नहीं जमा लोगों को हॉरर कामेडी का तड़का ‘गोलमाल अगेन’ में

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फिल्म समीक्षा 

रोहित शेट्टी की फिल्म गोलमाल सीरिज की चौथी फिल्म गोलमाल अगेन में कोई लाजिक तो नहीं है, ये बात तो फिल्म के प्रचार में ही इस्तेमाल की गई थी, लेकिन मैजिक भी खास नहीं है, जैसा दावा किया गया था। हारर-कामेडी का ये कांबिनेशन बहुत ज्यादा प्रभावशाली नहीं बन पाया।

वैसे तो रोहित शेट्टी ने गोलमाल में कहानी पर ज्यादा जोर नहीं दिया, लेकिन कहानी के नाम पर जो भी ताना बाना रचा गया, उसमें एक बार फिर गोपाल (अजय देवगन), माधव (अरशद वारसी), लक्ष्मण (श्रेयस तलपड़े, कुणाल खेमू) और लकी (तुषार कपूर) की टीम है। इस बार ये टीम ऊटी के जमनादास अनाथालय में पंहुचती है, जहां उन सबकी परवरिश हुई है। अनाथालय के मालिक जमनादास की तेहरवीं पर ये टीम एक साथ जमा होती है। इसी अनाथालय के करीब बने बंगले में ऐना (तब्बू) रहती है, जिसे भूतों से बातें करने की शक्ति मिली हुई है और वो अतृप्त आत्माओं की इच्छाओं को पूरा करने का काम करती है। गोपाल को भूतों से बहुत डर लगता है और पता चलता है कि जमनादास के अनाथालय में एक आत्मा रहती है। ये भी पता चलता है कि बंगलुरु का बिल्डर वासु रेड्डी (प्रकाश राज) इस आश्रम को बंगलुरु शिफ्ट करना चाहता है। जमनादास का ये अनाथालय उनकी मौत के बाद दुबई में रहने वाले निखिल (नील नितिन मुकेश) के नाम है। जमनादास के अनाथालय में भूत कौन है? इस आत्मा का गोलमाल की टीम के साथ क्या कनेक्शन है, इन सवालों के जवाब फिल्म देखने के बाद ही मिल पाएंगे।

रोहित शेट्टी ने इस बार गोलमाल टीम को लेकर कामेडी और हारर का प्रयोग किया, लेकिन मामला गड़बड़ा गया, इसकी सबसे बड़ी वजह फिल्म की लेंथ है। फिल्म बहुत ज्यादा लंबी है और खिंचती चली जाती है। पहले हाफ में कामेडी के भरपूर मसाले हैं, लेकिन दूसरे हाफ में फिल्म कमजोर भी हो जाती है और इसकी लय भी बिगड़ जाती है। फिल्म की एक दूसरी कमजोरी उन गैग्स का ओवरडोज है, जिनको रोहित शेट्टी पिछली तीनों गोलमाल में इस्तेमाल करते आ रहे हैं। पहले हाफ में ये गैग्स ही मनोरंजन करते हैं। संगीत के मामले में भी फिल्म कमजोर है। टाइटल सांग के अलावा कुछ ठीक नहीं। चैन चुराया मेरा…. का रीमिक्स वर्शन प्रभावशाली नहीं है। एडीटिंग खराब है। कैमरावर्क अच्छा है। एक्शन में इस बार रोहित शेट्टी ने कारों को आसमान में नहीं उड़ाया। निर्देशक के तौर पर रोहित शेट्टी औसत साबित हुए। गोलमाल सीरिज की ये फिल्म बाकी फिल्मों से कमजोर रही, तो इसका दोष रोहित शेट्टी के निर्देशन और कमजोर लेखन को जाता है।

फिल्म की अच्छी बातों में गोलमाल टीम के साथ साथ तब्बू की शानदार परफारमेंस रही। तब्बू ने फिर साबित किया है कि वे अपने दौर की बेहतरीन अभिनेत्री क्यों मानी जाती हैं। अजय देवगन पर उम्र झलकती है, लेकिन एक्शन में वे अब भी कमाल हैं। गोलमाल टीम के बाकी कलाकार ठीकठाक हैं, लेकिन अच्छा कोई नहीं। जानी लीवर और मुकेश तिवारी सामान्य हैं, लेकिन संजय मिश्रा अपना रंग जमाते हैं। प्रकाश राज, नील नितिन मुकेश, सचिन खेड़ेकर भी सामान्य हैं। नाना का सरप्राइज बेहतरीन है। इसे अच्छा कहा जा सकता है, लेकिन बहुत अच्छा नहीं। यही फिल्म की सबसे बड़ी असफलता है।

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