यूपी बिकता है, बोलो ख़रीदोगे !

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नवेद शिकोह

पहले जनतंत्र मीडिया की ताकत होती थी अब धनतंत्र है। इसलिए पहले जनतंत्र मजबूत करने यानी जनता और उनका विश्वास क़ायम करने के लिए जनसरोकारों से जुड़ी खबरों की अहमियत थी। अब धनतंत्र मजबूत करने के लिए चाटूकारिता या ब्लैकमेलिंग का कंटेंट तय होता है। इसलिए न्यूज चैनल जनतंत्र से धनतंत्र की तरफ बढ़ रहे हैं।

चैनलों के बाजार सजे हैं। अलग-अलग दामों में अलग-अलग राज्य बिक रहे है। पचास लाख से एक करोड़ रुपए महीना निकालने का लक्ष्य है। टॉप क्लास के चैनलों के क्षेत्रीय ब्रांड के चैनल हैड को करीब एक करोड़ रुपये महीना निकालना होता है।

दूसरे दरजे के गैर ब्रांड चैनल पचास लाख मासिक तक में सूबा बेच रहे हैं।बस यूपी कुछ ज्यादा मंहगा है। इस सूबे के दाम पचास लाख प्लस हैं। यानी करीब साठ लाख महीना। दो लाख रोज। सालाना में बात की जाये तो यूपी से सात करोड़ का वार्षिक बिजनेस हासिल करना होगा।

यूपी में ज्यादा मारामारी है। यहां धनतंत्र की परवाह किये बिना एक बड़े टीवी पत्रकार जनतंत्र चलाने की कोशिश कर रहे थे। इन्हें ना माया मिली ना राम। जरुरत के हिसाब से ना धन ला पाये और ना टीआरपी। अब इन्हें विदा करके चैनल के मालिक ने दूसरी पार्टी को तकरीबन साठ लाख मासिक वसूली के लक्ष्य पर उत्तर प्रदेश का सर्वेसर्वा बनाया है।

विदा होने वाले पूर्व यूपी चीफ टीवी पत्रकारिता का बड़ा नाम हैं। करीब बीस से अधिक वर्षों तक एक बड़े चैनल में बड़े पद पर रहे थे। वहां से खाली होने के बाद दूसरे बड़े चैनल मे आये पर टिक नहीं पाये। सैकेंड लाइन के इस चैनल की यूपी की जिम्मेदारी संभाली तो ज्यादा दिन तक लक्ष्य के अनुसार रेवन्यु का इंतेजाम नहीं कर सके।

इनका एक पुराना शागिर्द भी खाली हो गया। जिसने अपनी वॉल पर साफ इशारों में खुलासा किया है कि लगभग साठ लाख की बोली पर चैनल के मालिक यूपी बेच रहे हैं।अब जनतंत्र से नहीं धनतंत्र से ही पत्रकारिता की गाड़ी खीची जा सकती है।

करीब डेढ़ वर्ष बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है। अगला वर्ष चुनावी साल होगा, इसलिए लाइजनर्स बड़ी वसूली करने के लक्ष्य की चुनौती स्वीकार कर भी रहे हैं। उम्मीद है कि सरकार और विरोधी दल चुनावी वर्ष में तगड़ा पैकेज देंगे। और छुटपुट कमाई रिपोर्टर की खूबियों पर डिपेंड करेगी।

बड़े खर्च और बड़ी वसूली की चुनौती स्वीकार करने वाले चैनल ऐसे पत्रकारों को काम पर रखेंगे जो भले ही खाटी पत्रकार ना हो पर धन वसूलने की जुगाड़ रखता हो।

देश की राजनीति और देश की पत्रकारिता दोनो की नज़र में उत्तर प्रदेश काफी क़ीमती है। इस सूबे का चुनावी वर्ष नज़दीक है इसलिए न्यूज़ चैनल मालिक यूपी को मंहगे दामों बेच रहे हैं। ख़रीद-फरोख्त और सौदेबाज़ी हो रही हैं। बोलियां लग रही हैं, नीलामी हो रही है। चैनल वालों ने यूपी की बोली पचास हज़ार से शुरू की है। जो लाइज़नर मासिक पचास लाख से जितना ज्यादा देगा उसे उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दे दी जायेगी। करीब पचपन से साठ हजार देकर यूपी में चैनल के अधिकार और संचालन की जिम्मेदारी निभाने वाला फिर इससे ज्यादा कमाने की जुगाड़ करेगा।

ऐसे लोगों की भर्ती करेगा जो कम से कम दो लाख रुपये से अधिक रोज कमवा सकें। चाहे वो सरकारी विज्ञापन से हासिल करें, ना हो तो सरकार के इशारे पर न्यूज कंटेंट तय करके सरकारी विज्ञापन हासिल करें, ब्लैकमेलिंग करें, पेड न्यूज चलायें, राजनीति पार्टियों से धन लें, विपक्ष से सत्ता विरोधी सुपारी लें, संभावित प्रत्याशी से लें, मंत्री या ब्यूरोक्रेट्स से लें या कही से भी, कैसे भी धन का इंतेजाम करें।

यूपी ब्यूरो के लिए दो लाख रोज़ की वसूली जरूरी है। ये कर पाओ तो ही यूपी की टीवी पत्रकारिता में टिका जा सकता है। अन्यथा टिक पाना बहुत मुश्किल है।

थाना बिकता है, वैश्या की सेज़ बिकती है, हफ्ता वसूली के लिए इलाके और बाज़ार बिकते हैं.. ये सब सुना था लेकिन अब ये भी सुन लीजिए कि लोकतंत्र का चौथा खंभा भी बिकता है।
खासकर चैनल वाले यूपी को खूबसूरत,कमउम्र,हाइटेक फाइवस्टार वैश्या की तरह मंहगे दामों बेच रहे हैं।

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