जी क़े चक्रवर्ती
यह बात 1998 की है सर्दियों के भयानक दिन थे उन दिनों कारगिल क्षेत्र में भयंकर वर्फबारी के दौरान कारगिल की ऊंची पहाडि़यों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने अपना कब्जा जमा लिया था। इस बात की सूचना जैसे ही दिल्ली में बैठे सेना के आला अधिकारियों को मिली उन्होंने तुरंत रणनीति बनाते हुए कार्यवाही करने का आदेश दिया, भारतीय सैनिकों ने अपनी कार्यवाह शुरू करते हुये उन पाकिस्तानी घुसपैठियों को युद्ध कर पीछे खदेड़ कर 26 जुलाई के दिन विजय पताका लहराया।
26 जुलाई यानि आज ही के दिन कारगिल विजय दिवस के 20 वर्ष पूरे हो गए हैं। 1999 की गर्मियों की शुरुआत में जब सेना को पता चला तो सेना ने उनके खिलाफ ऑपरेशन “विजय” के नाम से सैनिक कार्यवाही की शुरुआत किया। लगभग 18 हजार फीट की ऊंचाई पर कारगिल में लड़ी गई इस जंग में 527 भारतीय जवान शहीद हुए थे। यह सैन्य ऑपरेशन आठ मई को शुरू होकर 26 जुलाई को खत्म हुआ। इस सैन्य कार्रवाई में सेना के 527 जवान शहीद हुए तो लगभग 1363 जवान घायल भी हुए। वैसे इस लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा स्वीकार किया कि उसके करीब 357 सैनिक मारे गए थे लेकिन वास्तव में इस युद्ध में पाकिस्तान के करीब तीन हजार जवान मारे गए थे। यह सैन्य कार्रवाई आठ मई को शुरू हो कर 26 जुलाई वर्ष 1999 को जीत हासिल होने के बाद विजय पताका लहराने के साथ ही समाप्त हुआ था।
कैसे भूलें कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय का योगदान: मुझे परमवीर चक्र चाहिए…
पाकिस्तानी घुपैठियों के द्वारा कब्जा किये गए पोस्ट में घुसकर कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय ने उन घुपैठियों के कब्जे से उस पोस्ट को मुक्त कराने में वे शहीद हो गये।
शहीद कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय का जन्म उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रुधा गाँव में 25 जून 1975 को हुआ था। बचपन से ही उनके अंदर देश सेवा करने का जज्बा कूट-कूट कर भरा था उनके इस जज्बे ने उन्हें एनडीए के चौखट तक पहुंचाया था।

एनडीए की परीक्षा में ‘आपकी इच्छा’ वाले कालम में जहाँ यह लिखना होता हैं कि वह जीवन में क्या बनना चाहते हैं, क्या पाना चाहते हैं, वहां सभी परीक्षार्थी लिख रहे थे कि, किसी को चीफ ऑफ़, आर्मी स्टाफ बनना चाहता हैं, तो कोई लिख रहा था कि उसे विदेशों में पोस्टिंग चाहिए आदि आदि, उस फार्म में देश के इस बहादुर बेटे ने लिखा था कि उसे केवल और केवल “परमवीर” चक्र चाहिए। वह बहादुर नौजवान और नहीं वल्कि कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय ही थे जिन्हें कारगिल युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुये।
इस मोर्चे पर उत्तर प्रदेश के जांबाज वीर सैनिक कैप्टन मनोज पांडेय ने फ़तह हासिल करने के लिए कमर कस कसते हुए उन्होने अपनी 1/11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की अगुवाई उन्ही के हाथों में था। हालांकि, इस विजय को हासिल करते हुये उन्हें अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। उस वक्त वे मात्र 24 वर्ष की आयु में ही देश के सामने अपनी वीरता एवं हिम्मत का अनूठा। उदाहरण प्रस्तुत करते हुये सदा-सदा के लिए चिर निन्द्रा में सो गये।
हमारे जांबाज सैनिकों द्वारा 16 से 18 हज़ार फिट की ऊंचाई पर कारगिल में लड़ी गई इस लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों के पावं भारतीय धरती से उखाड़ फेंकें और उस पोस्ट पर विजय का तिरंगा फहरा दिया। ये जीत हमें कैप्टन विक्रम बत्रा, मेजर अजय सिंह जसरोटिया, कैप्टन मनोज कुमार पांडेय, कैप्टन विजयंत थापर, नायब सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव, राइफलमैन संजय कुमार, कैप्टन अनुज नय्यर जैसे अन्य जांबाज़ वीरों की वजह से यह जीत मिली थी।
सच कहे तो हमारे देश के सैनिकों का बहुत पुराना इतिहास रहा है जिनके बहादुरी के कारनामें सन 1971 के युद्ध के वीर “अब्दुल हमीद” से लेकर वर्तमान समय तक के “कैप्टन मनोज पांडे” जैसे अनेकों वीर जवानों के बहादुरी के किस्सों से भारतीय सैनिकों का इतिहास पटा पड़ा हैं।
जय हिन्द, जय भारत!
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