सेव उत्पादन वाले क्षेत्रों में बेहतर गुणवत्ता के सेव की पैदावार के लिए 1000-1600 घंटों की ठंडक होनी चाहिए, लेकिन इन इलाकों में बढ़ते तापमान और अनियमित बर्फबारी के कारण सेब उत्पादक क्षेत्र अब ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रहा है
शिमला, 05 दिसम्बर। जलवायु परिवर्तन का बुरा असर मानव स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि कृषि पर भी पड़ रहा है। जलवायु संकट के कारण हिमाचल के किसान सेब की खेती को छोड़कर अनार और सब्जी जैसी गैर परंपरागत फसलें उगाने लगे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाचल के कुल्लू, शिमला और मंडी जैसे पहाड़ी इलाकों में किसान सेव उत्पादन जैसी परंपरागत फसलों की जगह अब अनार और सब्जी जैसी वैकल्पिक फसलें अपनाने लगे हैं।
इन जिलों के किसान सेब के बगीचों की जगह अनार, कीवी, टमाटर, मटर, फूलगोभी, बंदगोभी, ब्रोकोली और फूलों की खेती बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, समुद्र तल से 1500- 2500 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय श्रृंखला के सेव उत्पादन वाले क्षेत्रों में बेहतर गुणवत्ता के सेव की पैदावार के लिए 1000-1600 घंटों की ठंडक होनी चाहिए, लेकिन इन इलाकों में बढ़ते तापमान और अनियमित बर्फबारी के कारण सेब उत्पादक क्षेत्र अब ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रहा है। सर्दियों में तापमान बढ़ने से सेब के उत्पादन के लिए आवश्यक ठंडक की अवधि कम हो रही है।
कुल्लू क्षेत्र में ठंड के घंटों में 6.385 यूनिट प्रतिवर्ष की दर से गिरावट हो रही है। इस तरह पिछले तीस वर्षों के दौरान ठंडक वाले कुल 740.8 घंटे कम हुए हैं। इसका सीधा असर सेब के आकार, उत्पादन और गुणवत्ता पर पड़ता है। भारतीय मौसम विभाग के शिमला केंद्र से जुड़े डॉ. मनमोहन सिंह के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में मानसून सीजन की अवधि तो बढ़ रही है, पर समग्र रूप से बरसात कम हो रही है। हिमाचल और जम्मू कश्मीर में स्थित मौसम विभाग के ज्यादातर स्टेशन पिछले करीब तीन दशक से तापमान में बढ़ोत्तरी की प्रवृत्ति के बारे में बता रहे हैं, जबकि श्रीनगर और शिमला में बर्फबारी में कमी देखी जा रही है। बर्फबारी की अवधि भी धीरे-धीरे कम हो रही है।
वाईएस परमार बागवानी व वानिकी विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिक प्रो. एसके भारद्वाज के मुताबिक, ठंड के मौसम में अनियमित जलवायु दशाओं का असर फलों के विकास पर पड़ता है, जिसके कारण सेव का उत्पादन कम हो रहा है। वर्ष 2005 से 2014 के दौरान इस क्षेत्र में सेव का उत्पादन 0.183 प्रति हेक्टेयर की दर से प्रतिवर्ष कम हो रहा है। पिछले 20 वर्षों के दौरान यहां सेब की उत्पादकता में कुल 9.405 टन प्रति हेक्टेयर की कमी आई है। सेव उत्पादन के लिए उपयुक्त माने जाने वाले स्थान अब शिमला के ऊंचाई वाले क्षेत्रों, कुल्लू, चंबा और किन्नौर एवं स्फीति के शुष्क इलाकों तक सिमट रहे हैं। इसके अलावा ओलावृष्टि के कारण भी सेव उत्पादन प्रभावित होता है।







