अंशुमाली रस्तोगी
मेरा कोई गुरु नहीं। मैंने किसी को गुरु माना नहीं। गुरु बनाना या गुरु होना दोनों, मेरी निगाह में, घाटे का सौदा हैं। गुरु या तो आपको बर्बाद कर देगा या फिर खुद बर्बाद हो जाएगा। मुझे हैरानी होती है, लोग गुरु बना कैसे लेते हैं! गाड़ी गुरु के बिना भी आराम से चल सकती है। जरूरी नहीं गुरु की टांगों पर टिक कर ही नैया पार की जाए। अगर उसने बीच में आपको डूबो दिया तो! तब कहां जाएंगे? किसका दरवज्जा खटखटाएंगे? किसका घण्टा बजाएंगे? इसीलिए मैं कहता हूं, गुरु से दूर रहिए। गुरुवाद से दूर रहिए। न गुरु की पीठ खुजाइए न अपनी खुजलवाइए।
लेखन में शुरू से मैंने इस बात का खास ध्यान रखा कि किसी गुरु के संपर्क में न पड़ूं। न उसका लिखा पढ़ूं, न उसे अपना लिखा पढ़ाऊं। मेरा मानना है, अगर अपने लिखे की कॉपी किसी से जंचवाते हैं तो 80 फीसद नम्बर आपके वैसे ही कट जाते हैं। गुरु आपके लिखे को सुधारेगा तो नहीं उल्टा बिगाड़ जरूर देगा। ऊपर से नसीहत भी देगा- बेटा, ऐसे नहीं वैसे लिखा करो। क्या फायदा इस झंझट में पड़ने से। अपना घण्टा आप ही बजाएं तो बेहतर।
मैं यह भी नहीं कहता कि सारे गुरु एक ही थाली के चट्टे-बट्टे होते हैं, कुछ शानदार भी होते हैं; पर उनकी संख्या न के बराबर है।
साहित्य का गुरु बड़ा कपटी होता है। अंदर से कुछ बाहर से कुछ नजर आता है। जिंदगीभर आपसे अपनी पीठ खुजलवाता रहेगा लेकिन आपके नाखूनों को खुट्टल कर देगा। इस काबिल भी नहीं छोड़ेगा कि नेलकटर से अपने नाखून भी काट सको।
व्यंग्य लेखन में भी मेरा कोई गुरु नहीं। जो खुद को गुरु मनवाने की कोशिश में लगे रहते हैं, उन्हें मैंने ‘हाशिए’ पर डाल रखा है। वे व्यंग्य के गुरु नहीं ‘आत्महंता’ हैं। व्यंग्य के तथाकथित गुरुओं से खुद को बचाकर रखिए। अपना लिखिए। अपना जांचिए। जब मन खराब हो तो दो घूंट गले से नीचे उतारिए और चादर तानकर सो जाइए।







