- चुनौती: चीन ने दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण ब्रह्मपुत्र नदी पर शुरू
- भारत को चीन की आक्रामकता के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करनी चाहिए
नई दिल्ली, 21 जुलाई। भारत और चीन का मसला एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं। वजह चीन ने दक्षिण-पूर्वी तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी (तिब्बत में यारलुंग जांगबो) पर दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध का निर्माण शुरू कर दिया है। इस परियोजना की शुरुआत 19 जुलाई 2025 को चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने निंगची शहर में एक भूमिपूजन समारोह के दौरान की। यह परियोजना, जिसे दिसंबर 2024 में मंजूरी मिली थी, 167.8 अरब डॉलर (लगभग 14 लाख करोड़ रुपये) की अनुमानित लागत से बन रही है और इसमें पांच जलविद्युत स्टेशन शामिल होंगे। मीडिया रिपोर्ट और चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, यह बांध प्रतिवर्ष 300 अरब किलोवाट-घंटे बिजली का उत्पादन करेगा, जो तिब्बत की स्थानीय बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी आपूर्ति करेगा।
भारत और बांग्लादेश ने जताया विरोध
भारत और बांग्लादेश ने इस परियोजना पर कड़ी आपत्ति जताई है। भारत ने जनवरी 2025 में चीनी अधिकारियों से आग्रह किया था कि ब्रह्मपुत्र के निचले इलाकों (अरुणाचल प्रदेश, असम और बांग्लादेश) में रहने वाले लोगों के हितों को नुकसान न पहुंचे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत इस परियोजना पर सतर्क निगरानी रखेगा और अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। बांग्लादेश ने भी इस बांध के संभावित प्रभावों, जैसे जल प्रवाह में कमी या बाढ़ के खतरे, को लेकर चिंता व्यक्त की है।
परियोजना से बढ़ी चिंताएं
- पर्यावरणीय चुनौतियां बढ़ेगीं : यह बांध हिमालय की एक विशाल घाटी में बनाया जा रहा है, जहां ब्रह्मपुत्र नदी एक तीव्र यू-टर्न लेकर अरुणाचल प्रदेश और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। यह क्षेत्र भूकंप-प्रवण टेक्टोनिक प्लेटों की सीमा पर स्थित है, जिससे इंजीनियरिंग और पर्यावरणीय चुनौतियां बढ़ती हैं।
- पर्यावरणीय प्रभाव: पर्यावरणविदों का कहना है कि यह परियोजना ब्रह्मपुत्र घाटी के जैव विविधता केंद्र और राष्ट्रीय प्रकृति अभयारण्य को अपरिवर्तनीय नुकसान पहुंचा सकती है। नदी के 50 किलोमीटर के दायरे में 2,000 मीटर की ऊंचाई से गिरावट इसे दुनिया की सबसे गहरी घाटियों में से एक बनाती है।
- रणनीतिक चिंताएं: सूखे की स्थिति का करना होगा सामना : विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस बांध का उपयोग भारत के खिलाफ “जल हथियार” के रूप में कर सकता है। यदि चीन पानी रोकता है, तो अरुणाचल प्रदेश, असम और बांग्लादेश में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वहीं, अचानक पानी छोड़ने से बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जैसा कि पहले सतलुज और अन्य नदियों के मामले में देखा गया है।
- चीन का दावा: चीन ने दावा किया है कि यह परियोजना “रन-ऑफ-द-रिवर” प्रकार की है, जो नदी के प्रवाह को ज्यादा प्रभावित नहीं करेगी। उसका कहना है कि यह बांध तिब्बत के विकास और कार्बन तटस्थता लक्ष्यों को पूरा करने के लिए है।

भारत का जवाब: अरुणाचल प्रदेश में 10,000 मेगावाट की बहुउद्देशीय जलाशय परियोजना
भारत ने इस परियोजना के जवाब में अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर 10,000 मेगावाट की बहुउद्देशीय जलाशय परियोजना (अपर सियांग) शुरू करने की योजना बनाई है। यह परियोजना चीन के बांध के प्रभाव को संतुलित करने और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने में मदद करेगी। इसके अलावा, भारत और चीन के बीच 2006 में स्थापित विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र (ELM) के तहत बाढ़ के मौसम में जलविज्ञान संबंधी डेटा साझा किया जाता है, लेकिन भारत अब पूरे बेसिन की पूर्ण जानकारी के आदान-प्रदान की मांग कर रहा है।
नई कंपनी बनाकर कई गुना अधिक बिजली उत्पादन करेगा चीन
चीन ने इस परियोजना के लिए चाइना याजियांग ग्रुप नामक एक नई कंपनी की स्थापना की है, जो निंगची में पांच जलप्रपात बांधों के निर्माण की जिम्मेदारी संभालेगी। यह बांध मौजूदा थ्री गॉर्जेस बांध से कई गुना अधिक बिजली उत्पादन करने में सक्षम होगा।
चीन की इस परियोजना ने भारत-चीन संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। भारत और बांग्लादेश के लिए यह बांध न केवल पर्यावरणीय और जल संकट का खतरा है, बल्कि रणनीतिक चुनौती भी पेश करेगा। फ़िलहाल भारत सरकार ने इस पर सतर्क रुख अपनाया है और कूटनीतिक व तकनीकी स्तर पर अपनी चिंताओं को उठा रहा है।






