विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर पर विशेष: आधुनिकता की आंधी में खुद को खो रहे हैं हम

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फोटो: गूगल से साभार

बेसिक शिक्षा मंत्री ने कहा, अपनी पुरानी परंपरा को शिक्षा के साथ जोड़ने के प्रयास का ही कारण है योग को शिक्षा में लाना

उपेंद्र राय

लखनऊ, 04 अक्टूबर 2019: कहावत है कि ‘पानी पीजै छान के और गुरु कीजै जान के।’ सच्चा गुरु ही भगवान तुल्य है। वर्तमान में लोगों में शिक्षा के प्रति पहले की अपेक्षा काफी जागरूकता बढ़ी है लेकिन शिक्षा में नैतिकता का स्तर गिरता जा रहा है। अब न तो विद्यार्थियों में अपने गुरु के प्रति वैसी श्रद्धा रह गयी है और न ही गुरु में अपने शिष्यों को अपने कर्तव्य परायणता की शिक्षा देने की लालसा। अब तो पैसे के बल पर गुरु ज्ञान लिया और दिया जा रहा है। शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ ही उसमें नैतिक शिक्षा नहीं रह गयी है। पांच अक्टूबर को मनाए जाने वाले विश्व शिक्षक दिवस के इस वर्ष का थीम है- “युवा शिक्षक : भविष्य का भविष्य”। यह थीम युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित और जागरूक करने के लिए रखा गया है। अपनी संस्कार युक्त शिक्षा के लिए यूपी की वर्तमान सरकार ने बेसिक शिक्षा में योग अनिवार्य किया है। इसके अलावा अभिव्यक्ति के विकास के लिए भी कई कार्य किये जा रहे हैं।

शिक्षा सेवा की वस्तु हो गयी है: प्राचार्य

इस संबंध में प्रयागराज के ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डाक्टर आनंद शंकर सिंह ने बताया कि अब ग्लोबल जमाना हो गया है। भारत में शिक्षा का दर्शन शिक्षक और शिक्षार्थी के भावनात्मक जुड़ाव था। आधुनिक युग में फेसिलेटर अर्थात सहयोगी हो गया है और शिक्षा सेवा की वस्तु हो गयी है। इससे हमको सतर्क होने की जरूरत है, क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है। यह सामाजिक तथा राष्ट्रीय सरोकारों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

वह केवल एक बाजारू उत्पाद और उससे मुनाफा कमाने की वस्तु नहीं है। यह भारत का पुराना चिंतन रहा है। आज भी इस बात की सख्त आवश्यकता है कि दोनों इसको समझे। डाक्टर आनंद शंकर सिंह ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि शिक्षक केवल सहयोगी नहीं, गुरू इस नाते है कि वह छात्र को केवल विश्योचित ज्ञान नहीं देता, बल्कि उसका बहुमुखी विकास करके एक मुल्यों से भरा रहा हुआ विश्व नागरिक निर्मित करता है। इस मूल्य समारोपण के लिए सहयोगी नहीं, गुरु है। इसलिए इस भूमंडलीकरण के दौरा में भारतीय गुरू शिष्य-परंपरा का महत्व और बढ़ जाता है। इस परंपरा को पुन: जीवित करने की आवश्यकता है।

नैतिकता में गिरावट के लिए अभिभावक भी दोषी:

यूपी डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष और भाजपा के यूपी राज्य प्रमुख सुशासन चंद्र भूषण पांडेय का कहना है कि नैतिकता में गिरावट के प्रति अभिभावक भी दोषी हैं। आज अर्थ युग में मां-बाप अच्छे स्कूल में अपने बच्चे को दाखिला दिलाकर अपना कर्तव्य भूल जाते हैं। घर पर उसकी गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया जाता। सिर्फ स्कूल में पाये हुए नम्बर पर ही हम इतराते रहते हैं। यदि कोई मित्र आज बच्चे को डपट भी दे तो उसका आशय नहीं समझते और दुश्मनी मोल ले लेते हैं। पहले यदि बाहर किसी ने डाटा तो घर आने पर भी मार पड़ती थी।

बेसिक शिक्षा मंत्री ने कहा, नैसर्गिक गुणों के विकास के लिए ला रहे कई योजनाएं:

इस संबंध में यूपी के बेसिक शिक्षा मंत्री डाक्टर सतीश द्विवेदी ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि हमें आधुनिकता के साथ अपनी परंपरा को संजोकर चलना है। यही कारण है कि हमने सबसे पहले योग को अनिवार्य किया। इसके अलावा हम प्राथमिक विद्यालयों में नैसर्गिक गुणों के विकास के लिए कई योजनाएं लेकर आ रहे हैं। हम महापुरूषों के आदर्शों के बारे में भी बच्चों को विषयेत्तर ज्ञान देने की योजना बना रहे हैं, जिससे राष्ट्रचिंतन की भावना पैदा हो।

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