सावन की बात : अजीत कुमार सिंह
भगवान शिव का मास सावन आ गया है थाम लीजिये देव की उंगली सब पार लगा देंगे वे ! एक नन्हा बच्चा जब चलना सीखता है तो वह पिता की उंगली थामता है उसी उंगली को थाम कर वह संसार और संसारिकता को जानता है और पिता क्या जीवन के उबड़ खाबड़ पथरीले पथ पर चलते समय उसे किसी उंगली की आवश्यकता नहीं होती! अवश्य होती है वह अदृश्य रूप में अपने समाज की उंगली थामता है उसका भरोसा उसके समाज पर होता है और समाज क्या वह यूँ ही जुड़ा रहता है उसे किसी भरोसे की आवश्यकता नहीं है।
समाज सभ्यता की उंगली थामता है और सभ्यता थामती है उस देव की उंगली, जिसके ऊपर वह आँख मूंद कर विश्वास करती है देव की उंगली थामे चलती सभ्यता के पास जिस परिस्थिति का कोई हल नहीं होता उसे वह देव पर छोड़ कर निश्चिन्त हो जाती है देव हैं न, वे सब देख लेंगे सनातन सभ्यता के लिए शिव वही देव हैं महादेव समुद्र मंथन से निकले रत्नों को आपस में बांट चुके देवों, दानवों ने हलाहल विष निकलते देखा, तो एक स्वर में लगे महादेव को गोहराने सब एकाएक भूल गए कि वे अब तक लड़ रहे थे कई बार विपत्ति भी लोगों को एक कर देती है अमृत के लिए लड़ने वाले देव-असुर विष देख कर एक हो गए लगे शिव शिव चिल्लाने वही पिता वाला भरोसा महादेव आये और पी गए विष निश्चिन्त हो गए देव दानव हर पिता पी लेना चाहता है अपने बच्चों के जीवन का सारा विष जो बच्चों के जीवन का विष स्वयं पीता है वही पिता है।
भगवान श्रीराम सभ्यता के नायक थे, युग निर्माता समाज को मर्यादा की सीख देने स्वयं जगत के पालनकर्ता मानव रूप धर कर आये थे सामान्य जन की सेना बना कर तात्कालिक विश्व के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को समाप्त करने निकले श्रीराम कुछ पल के लिए ठहरे महासमुद्र तट पर शक्ति थी, बल था, साहस था, और आत्मविश्वास भी था फिर भी, मनुष्य रूप में आये थे तो मानवीय व्यवहार करना था न तब उस महानायक ने सोचा, सबकुछ है पर वह उंगली नहीं जिसे थाम कर समुद्र पार किया जाय उसके बिना तो काम नहीं ही चलेगा कोई वृक्ष तो हो जिसकी छाया में सुस्ताया जाय।
उन्होंने हाथ जोड़े और गोहराया “नमामि शमीशान निर्वाण रूपम, विभुं व्यापकं ब्रम्ह वेदस्वरूपं…” फिर क्या आये रामेश्वर भगवान राम ने अपने हाथों से स्थापना की उनकी फिर उनकी उंगली थाम कर आगे बढ़ी बानर-भालुओं की सैन्य और संसार की सर्वश्रेष्ठ सेना और सेनापतियों को परास्त कर दिया महादेव की कृपा हो तो क्या असम्भव है मनुष्य परिस्थियों का दास है समय क्षण भर में विजेता को पराजित कर देता है और यही कारण है मनुष्य के मन में बसे संशय का हर नया कार्य करने के पहले मन में संशय होता है कि सफलता मिलेगी या नहीं कार्य सही है भी या नहीं इस संशय को दूर करने का एकमात्र उपाय यही है कि देव की उंगली थाम ली जाय शिव की उंगली थाम ली जाय फिर सब शुभ ही होगा शिव के पास अशुभ के लिए कोई स्थान ही नहीं।







