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    लोकतंत्र की लड़ाई: राहुल गांधी के आंदोलन में मायावती क्यों नहीं?

    ShagunBy ShagunAugust 11, 2025 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    The opposition that fights against the government will grow!
    सत्ता से लड़ने वाला ही सत्ता हासिल कर सकता है
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    राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा शुरू किया गया ‘वोट चोरी’ आंदोलन अब एक बड़े जन आंदोलन का रूप लेता दिख रहा है। कर्नाटक और महाराष्ट्र में मतदाता सूची में कथित हेरफेर के खिलाफ विपक्ष के 25 दलों ने एकजुट होकर संसद से सड़क तक की लड़ाई का ऐलान किया है। यह आंदोलन न केवल चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और लोकतंत्र के मूल सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की रक्षा की मांग करता है, बल्कि यह जनता के बीच व्यापक असंतोष को भी हवा दे रहा है। सोशल मीडिया पर तटस्थ लोगों के समर्थन और विपक्ष की एकजुटता ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना दिया है। लेकिन इस जोशपूर्ण आंदोलन में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। आखिर, मायावती 25 दलों के इस गठजोड़ का हिस्सा क्यों नहीं हैं?

    मायावती की गैर-मौजूदगी: रणनीतिक चुप्पी या सियासी चुनौती?’ वोट चोरी’ आंदोलन में मायावती की अनुपस्थिति को समझने के लिए हमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मौजूदा स्थिति और उनकी राजनीतिक रणनीति को एक ताजा दृष्टिकोण से देखना होगा। उत्तर प्रदेश में कभी दलित सियासत की धुरी रही बसपा आज अपने अस्तित्व को बचाने की कठिन राह पर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीतना और वोट हिस्सेदारी का 9.83% तक गिरना मायावती के लिए गंभीर संकट का संकेत देता है। मायावती की चुप्पी के पीछे उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने की सोच हो सकती है।

    उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि बसपा न तो बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ है और न ही ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा। यह दूरी शायद समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस द्वारा उनके दलित वोट आधार पर बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश है। सपा की पीडीए रणनीति पहले ही बसपा के समर्थकों को आकर्षित कर चुकी है। इसके अलावा, सपा के साथ पुरानी तल्खी, खासकर 1995 के गेस्ट हाउस कांड और 2019 के असफल गठबंधन ने उनके रिश्तों को और तनावपूर्ण बनाया है।

    मायावती ने वोट चोरी जैसे मुद्दों पर पहले भी आवाज उठाई थी, जैसे 2024 के उपचुनावों में फर्जी वोटिंग का आरोप लगाते हुए उपचुनाव न लड़ने का फैसला। उनकी मौजूदा खामोशी इस बात का इशारा हो सकती है कि वे विपक्षी गठजोड़ से अलग अपनी राह चुन रही हैं। लेकिन जिस तरह यह आंदोलन जनता के बीच गति पकड़ रहा है, उनकी अनुपस्थिति बसपा की सियासी जमीन को और कमजोर कर सकती है।

    समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ (पीडीए) रणनीति के जरिए बसपा के दलित वोट बैंक में सेंधमारी की है। मायावती को शायद यह डर है कि ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल होने से सपा और कांग्रेस को और मजबूती मिलेगी, जो उनके कोर वोटरों को और दूर कर सकता है।

    मायावती की स्वतंत्र राजनीति की नीति भी उनकी दूरी का एक बड़ा कारण है। 5 अगस्त 2025 को उन्होंने स्पष्ट किया कि बसपा न एनडीए का हिस्सा है और न ही ‘इंडिया’ गठबंधन का। ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ का उनका नारा उनकी उस रणनीति को दर्शाता है, जिसमें वे किसी भी बड़े गठबंधन से जुड़ने के बजाय अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहती हैं। यह रणनीति उनकी छवि को मजबूत करने की कोशिश हो सकती है, लेकिन यह उनके समर्थकों के बीच भ्रम भी पैदा कर रही है, खासकर तब जब वोट चोरी जैसे गंभीर मुद्दे पर विपक्ष एकजुट है।

    प्रदर्शन में अखिलेश यादव गिरफ्तार हो गए

    दूसरी ओर, मायावती का यह तर्क भी विचारणीय है कि उन्होंने वोट चोरी का मुद्दा पहले उठाया था। नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में फर्जी वोटिंग का आरोप लगाते हुए उन्होंने उपचुनाव न लड़ने का फैसला किया था। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया कि तब विपक्ष ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। यदि यह सच है, तो मायावती की नाराजगी और अलग रहने का फैसला समझा जा सकता है। लेकिन यह भी सच है कि इस आंदोलन की व्यापकता और जनता की भागीदारी को देखते हुए उनकी चुप्पी उनके राजनीतिक प्रभाव को और कमजोर कर सकती है।

    मायावती और सपा के बीच ऐतिहासिक कटुता भी एक बड़ा कारक है। 1995 के गेस्ट हाउस कांड और 2019 के असफल गठबंधन ने दोनों दलों के बीच विश्वास का संकट पैदा किया है। मायावती ने हाल ही में सपा पर दलितों के खिलाफ छल करने का आरोप लगाया, जिससे साफ है कि वे अखिलेश यादव के साथ मंच साझा करने को तैयार नहीं हैं। इसके अलावा, विपक्ष द्वारा उन पर बीजेपी की ‘बी-टीम’ होने का आरोप भी उनकी साख को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में, मायावती शायद दोनों पक्षों से दूरी बनाकर अपनी स्वतंत्र छवि को बचाने की कोशिश कर रही हैं।

    लेकिन यह आंदोलन केवल राजनीतिक रणनीति का मसला नहीं है। यह लोकतंत्र की नींव, मतदाता के अधिकार और संविधान की रक्षा का सवाल है। राहुल गांधी का दावा कि उनके पास कर्नाटक में वोट चोरी के ‘पुख्ता सबूत’ हैं, और सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग, इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है। अगर यह आंदोलन जनता के बीच और गति पकड़ता है, तो यह न केवल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाएगा, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा को भी बदल सकता है।

    मायावती के लिए यह एक सुनहरा अवसर हो सकता था कि वे अपने दलित आधार को फिर से संगठित करें और इस जन आंदोलन का हिस्सा बनकर राष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रासंगिकता साबित करें। उनकी चुप्पी न केवल उनके समर्थकों को निराश कर सकती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या वे इस निर्णायक क्षण में अपने सिद्धांतों से समझौता कर रही हैं। अगर मायावती इस आंदोलन में शामिल नहीं होतीं, तो यह बसपा के लिए एक और रणनीतिक चूक साबित हो सकती है।

    यह समय है कि सभी लोकतांत्रिक ताकतें एकजुट हों। मायावती को चाहिए कि वे अपनी संकीर्ण राजनीतिक गणनाओं से ऊपर उठकर इस आंदोलन में शामिल हों। लोकतंत्र की रक्षा का यह मौका बार-बार नहीं आता। अगर यह आंदोलन वाकई एक बड़े जन आंदोलन में तब्दील होता है, तो मायावती की अनुपस्थिति इतिहास में उनकी भूमिका को और सवालों के घेरे में ला सकती है।

    Shagun

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