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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    पूस की ठंडी रातें और दिन भी?

    ShagunBy ShagunJanuary 21, 2022 Current Issues No Comments12 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    आज से लगभग चार-पांच दशकों पूर्व चार महीने बारिश का चौमासा हुआ करता था वैसे ही ठंड भी भरपूर कड़ाके की चार महीने पड़ाती थी, यह कातिक यानी कार्तिक मास से प्रारम्भ हो कर अगहन, पूस और माघ के महीने तक सबको ठिठुराती रहती थी।

    हाँ पहले जब-जब ठंड पड़ती थी तो उसका जिक्र आजकल जैसा मीडिया में नहीं होता, और नही रोज का घण्टे-घण्टे का तापमान बच्चे-बच्चे तक को मालूम रहता था। मौसम विभाग शायद उस समय था ही नही यदि था भी तो शायद इतना सक्रिय नहीं रहा होगा।

    आज तो समाचार-पत्रों को छोड़िये चौबीस घण्टे सबसे पहले सबसे तेज़ टी.वी. चैनलों में ‘नमक-मिर्च’ लगाकर परोसी जाने वाली राजनीति, अपराध अथवा फिल्मों की ही नहीं मौसम की जानकारी भी चटखारे लेकर प्रस्तुत करते हैं जैसे- “ठंड ने रोकी ज़िन्दगी की रफ्तार”, “सर्दी ने तोड़ा पिछले पचास सालों का रिकार्ड”, जानलेवा शीत लहर से जनजीवन अस्त-व्यस्त, बढ़ती हुई ठंड से सड़कें वीरान घरों में दुबकने के लिये मजबूर लोग, पहले यह मौसम की इतनी ताज़ा अपडेट्स कहाँ थीं, बस ठंड पड़ रही है तो होने दो। ‘माघ-पूस के जाड़े, ठंडो मरें उघाड़े’। संक्रांति के बाद माघ का महीना लग जाता और दिन तिल-तिल कर धीरे- धीरे अग्रसर होने लगता तब हम सुनते ‘माह (माघ) तिल तिलुआ बाड़े, फगुना गोड़ पसारे।’ और अगहन में दिन इतने छोटे होते कि’ अगहन, चूल्हे पर दाल बनाने के लिए पानी गरम होने को रखा कि इतने में ही दिन निकल गया।

    दिवाली पर कहा जाता था ‘दीये’ भर ठंड उतर आती है और देवउठानी एकादशी यानी ‘गन्ना ग्यारस/सांठा खानी ग्यारस’ पर गाड़ी भर ठंड आ जाती है। अब वो ठंड कहाँ जब दांत बजा करते थे दांत किटकिटाने को दतौडी बजना कहते थे, “आज भैया ऐस ठंड पड़ा दतौडी बाजत हौ” हाथ पैरों की अँगुलियाँ सुन्न पड़ जाती थीं और इनके पोरें में सिकुड़ कर झुर्रियां पड़ जातीं, जिनसे कहते हाथों में डुकरिया पड़ गईं।

    गांव में मिट्टी के कच्चे घर ऊपर खपरैल और दो पल्ले वाले अध बंद थोड़ा खुले रहने वाले किबाड़, के मध्य से जब जोर की ठंडी हवा दलहन में क्या बेख़ौफ़ प्रवेश करती, उसके कहने ही क्या? घर में भले कमरे चार हो परन्तु परिवार सदस्य चौदह भला सबको कहाँ खटिया नसीब नीचे ज़मीन पर ही सामूहिक बिस्तर लगता, घर के बुजुर्ग तो खुली दलहानों में ही सो जाते।

    रजाई होती तो वह बाबा या पिताजी के कब्जे में होती, हमें मिलती गुदड़ी जिसे स्थानीय भाषा में कथरी भी कहते, इसे घर के फटे-पुराने चादरों और साड़ियों से बनाया जाता था, जो रजाई पुरानी हो जाती वह हम इस्तेमाल करते, इसकी रुई पुरानी होने से और ज्यादा खींचतान करने से अपनी जगह छोड़ देती तो इसे ओढ़ने पर जगह-जगह से बाहर का उजाला दिखता जिससे कहते गिलाफ में पिल्ले पड़ गए, यह कहने को रजाई होती पर ठंड सहने को एक सजा। पूरी रात उनींदा सोने के बावजूद सुबह फिर से वही रोज मर्रे की क्रिया कलापों में लग जाना। उस समय ठंड के दिनों में कोई मेहमान आता तो कहता ‘भैया खाने को भले मत देना, परन्तु रात को ओढ़ने-बिछाने को ठीक से ज़रूर देना। कई अच्छे-अच्छे लोग कहते भैया खाने को अच्छे से अच्छा मिलेगा परन्तु ओढ़ने-बिछाने की बात मत करना। जब किसी के घर दो चार मेहमान आ जाते तो सहवासी के घरों से रजाईयों का आदान-प्रदान हो जाता, किसी नई रजाई में हमने घुसकर देखा क्या नरम-नरम और गरम-गरम, परन्तु यह दिवा-स्वप्न जल्द ही भंग हो जाता जब कोई फटकार कर यहां से भगा देता चलों अपने बिस्तर में यानी अपनी गुदड़ी में। सोने के बाद घण्टे भर तो बिस्तर में कंपकंपी ही नहीं जाती थी, घुटने पेट से ऊपर छाती को लगाने का मन करता तब थोड़ा सा जाड़ा काबू में आता, खुलकर पैर पसारकर सोने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, और कहीं छोटे भाई-बहिन के साथ गुदड़ी साझा कर रहे हैं तो सारी रात लड़ाई के साथ खींचतान में तो कोई पूरी गुदड़ी ही अपनी तरफ खींच लेता मेरे पास कुछ नहीं और यही आरोप एक दूसरे पर लगाते हुए कब थककर सो जाते पता ही नहीं चलता।

    हर घर के आंगन या दलहान में अलाव ज़रूर जलता इस ठंड में ग्रामीण जीवन का अनिवार्य हिस्सा होता यहां तापते हुए पुराने किस्से कहानी होते, पहेलियां भी पूँछी/बूझी जाती तो कुछ गाना-बजाना हो जाता, जब अलाव शांत हो जाता तो इसके गरमागरम अधबुझे अंगारों को किसी गुरसी या तगाड़ी में भरकर खटिया के नीचे सरका देते तो पूरा बिस्तर गरम हो जाता जो बड़ा सुख देता। अलाव की ठंडी हुए अंगारों में बची हुई गरम राख को तगाड़ी से खखुर कर घर के आंगन में गिरते जहां घर के पालतू कुत्ते उसमें लेट कर अपनी ठंड भगाते। ठंड के बारे में अक्सर लोग कहते – ‘ बच्चों से मैं बोलूं नहीं, जवान मेरे भाई, बुड्ढों को मैं छोड़ूँ नहीं चाहे ओढ़े चार रजाई।’ यानी सर्दी का सितम भी आदमी की उम्र देखकर होता है।

    ठंड के दिनों में जलता हुआ चूल्हा सबकी आस्था और ऊर्जा का सबसे बड़ा केंद्र होता, इसपर अम्मा रोटी बनाये दाल का अदहन रखे या सामने कंडे लकड़ी के अंगारों पर मिट्टी के बर्तन में दूध ओटने रख दे, इसी में कभी-कभी हाथ से बने मोटे-मोटे टिक्का सेंक दे, इस भभून्दर में टमाटर आलू या भांटा दबा दे भुनने के लिए, सुबह-सुबह बड़े से मटके में दही बिलोने का काम भी बड़ा मजेदार होता, पांच फीट लम्बी मथानी से अम्मा दही को मथती भरी सर्दियों में उसकी डोर को खींच खींच कर पसीना आ जाता, हम से भी कभी कभी डोर खिंचवाते अम्मा डरती और कहती मथनियाँ मत फोड़ दिहो भैय्या। मख्खन निकाल कर घी बनाया जाता, इस मक्खन का एक अंगारे पर पहले होम छोड़कर प्रणाम किया जाता। गांव भर की महिलाएं अपनी अपनी मटकियां लेकर माठा लेने आती।

    वह धीमी-धीमी आंच पर सिंके हुए मोटे- मोटे टिक्कड़ हों, बिर्रे या मक्के-ज्वार की रोटियां आटा भी हाथ की चक्की का पिसा हुआ, इन पर ताज़ा नैनू घी लगाकर,भरने के साथ या औंट रहे सोंधे दूध के साथ मीस कर खाने का आनन्द ही कुछ और था। ‘घम्मर-घम्मर दूध मथानी, दही को लोंदा खाये जिठानी ‘ जैसी बातों का उस समय तो नहीं थोड़ा-थोड़ा अर्थ नौजवानी की दहलीज़ पार कर आज समझ में आता है। रात की बची हुई मक्के की बासी महेरी गरमागरम दूध के साथ, यह आनन्द किसी ‘फाइव-स्टार’ होटल में या छप्पन भोग के व्यंजनों में कहाँ।

    सर्दियों में गांव की पाठशाला भी अनोखी होती, जैसे ही स्कूल की घण्टी बजती, अपना-अपना बस्ता जिसे कपड़े का झोला कहना ही ज्यादा उपयुक्त होगा, लेकर दौड़ पड़ते नँगे ही पांव, चाहे जैसे कपड़ों में हो, स्कूल सर्दियों में अक्सर खुले मैदान में लगता , *शीत की धूप में कमरे से बाहर टाटपट्टी* पर बैठकर पढ़ने का अपना अलग ही आनन्द, पास से गुजरती गाय-भैंसें खेतों को जाती बैलगाड़ियां, एक गुरुजी के हवाले पूरे गांव के बच्चे और सभी कक्षायें।

    कोई स्लेट पर लिख रहा होता, तो कोई पाठ वांच रहा होता तो कोई बड़ी कक्षा का बच्चा छोटी कक्षा के अपने साथियों को *छोटा ‘अ ‘ से अनार*, बड़ा ‘आ’ से आम या ‘दो एकम दो और दो दूनी चार’ के पहाड़ों का समवेत स्वर में वाचन करवा रहा होता, ऐंसे में कोई गलती होने पर यदि मास्साब एक दो बेंत हाथ की हथेलियों या पीछे पुट्ठे पर कुदा दें तो मुंह से गरम-गरम भाप और आंखों से गरमा-गरम आंसू झर-झर बह निकलते, वो ठंड की मार भी बहुत भयानक प्रभावी होती, मगर क्या करें सभी घर वाले मास्टर जी अलिखित अनुबंध करते थे ‘मास्साब हड्डी-हड्डी हमारी खाल-खाल तुम्हारी।’ ऊपर से यह भी कहा जाता-‘ पिटाई होय धमाधम, विद्या आये झमा-झम! इस भीषण पिटाई की त्रासदी से कोई बच्चा अछूता नही होता कई बच्चें तो स्कूल से ऐंसे भागते कि – *’ओना मासी धम, बाप पढ़े न हम।’*

    कई बार घर के शादी-ब्याह में उस समय टेंटहाउस जैसी सुविधाएं और किराए के गद्दे-रजाई नहीं मिलते थे तो मेहमान पूरी रात आग ही तापते रहते, बड़े-बड़े लकड़ी के मोटे ठूंठ जल रहे हैं और किस्से-कहानीयों की चौपाल जमी हुई है, आग के साथ ही धुँआ भी है और यदि धुँआ किसी की तरफ उड़कर उसकी आँखों में भर जाता तो लोग कहते *’तू बड़ो किस्मत वालो है छोड़ा तेरी सास तेरे से भोत लाड़ करेगी*। सामने वाला धुंए से धुंधलाती आंखों में आंसू एक आंख बंद करके संतोष कर लेता की जिन्हें धुँआ नहीं लगा उनसे भग्यशाली तो मैं हूँ ही क्योंकि मुझे लाड़ करने वाली सास मिलेगी और को नही और चिलम-बीड़ी, पान-सुपारी के साथ सुबह हो जाती मुर्गा बांग देने लगता, कोई इसी हालत में कम्बल या चादर लपेटे हुए आग के सामने ऊंघ कर झपकी लेले यही बहुत है।

    अलाव तापते वक्त कभी-कभी आग से खेलना भी बड़ा अच्छा लगता, यानी आग का जलता हुआ लूघर उठा लिया उससे किसी को डराना, या जलते लूघर को गोल गोल हवा में जोर से घुमाना जिससे आग का एक पहिये सी गोल आकृति बनती, बड़ा आनन्द आता इस खेल में पास बैठे कोई बड़े उम्र के काका- दादा तुरन्त टोकते -‘आग के छेड़-छाड़ मत करो, आग खाओगे तो अंगारे मूतोगे।’ यदि कोई बच्चा पांव से जलती हुई लकड़ी को तनिक सरका भी दे तो तो तुरंत उसे टोका जाता -‘ बुरी बात ऐंसा नहीं करते अग्नि देवता हैं नाराज हो जहिएँ चलो पैर पड़कर माफी मांगो।’

    स्याह सी अंधेरी रात सन्नाटे भरी ठंडी रात, धधकती हुई लकड़ियां ! दूर कहीं सियारों की हुककू-हुआ रोने की आवाज़ आती तो बड़ा विचित्र और डरावना लगता, इन सियारों को जिन्हें बच्चे *’लड़ईय्या’* कहते उसकी आवाज सुन कर कभी-कभी गांव के कुत्ते भी उनके स्वर में स्वर मिलाकर ऊंची आवाज में रोने लगते तो वातावरण बड़ा ही भयावह हो जाता, क्योंकि बुजुर्ग कहते -‘कुत्तों का रोना अपशकुन होता है, इनको यमराज दिखते हैं, कहीं कोई मरने वाला तो नहीं।’ यह सुनकर और भी डर लगता खासतौर से जिसके घर कोई बीमार- लाचार पड़ा हो उसके दिल से पूंछो ?

    उन दिनों गांव में बिजली नहीं थी रात में उजाले के लिए लालटेन भी एकाध बाकी घासलेट की टिमटिमाती हुई एक-दो चिमनियां, पूरे गांव में एकाध ट्रांजिस्टर यानी रेडियो सब उसे कौतुहल से टुकुर-टुकुर निहारते हुये यह समझते की अंदर बैठा कोई मनई बोल रहा है, बड़े ही आकर्षण का केंद्र, वो भी बैट्री अथवा सेल से चलने वाला, सब उसे घेरकर सुनने के लिए बैठे रहते चाहे कोई गीत बज रहा हो या नाटक आ रहा हो अथवा समाचार सबकुछ कौतूहल, आश्चर्य, और आनन्द से भर देने वाला होता, जब सेल कमजोर पड़ जाएं तो रेडियों की आवाज़ भी कमजोर और फिर सेल खत्म होने के बाद अगली बार कब आएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं थी, साथ ही इस बात की भी फटकार, की रेडूआ कम बजाया करो भैया सेल कोई फ्री में तो आवत नहीं।

    सर्दी के दिनों में *मकर सक्रांति के पर्व का स्नान* स्मृति पटल पर उभर कर आज भी याद आता है। अम्मा कहती ‘बिना नहाए किसी को लड्डू खाने को नहीं मिलेंगे, जो बिना नहाए खायेगा अगले जन्म में ढोर बनेगा।’ सो भले कितनी ठंड हो नहाना ज़रूरी था। हमारे गांव में कोई नदी-पोखर नहीं था सो कुएँ पर बड़े भाईयों के साथ रस्सी-बाल्टी लेकर, पर्व का स्नान करने पहुंच जाते, सुबह दिन निकलने से पहले बदन को आरी सी चीरती ठंडी हवाये, सूर्य भगवान सिरे से गायब, अव्वल या तो निकलते ही नहीं और कभी निकलें भी तो घने कोहरे के मध्य से झँकते हुये एसे लगता मानो वह सबको चिड़ा रहे हैं वह घने कोहरे जो उन्हें निकलने ना दे रहा हो, ऐंसे में चारों तरफ खुले खेत और कुएँ के ठंडे पानी से नहाना, एसे में ठंड से जो दांत किटकिटाते थे वो आज भी याद हैं। नहाने के बाद दौड़कर घर आते ही चूल्हे के सामने बैठ ठंड भगाते, फिर लड्डू खाकर संक्रांत मनाते।

    आप हम में से जिन लोगों ने भी ग्रामीण जीवन को जिया है वे भली-भांति यह जानते कि ठंड के दिनों में त्वचा रूखी हो जाती पूरे हाथ पैर यहां तक कि नाक, ठोड़ी और गाल भी जगह-जगह से चिटक जाते , कोई क्रीम बगैरा तो उपलब्ध नही हुआ करता था, और नहीं नहाने के लिए अलग से साबुन होता, यह भी ज़रूरी नहीं तो कपड़े धोने के साबुन से ही नहा लेते तो शरीर पर बड़ी चिन- चिनाहट होती , रही सही कसर सरसों का शुद्ध असली का तेल पूरी कर देता जिसे लगाने पर आँखो के पूरी त्वचा पर मिर्च सी जलन लगती तेल भी सिर में हथेली भरकर लगाया जाता कि कनपटियों के बगल से धार बहने लगे , पैरों की फटी हुई बिवाईयों को भरने के लिए कुछ लोग बैलगाड़ी के चक्के में लगाये जाने वाले ओंगन यानिकि ग्रीस और कालिख लिये खराब तेल को उस पर लगा लेते, कुछ भाग्यशाली लोग ही मोमबत्ती के टुकड़े सरसों के तेल में गरम कर उसे शीशी में भरकर रख लेते और उसका प्रयोग ठंड में रूखी त्वचा को नरम करने में प्रयोग करते।

    ठंड को जिसने भयानक रूप से भुगता हो वही *मुंशी प्रेमचंद* की ‘पूस की एक रात ‘ कहानी का आनन्द ले सकता है कैसे हल्कू और उसके पालतू कुत्ते जबरा को ठंड लगती है। *पूस की अंधेरी रात*। आकाश पर टिमटिमाते तारे भी ठिठुरे हुए से आभास होते थे, हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पत्तों की छतरी के नीचे बांस के खटोले पर अपने पुराने गाढ़े की फटी चादर ओढ़े पड़ा था, साथ में उसका संगी, कुत्ता जबरा पेट में मुंह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था।’ इस कहानी को पढ़कर आप काँप उठेंगे ,और इसको सजीवता से अनुभव तभी कर सकेंगे जब कभी आपने भी कड़कती सर्दी झेली हो।

    यह अक्षरशः सच है कि ठंड पहले भी पड़ती थी और आज भी पड़ती है, परन्तु पहले लोगों की विपन्नता अलग थे सो ओढ़ने पहनने की व्यवस्थाएं कम हुआ करती थी आज लोग सम्पन्न हैं बहुधा लोगों के पास अच्छी सुख सुविधाएं पक्के मकान हैं , ऊनी गर्म कपड़े हैं , रूम-हीटर हैं, अच्छा भोजन उपलब्ध है, ऊपर से पहले की अपेक्षा ठंड भी कम है फिर अब इंसान बहुत कोमल सुख सुविधा भोगी हो गया है सही कहा जाये तो उसे किसी मौसम का भरपूर आनन्द लेना भी नहीं आता, उसे जरा सी ठंड में हीटर और जरा सी गर्मी में कूलर,पंखे,एसी चाहिए। गांव के अन्य गरीब मजदूर अपने झोंपड़ों में प्रेमचंद के हल्कू की तरह कैसे ‘जाड़ा’ काटते होंगे, यह बात सोचकर गरम कमरे में आज भी शीत लहर जैसी कंपकपी छूटने लगती है।

    समाप्त

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