यह तस्वीर हैदराबाद विश्वविद्यालय की है। दिल दहला देने वाली हैं यह तस्वीरें। यह पूंजीवाद के चाकरों और गुलामों की आमद का सबूत है। सैकड़ों बुलडोजर इन मासूम जानवरों के आशियाने को रात दिन ढहा देने पर आमादा हैं। मनुष्य के रचनात्मक कार्यों को अंजाम देने वाली और प्रकृति का एक सुंदर सामंजस्य के साथ मानवीकरण और तादात्म्य स्थापित करने वाली मशीनें आज पूंजीवादी सरकार के हाथों में आकर इस सभ्यता के विध्वंस का पर्याय बन चुकी हैं।
बुलडोजर आज विध्वंस का पर्याय बन चुका है। यह दहलाता है, खौफ पैदा करता है और मानव हाथों के विस्तार के बजाय उन्हें तोड़ देने वाला प्रतीत होता है। घरों, जंगलों से लेकर आज इस बुलडोजरी आतंक से कुछ नहीं बचा है। यह मानों मेसोज़ोइक युग के दैत्यों का आगमन है जिनके कदमों के नीचे आने वाले कुचल दिये जाएंगे। यह सब होगा विकास के नाम पर। यही है रेवंत रेड्डी और मीडियोकर ‘अभिनेता’ राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के विकास की स्कीम, जिसका रास्ता पशु, पक्षियों और मनुष्यों की लाशों और खून की नदियों से होकर गुज़रता है। यह अपने ही भूगोल अपने ही सरज़मीं पर प्रवासी बना देने की स्कीम है। यह विकास सौंदर्य नहीं, सौंदर्य का विकृतीकरण है।

तस्वीर में नीचे दिख रहे पीले रंग के छोटे–छोटे यह कोई ज़मीन पर रेंगने वाले जीव जंतु नहीं, बल्कि यह तेलंगाना कांग्रेस सरकार की जोंकें हैं जो जिस चीज से चिपक जाती हैं, उससे उसके सौंदर्य का हरण कर लेती हैं। यह प्रकृति का मानवीकरण नहीं, पूंजीवादीकरण है। यह चंद मुनाफाखोरों की जेबें गरम करने की योजना है जिन्होंने अपने इन कांग्रेसी चाकरों की झोली चुनावी चंदे से भरी होगी। इस विनाश का विरोध करने वालों को लाठियों से पीटा जा रहा है और जेल भेजा जा रहा है। भारत जोड़ो यात्रा करने वाले छात्रों की हड्डियों को तोड़ रहे हैं और जंगलों को तबाह कर रहे हैं। यह तमाम प्रगतिशीलों और लिबरलों और कम्युनिस्टों के चहेते राहुल गाँधी वाली कांग्रेस है। स्टालिन की आत्मा तक को अपमान भरे शब्दों से छील देने वाले भारतीय कम्युनिस्टों के प्रिय बुर्जुआजी नेता राहुल गाँधी की कांग्रेस इस तबाही के विरोध में आने वाले हर छात्र को अपने सरकारी खाकी लठैतों से पिटवा रही है। इसके बावजूद भी कुछ लोगों को लगता है कि यह सब राहुल गाँधी को ज्ञात नहीं है। आज हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्रों को स्पष्ट हो चुका है कि उनका अडानी अंबानी वाला नारा बस एक नाटक था!
विनाश की कार्रवाई जारी है। लेकिन किसी लेखक संगठन या किसी ओर से कोई टिप्पणी फिलहाल नहीं आयी है। विश्वविद्यालय के कई छात्रों ने लेखक–लेखिकाओं के पोस्ट में जाकर व्यक्तिगत रूप से टैग भी किया लेकिन किसी ने कुछ कहा नहीं है। यह संवेदनशील मुद्दा है। इधर यह हुआ है कि तमाम लेखक–लेखिकाएं तमाम ज़रूरी और संवेदनशील मुद्दों पर एक साथ आ रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है। हमें उम्मीद है कि वे फिर सामने आएंगे और छात्रों का साथ देंगे।
- मुकुल मिश्रा







