संवाददाता : बकरीद (ईद-उल-अज़्हा) हर साल आती है, लेकिन इस मौके पर कुर्बानी को लेकर समाज में अब भी कई गलतफहमियां बनी हुई हैं। कुछ लोग इसे जानवरों पर जुल्म मानते हैं, तो कुछ कहते हैं कि जानवर की जगह सीधे पैसे दान कर देने से बेहतर काम हो जाएगा। इन सवालों के बीच कुर्बानी की असली रूह, इस्लामी नजरिया और उसका गहरा फलसफा समझना ज़रूरी है।
इस्लाम में कुर्बानी किसी देवी-देवता को खुश करने या मन्नत पूरी करने की प्रथा नहीं है। यह अल्लाह के हुक्म पर पूर्ण समर्पण (जज्बा-ए-ईसार) का प्रतीक है।
कुरान पाक में साफ़ इरशाद है कि अल्लाह तक न तो कुर्बानी का गोश्त पहुंचता है और न ही खून। उस तक पहुंचती है सिर्फ़ बन्दे की नीयत, तकवा (ईश-भय) और खुलूस। यानी कुर्बानी असल में इंसान के अंदर छुपे अहंकार, लालच और स्वार्थ को क़त्ल करने का रूहानी अभ्यास है।
फिर सिर्फ़ पैसे क्यों नहीं दे दें?
यह सवाल अक्सर उठता है कि गरीबों की मदद नकद रूप में भी की जा सकती है, तो जानवर कुर्बान करने की क्या ज़रूरत? इस्लाम इस पर बहुत हिकमत भरा जवाब देता है।
हर इबादत का अपना मुक़र्रर वक्त और तरीका होता है। जैसे रमज़ान में रोज़ा रखना ही इबादत है, भूखे रहने के बिना सिर्फ़ गरीबों को खाना खिलाना रोज़े की जगह नहीं ले सकता। ठीक उसी तरह, ज़िल-हिज्जा के इन पवित्र दिनों में अल्लाह की राह में कुर्बानी देना ही सर्वोत्तम इबादत माना गया है।
कुर्बानी का दूसरा बड़ा पहलू यह है कि यह गरीबों को सम्मान के साथ उम्दा भोजन उपलब्ध कराती है। नकद मदद मिलने पर कई बार पैसा दूसरी ज़रूरतों या कर्ज़ में ख़र्च हो जाता है। कुर्बानी सुनिश्चित करती है कि साल में कम से कम एक बार गरीब-से-गरीब परिवार भी बिना हाथ फैलाए, गरमागरम, पौष्टिक मांस का स्वाद ले सके।
इसके अलावा, कुर्बानी से जुड़ी पूरी व्यवस्था छोटे पशुपालकों, किसानों और व्यापारियों की आजीविका को भी सहारा देती है।
हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का सबककुर्बानी की याद हज़रत इब्राहिम (अ.) की उस अनुपम निष्ठा की है, जिन्होंने अल्लाह के आदेश पर अपने प्रिय बेटे हज़रत इस्माइल (अ.) को भी कुर्बान करने को तैयार कर लिया था। यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चे समर्पण में अपनी सबसे प्यारी चीज़ को भी अल्लाह के लिए त्यागने की तैयारी होनी चाहिए।
कुर्बानी का सामाजिक संदेश
शरीअत के मुताबिक़ कुर्बानी के मांस को तीन हिस्सों में बांटने का हुक्म है:
- एक हिस्सा गरीबों के लिए
- दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए
- तीसरा अपने परिवार के लिए
यह बंटवारा न सिर्फ़ दान है, बल्कि रिश्तों को मजबूत करता है, समाज में बराबरी का भाव पैदा करता है और अमीर-गरीब की दूरी कम करता है।
इस्लाम बिना वजह किसी प्राणी को सताने की सख्ती से निंदा करता है। कुर्बानी के दौरान जानवर को कम से कम दर्द पहुंचाने का पूरा ध्यान रखा जाता है और हर कदम पर अल्लाह का शुक्र अदा किया जाता है।
बता दें कि ईद-ए-कुर्बान महज़ एक रस्म या दिखावा नहीं है। यह ख़ुद को सुधारने, दूसरों की मदद करने और अल्लाह के आगे पूर्ण समर्पण का मौका है। जिस समाज में त्याग, हमदर्दी और साझेदारी बढ़े, वही समाज वाकई तरक्की करता है। कुर्बानी हमें यही संदेश देती है – अपने अंदर की बुराइयों को दूर करो, ताकि बाहर एक बेहतर दुनिया बन सके।
ईद-उल-अज़्हा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
त्याग का ये पैगाम हर दिल तक पहुंचे।







