आपकी बात : जी के चक्रवर्ती
जब से तीनों कृषि बिल कानूनों को मोदी द्वारा वापस लेने की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री द्वारा सरकार की तपस्या असफल हो जाने जैसी बात का उल्लेख किया गया है तभी से यह प्रश्न उठा है कि आखिरकार वह कौन सी तपस्या थी जो फेल हो गई?
अब जब कृषि कानूनों को संसद में 29 नवंबर को वापस ले लिया जाएगा, तो फिर अब इन कानूनों के उन पहलुओं पर विचार और नजरें डाल कर उसे समझने की कोशिश करने की आवश्यता जरूर है कि जिसे लेकर इतने दिनों तक दिल्ली की सीमाओं पर उत्पन्न आंदोलन की विद्रूप परिस्तिथियों से हम सभी भली भांति परचित हैं।
तीनो कृषि बिल कानूनों के समाप्त होते ही किसानों को खुश होना तो स्वाभाविक है लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष भी इससे झूम उठा जरूर है लेकिन उसे इस बात का अंदाजा भी नही था कि अचानक इस तरह की एक घोषणा ने पूरे विपक्ष की हवा ही निकाल कर रख दी। अब ज्यादातर पार्टियां इसे अपनी जीत बताने में लगे हुये है, तो वहीं सत्ताधारी बीजेपी इसे पीएम बड़प्पन’ जैसी बात बता रही है।
देश के नजनीतिक पार्टियों को यह समझना अवश्य पड़ेगा कि उनके पास जो मुद्दा था अब वह नदारत हो गया है। कृषि कानून के हटते ही इसका श्रेय सभी दलों द्वारा लेने के लिये होड़ मच गई है।

पिछले वर्ष 2020 में16 सितम्बर को लोकसभा से तीनों कृषि विधेयक पास कर दिए गए थे। इसके बाद 20 सितंबर को राज्यसभा ने भी इस कानूनों को पारित भी कर देने के बाद से ही देश में कई जगहों पर इसके विरोध में छिटपुट प्रदर्शन होना शुरू हों गये थे वहीं पर इसे लेकर पंजाब, हरियाणा राज्यो में कुछ अधिक ही सरगर्मी देखने को मिली लेकिन इस समय इतने बड़े स्तर पर किसान सड़कों पर नहीं उतरे थे, जिन तीन कृषि कानूनों को सरकार लागू करने को लेकर व्याकुल नजर आ रही थी, जिसमे इन तीन कानूनों को लेकर सरकार ने केवल इतना ही कहा था कि किसानों को अब से अपना अनाज बेचने के लिए मात्र मंडियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि किसान अब मंडीयों के बाहर भी अपनी फसल को ऊंचे दामों में बेचने के लिये स्वतंत्र होंगे।
कृषि बिल कानूनों को लेकर किसानों का स्पष्ट कहना था कि यदि इन कानूनों द्वारा लागू की गई तो APMC मंडियां समाप्त हो जायेंगी जिससे निजी खरीदारों के पास अधिक शक्तियां आ जाने से वे अपनी इच्छा अनुसार फसलों को खरीदेंगे वहीं सरकार हमेशा किसानों के इस दावे को नकारती रही है, लेकिन सरकार की अड़ियल रुख के कारण यह विवाद सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझता चला गया। वहीं किसान तो शुरू से ही यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि एकल बाजार जैसी परिकल्पना उन्हें किसी भी तरह से लाभ नही दे सकती हैं। बल्कि बिना किसी तरह की पंजीकरण के व्यक्तिगत लोग भी इस मैदान में कूद पड़ेंगे और फसलों को बिना किसी नियम-कायदे के खरीदने-बेचने लांगेंगे जिससे किसान निजी खरीदारों के हाथ की कठपुतली बन जाने से उन्हें उनके फसलों के उचित मूल्य मिलना तो दूर की बात है, इसके उलट उनका उत्पीड़न होना प्रारम्भ हो जायेगा। शायद इसीलिए सरकार नियुन्तम समर्थन मूल्य के लिये कानून बनाने की बात को लेकर ढुलमुल नीति अपनाती रही।
इसी तरह यदि दूसरे कानून को देखें तो उसमे किसानों की जमीनों को एक निश्चित धनराशि पर कुछ वर्षों के लिए किसी पूंजीपति या ठेकेदारों द्वारा अनुबंध कर ले लिया जाएगा और फिर वे अपने हिसाब से अधिक लाभ देने वाली फसलों का उत्पादन कर उसे मनमाने दाम पर बेचेंगे। जिन किसानों की जमीन पांच हेक्टेयर से कम हैं, उन्हें ही इस अनुबंध का लाभ दिया जायेगा।
देश के लगभग सभी किसानों द्वारा सरकार के इस कानून को सिरे से खारिज करते हुये कहा कि इन कानूनों में एक भी ऐसा कोई पक्ष नही है जो किसानों एवं और सरकार के सोचने से सामंजस्य रखता हो। वहीं किसानों का यह भी कहना है कि पूंजीपति लोग और बड़ी कंपनियों द्वारा अनुबंधित खेती में एसे किसानों का चुनाव किया जाने लगेगा जिससे लघु एवं मझोले किसानों को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा।
किसानों और ठेकेदार के बीच हुये किसी प्रकार के विवाद उठ खड़े होने की स्थिति में हमेशा पूंजीपतियों की ही जीत होगी क्योंकि ठेकेदार महंगे से महंगे वकील को अपने पक्ष को सही साबित करने के लिये खड़ा कर सकता है, ऐसी अवस्था मे किसान मजबूर हो कर बेसहारा हो जायेगे। इस दृष्टिकोण से तीसरा कानून में साग-सब्जियों में प्याज, खाद्य तेल, तिलहन और कुछ अन्य कृषि उत्पादों को आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी से बाहर कर दिये जाने से वस्तुओं के दामों में अत्याधिक बृद्धि हो जाने से इन वस्तुओं की जमाखोरी भी बढ़ जाएगी। इस तरह के परिदृश्य में आखिरकार कृषि कानून से किसानो का लाभ कैसे हो सकता है?
नोट: यह लेखक के अपने निजी विचार हैं।







