों के बीच के भ्रष्टाचार को रोकने और भारत की चोरी की गयी सम्पदा को वापस लेने के लिए एक अभियान की जरुरत है।

    मेरी धर्म गुरूओं, मीडिया, स्कूलों, सरकारी सेवकों, राजनेताओं, उद्योगपतियों, व्यापारियों, छात्रों, टीचर्स व अन्य सभी से निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करने की प्रार्थना है:-

    (1) क्या यह एक सबसे बड़ी सच्चाई नहीं है कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति अमर नहीं है, सभी को एक दिन मरना ही पड़ेगा। तब फिर क्या अपने मरने के बाद स्वयं के द्वारा संचित की गई धन-सम्पत्ति को आप अपने साथ ले जा सकेंगे?

    (2) क्या हम अपनी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के पश्चात् अपनी धन-सम्पत्ति का कुछ अंश समाज-सेवा, राष्ट्र-सेवा व विश्व सेवा आदि के नेक कार्यों में लगाकर पुण्य व यश कमाना चाहेंगे? या फिर क्या हम उसे बुरे कामों में लगाकर व लोगों के शरीर, परिवार तथा आत्मा को कष्ट पहुँचाकर पाप के भागी बनना चाहेंगे?

    (3) क्या हम मेहनत व ईमानदारी के बल पर नेकनीयती के द्वारा लोगों के शरीर, परिवार तथा आत्मा को दुःख पहुँचाये बिना धन-सम्पत्ति आदि का अर्जन कर आत्म-संतुष्टि व सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहेंगे? या फिर बेईमानी, हेरा-फेरी, बदनीयती से दूसरों का गला काटकर धन-सम्पत्ति संचित करके मानसिक तनाव व बदनामी चाहंेंगे?

    (4) क्या हम सुसंस्कारी, सदाचारी, परोपकारी, दानी व नेक इंसान बनकर अपना यह जन्म व अगला जन्म अच्छा/उत्तम बनाना चाहेंगे? या फिर दुराचारी, भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी बन कर अपना यह जन्म व अगला जन्म खराब करना चाहेंगे तथा साथ ही क्या अपनी संतानों को भी दुराचारी, भ्रष्टाचारी व व्यभिचारी बनाना चाहेंगे?

    भ्रष्टाचार की समस्या विकराल है, किन्तु इसका समाधान तो हमें निकालना ही होगा। यदि वास्तव में हमें समाज को भ्रष्टाचार-मुक्त व सदाचारी बनाना है तो अपने स्तर से भी उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर अधिक से अधिक लोगों से प्राप्त कर समाधान निकालने का प्रयास पूरे मनोयोग से करना चाहिए। यह विचार बहुत सार्थक है – अपना अपना करो सुधार तभी मिटेगा भ्रष्टाचार। भारत भ्रष्टाचार से बचेगा तभी वह सारे विश्व की रक्षा कर सकता है।

    हमारा मानना है कि आधुनिक विद्यालयों को अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाते हुए प्रत्येक बच्चे के नैतिक उत्थान एवं सर्वश्रेष्ठ चरित्र निर्माण के लिए बचपन से ही उसे सर्वश्रेष्ठ भौतिक शिक्षा के साथ ही साथ उसे मानवीय एवं आध्यात्मिक शिक्षा भी प्रदान करनी होगी। इन तीनों शिक्षाओं से पोषित एवं संस्कारित बालकों के द्वारा ही समाज, देश और विश्व को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाया जा सकता है। आइये, हम सब मिलकर समाज, देश व विश्व मंे फैली हुई इस भ्रष्टाचार जैसी वैश्विक गंभीर समस्या को समाप्त करने का संकल्प लें।

    हमारा मानना है कि युद्धों, आतंकवाद तथा भ्रष्टाचार से धरती को बचाने के लिए भारत को अपनी संस्कृति के आदर्श वसुधैव कुटुम्बकम् तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुरूप एक वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद) गठित करने लिए सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक शीघ्र बुलानी चाहिए। विश्व संसद के गठन से विश्व सरकार तथा प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून से लेश विश्व न्यायालय के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा। साथ ही विश्व के प्रत्येक वोटर को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए वोटरशिप अधिकार कानून की अविलम्ब आवश्यकता है! वोटरशिप कानून के अन्तर्गत प्रत्येक वोटर को उसके हिस्से की आधी धनराशि उसके खाते में भेजने की मुहिम विश्व परिवर्तन मिशन के संस्थापक विश्वात्मा द्वारा देश में जोरदार तरीके से चलाया जा रहा है। भारत सरकार को उनके द्वारा भारतीय संसद में दायर वोटरशिप याचिका पर चर्चा करवानी चाहिए।

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