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    Home»करियर»Education

    देश प्रेम का विस्तार ही मानवता है!

    By August 6, 2019 Education No Comments11 Mins Read
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    7 अगस्त: विश्वविख्यात गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टॅगोर की पुण्य तिथि पर खास

    प्रदीप कुमार सिंह

    रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता (पहले कलकत्ता) के एक प्रतिष्ठित और कला प्रिय परिवार में हुआ। रवीन्द्रनाथ टैगोर यूं तो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, पर बंगाली साहित्य में उनका अप्रतिम योगदान रहा। उन्होंने महाकाव्य को छोड़कर तकरीबन सभी विधाओं में साहित्य रचना की। रवीन्द्रनाथ ने करीब ढाई हजार गीत लिखे और संगीतबद्ध किए। जीवन के अंतिम वर्षों में उनका झुकाव पेंटिंग की ओर हुआ और उन्होंने करीब 3 हजार पेंटिंग्स बनाई। उनके बड़े भाई श्री सत्येन्द्रनाथ आईसीएस परीक्षा पास करने वाले प्रथम भारतीय थे। टैगोर का विवाह 9 दिसंबर 1893 को मृणालिनी देवी के साथ हुआ था।

    रवीन्द्रनाथ जी की प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल में हुई थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1878 में लंदन के यूनिवर्सिटी कालेज में बेरिस्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया लेकिन बिना डिग्री की पढ़ाई पूरी किए ही वे भारत लौट आए। हालांकि, 1940 में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें डाक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की।

    बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। उन्होंने अपने प्रकृति-प्रेम के सम्बन्ध में स्वयं लिखा है, ‘मुझे हर सवेरा सुनहरी किनारे वाला लिफाफा-सा प्रतीत होता था, जो मेरे लिए कोई अनसुना समाचार लाया हो।’ रवींद्रनाथ ने रूढ़िवादी परंपराओं से स्वयं को अलग रखते हुए साहित्यिक गतिविधियों के एक नए युग की शुरूआत की।

    रवीन्द्रनाथ का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली था। वे अपने लम्बे केश, लहराती हुई दाढ़ी और ऊंची-पतली काया के कारण प्राचीन भारत के ऋषियों के समान जान पड़ते थे। उनका स्वभाव धार्मिक, हृदय विशाल और विचार उदार थे। उन्होंने उस प्राचीन भारतीय संस्कृति को पुनः जीवित कर दिखाया, जो लगभग मर चुकी थी।

    अंग्रेजी शासन ने हिन्दू-मुसलमानों में फूट डालने के लिए बंगाल के विभाजन की योजना बनायी। टैगोर ने अंग्रेजों की इस साजिश का जमकर विरोध किया। उन्होंने रक्षाबंधन के त्योहार को स्वतंत्रता के धागे में पिरोया। उनका कहना था कि राखी केवल भाई-बहन का त्योहार नही है अपितु ये इंसानियत का पर्व है, भाई-चारे का पर्व है। जहाँ जाति और धार्मिक भेद-भाव भूलकर हर कोई एक दूसरे की रक्षा कामना हेतु वचन देता है और रक्षा सूत्र में बँध जाता है।

    भारत के लिए आजादी की इबारत लिखने वाले महानायक, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता में किसी न किसी रूप से योगदान दिया, उनकी देशभक्ति को लेकर क्या राय थी। गीतांजलि महाकाव्य और राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधिनायक जय है’ लिखने वाले महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर, मानवता को राष्ट्रीयता से कहीं ज्यादा ऊंचे स्थान पर रखते थे। नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन ने अपनी अग्रेंजी में लिखी किताब ‘आग्र्यमेन्टटिव इण्डियन’ (तर्क देने वाला भारतीय) में टैगोर संबंधित एक अध्याय ‘टैगोर और उनका भारत’ में टैगोर के राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़े विचारों का वर्णन किया है।

    सामाजिक कार्यकर्ता दीनबन्धु सी. एफ. एंड्रूयज, महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे। गांधी जी ने उन्हें दीनबन्धु की उपाधि दी थी। गांधी और टैगोर के बीच की चर्चा का वर्णन करते हुए एंड्रूयज बताते है कि ‘दोनों के विचार कई मुद्दों पर बंटे हुए रहते थे। चर्चा का पहला विषय होता था मूर्ति पूजा। गांधी इसके पक्षधर थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि जनता इतनी जल्दी किसी भी निराकार, अमूर्त रूप को स्वीकार करने के लायक नहीं हैं। वहीं टैगोर जनता को हमेशा बच्चा समझे जाने के पक्ष में नहीं रहते थे।

    गांधी यूरोप का उदाहरण देते थे जहां झंडे को आराध्य समझकर काफी कुछ हासिल किया गया। टैगोर इससे सहमत नहीं दिखते थे। दूसरा मुद्दा राष्ट्रीयता का होता था, गांधी इसका बचाव करते थे। वह कहते थे कि अंतर्राष्ट्रीयता को हासिल करने के लिए राष्ट्रीयता से गुजरना जरूरी है।

    आजादी से जुड़े आंदोलनों को टैगोर का पूरा समर्थन था, लेकिन देशभक्ति को लेकर उनके मन में कुछ संदेह भी थे। टैगोर मानते थे कि देशभक्ति ‘चार दिवारी’ से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है, साथ ही दूसरे देशों की जनता के दुख-दर्द को समझने की स्वतंत्रता को भी सीमित कर देती है। टैगोर के विचारों में अर्थहीन तथा अवैज्ञानिक परंपरावाद का विरोध भी शामिल था, जो उनके मुताबिक, किसी को भी अपने अतीत का बंदी बना लेता है।

    टैगोर आजाद भारत की कल्पना करते थे, लेकिन वह यह भी मानते थे कि घोर राष्ट्रवादी रवैये और स्वदेशी भारतीय परंपरा की चाह में पश्चिम को पूरी तरह नकार देने से कहीं न कहीं हम खुद को सीमित कर देंगे। यही नहीं स्वदेशी की इस अतिरिक्त चाह में हम अलग-अलग शताब्दी में भारत पर अपनी छाप छोड़ चुके ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम धर्म के प्रति भी असहिष्णु रवैया पैदा कर लेंगे।

    19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के शुरू में दो महान भारतीयों रवींद्रनाथ टैगोर और मोहनदास कर्मचंद गांधी के बीच एक संबंध और गहरा तादात्म्य स्थापित हो गया। वे दोनों भारतीयता, मानवता और अंग्रेजी शासन से मुक्ति के समर्थक थे। उनके बारे में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1941 में अपनी जेल डायरी में लिखा- गांधी और टैगोर, जो पूरी तरह एक-दूसरे से अलग प्रकार के थे और दोनों भारत के विशिष्ट व्यक्ति थे। इन दोनों की गणना भारत के महान पुरूषों में होती है। मैंने बहुत लंबे समय से यह महसूस किया है कि वे आज विश्व के असाधारण व्यक्ति हंै। निसंदेह, ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जो उनसे अधिक योग्य और अपने-अपने क्षेत्रों में उनसे महान प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं। वे किसी एक गुण के कारण नहीं, बल्कि उनके सामूहिक प्रभाव के कारण मैंने महसूस किया कि गांधी और टैगोर आज विश्व के महान व्यक्तियों में मानव के रूप में सर्वोत्तम व्यक्ति थे। यह मेरा सौभाग्य था कि मैं उनके निकट संपर्क में आया।

    टैगोर ने कहा था कि गांधी जी के आह्वान पर भारत नई महानताओं को उसी प्रकार छूने लगा जैसे पहले के समय में बुद्ध ने सच्चाई और प्राणियों के बीच भाईचारा और सद्भाव की घोषणा की थी। रविन्द्र नाथ टैगोर ने गाँधी को ‘महात्मा’ कहा और गाँधी ने रविन्द्र नाथ टैगोर को ‘गुरूदेव’ की उपाधि दी।

    विश्व के सामने टैगोर ने महात्मा गांधी को भारत की आध्यात्मिक आत्मा के रूप में प्रस्तुत करने में कभी हिचकिचाहट महसूस नहीं की। उन्होंने 1938 में चीन के मार्शल चेन काई सेक को यह कहते हुए पत्र लिखा कि नैतिक गड़बड़ी के इस निराशाजनक अवसर पर हम लोगों के लिए यह आशा करना स्वाभाविक है कि इस महाद्वीप को जिसने दो महान व्यक्तियों बुद्ध और ईसा मसीह को पैदा किया। मानवता की दुर्बुद्धि की वैज्ञानिक धृष्टता के समक्ष नैतिकता की पवित्र अभिव्यक्ति को बनाये रखने के अपने दायित्व को अब भी पूरा करना चाहिए। क्या वह अभिलाषा गांधी के व्यक्तित्व में पूर्ति की पहली चमचमाती किरण के रूप में दिखाई नहीं देती। चेन काई सेक ने पत्र का उत्तर देते हुए टैगोर को रेस्पेक्टेड गुरूदेव टैगोर के नाम से संबोधित किया था।

    रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 14 जुलाई 1930 को जर्मनी के बर्लिन के पास आइंस्टीन के घर का दौरा किया था। इन दो महान पुरूषों के बीच हुई विज्ञान एवं अध्यात्म विषय सारगर्भित एवं महत्वपूर्ण चर्चा को दर्ज किया गया और बाद में इसे जनवरी, 1931 में प्रकाशित किया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 1934-35 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात, शान्ति निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही इन्हंे ‘प्रियदर्शिनी’ नाम दिया था।

    टैगोर लगातार अपने लेखन में देशभक्ति की आलोचना करते नजर आते थे। 1908 में ही वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की एक आलोचना का जवाब देते हुए उन्होंने इस मामले में अपना रूख साफ कर दिया था। टैगोर ने लिखा ‘देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरे के दाम में ग्लास नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।

    गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर के अनुसार ‘मेरा घर सब जगह है, मैं इसे उत्सुकता से खोज रहा हूँ. मेरा देश भी सब जगह है, इसे मैं जीतने के लिए लडूंगा। प्रत्येक घर में मेरा निकटतम सम्बन्धी रहता है, मैं उसे हर स्थान पर तलाश करता हूँ। रबिन्द्रनाथ टैगोर ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएँ करके भारतीय संस्कृति के आदर्श ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को सारे विश्व में फैलाया। सारे विश्व में उनके वैज्ञानिक तथा विश्वव्यापी दृष्टिकोण के कारण बड़े जन समुदाय द्वारा जोरदार स्वागत किया जाता था। सही मायने में वह अपने युग के पहले सबसे लोकप्रिय तथा सर्वमान्य विश्व नागरिक थे।

    वह पहले गैर यूरोपीय तथा पहले एशियाई तथा पहले भारतीय थे जिसे विश्व के सर्वोत्तम नोबल पुरस्कार से उनकी काव्यकृति ‘गीतांजलि’ के लिए सन 1913 में सम्मानित किया गया। 1914 में भारत की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नाइटहुड प्रदान करते हुए ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया, किन्तु 1919 में ‘जलियांवाला बाग’ में जब अंग्रेज सरकार द्वारा बर्बरतापूर्ण नर-संहार किया गया तो उन्होंने सरकार के अत्याचार की निन्दा करते हुए विरोध के रूप में ‘सर’ की उपाधि का परित्याग कर दिया।

    रविन्द्र नाथ टैगोर मातृभाषा के प्रबल पक्षधर थे। उनका कहना था- जिस प्रकार माँ के दूध पर पलने वाला बच्चा अधिक स्वस्थ और बलवान होता है, वैसे ही मातृभाषा पढ़ने से मन और मस्तिष्क अधिक मजबूत बनते हंै। समाज को अपने देश की महान विरासत की याद दिलाने के लिए रविन्द्रनाथ टैगोर ने भारतीय इतिहास की कीर्तिमय घटनाओं तथा प्रसिद्ध भारतीय व्यक्तियों के बारे में कविताएँ तथा कहानियां लिखी। इनमंे से अनेक कविताएँ, कथायंें और कहानियाँ प्रकाशित हुई।

    रविन्द्र नाथ टैगोर किसानों से अत्यधिक प्रेम करते थे। वे कहा करते थे “हमने अवतारों को तो नहीं देखा लेकिन अपने अन्नदाता को किसानों के रूप में देखा है”। रविन्द्र नाथ टैगोर ने जब देखा की गरीब और अशिक्षित किसान अन्धविश्वासांे में जकड़े हुए हंै तो उन्होंने उनके लिए एक स्कूल खोलने का निश्चय किया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने शान्तिनिकेतन की स्थापना की। शांति निकेतन पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में बोलपुर के निकट एक छोटा शहर है, जो कोलकाता (पहले कलकत्ता) के लगभग 180 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। यह शहर प्रत्येक वर्ष हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है। शांति निकेतन एक पर्यटन आकर्षण इसलिए भी है क्योंकि टैगोर ने अपनी कई साहित्यिक कृतियाँ यहाँ लिखीं थीं।

    टैगोर ने शान्ति निकेतन में ऐसा शैक्षिक माहौल बनाया जिसमें अध्यापक और विद्यार्थी एक साथ रहते और सभी मिल-जुलकर कार्य करते। इस स्कूल का मुख्य उद्देश्य था शिक्षा को जीवन का अभिन्न अंग बनाना। शान्ति निकेतन बाद में ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ के नाम से विख्यात हुआ। 28 दिसम्बर 1921 को विश्वभारती विश्वविद्यालय देश को समर्पित करते हुए रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा- यह एक ऐसा स्थान है जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक ही घोंसले में घर बनाता है। नोबल पुरस्कार में मिली धनराशि उन्होंने शान्ति निकेतन में लगा दी। रविन्द्र नाथ टैगोर इतने से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने भारत की समृद्धि के लिए आपसी भाईचारे व शांति को आवश्यक बताया। उन्होंने गांव की उन्नति के लिए खेती-बारी व पशुपालन के उन्नत तरीकांे को अपनाने व दस्तकारी के विकास पर बल दिया।

    रविन्द्र नाथ टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा बहुमुखी थी। उनके चिंतन, विचारांे, स्वप्नों व आकांक्षाआंे की अभिव्यक्ति उनकी कविताआंे, कहानियांे, उपन्यास, नाटकांे, गीतों और चित्रों में होती है। उनके गीतों में से एक- “आमार सोनार बांगला” बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान है और उन्ही का गीत- “जन गन मन अधिनायक जय हे” हमारा राष्ट्रगान है। रविन्द्र नाथ टैगोर के गीतों को ’रविन्द्र संगीत’ के नाम से जाना जाता है। इन गीतों का भारतीय संगीत में विशिष्ट स्थान है। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के चार प्रमुख अनमोल विचार इस प्रकार हैं – (1) हम ये प्रार्थना ना करें कि हमारे ऊपर खतरे न आएं, बल्कि ये करे कि हम उनका सामना करने में निडर रहे (2) मनुष्य महानदी की भांति है जो अपने बहाव द्वारा नवीन दिशाओं में राह बना लेती है (3) मै सोया और स्वप्न देखा कि जीवन आनंद है। मैं जागा और देखा कि जीवन सेवा है। मंैने सेवा की और पाया कि सेवा आनंद है तथा (4) प्रत्येक कार्य करने से पूर्व यह सोचे कि इससे समाज के सबसे अन्तिम व्यक्ति का क्या लाभ होगा?

    7 अगस्त 1941 को रविन्द्रनाथ टैगोर ने अंतिम साँस ली। उन्होंने सदैव आजादी से भरा उत्कृष्ट चेतना का जीवन जिया। उनके द्वारा लिखे अंतिम शब्द थे- “अपने भीतरी प्रकाश से ओत-प्रोत, जब वह सत्य खोज लेता है। कोई उसे वंचित नहीं कर सकता, वह उसे अपने साथ ले जाता है। अपने निधि-कोष में, अपने अंतिम पुरस्कार के रूप में।’’ गुरूदेव के जीवन का सन्देश समस्त मानव जाति के लिए यह है – महान काम करने का एक ही तरीका है, वो करो जिससे तुम्हें आत्मिक संतुष्टि मिलती है, अगर तुम्हें वह अभी तक नहीं मिली है, तो एक खोजी की तरह पूरे मनोयोग से उस महासत्य को खोजते रहो। संसार की सबसे अनमोल चीज तुम्हारे अंदर ही है। यह मानव जाति की सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अपने अंदर के अनमोल जीवन संगीत को अभिव्यक्त किये बिना कब्र में चला जाता है।

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