शंघाई घोषणा पत्र में मोदी के प्रस्ताव

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
शंघाई सहयोग संगठन के शीर्ष सम्मेलन में नरेंद्र मोदी के विचारों को सर्वाधिक महत्व मिला। उन्होंने जो प्रस्ताव दिए उन्हें साझा घोषणा पत्र में प्रमुखता से शामिल किया गया। क्योकि मोदी के विचार विश्व शांति और सहयोग पर आधारित थे। प्रायः ऐसे सम्मेलन में पाकिस्तान का अनुचित बचाव करने वाला चीन भी इस बार खामोश रहा। उसने भी साझा घोषणा पर सहमति व्यक्त की थी।
दूसरी बाद प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी शुरुआती तीन विदेश यात्राएं महत्वपूर्ण साबित हुई। इनके माध्यम से भारत के द्विपक्षीय व क्षेत्रीय संबंधों में सुधार हुआ। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर भी भारत प्रभावी सन्देश देने में सफल रहा है। नरेंद्र मोदी क्रमशः मालद्वीप, श्रीलंका और किर्गिस्तान की यात्रा पर गए थे। मालद्वीप और श्रीलंका की यात्रा द्विपपक्षीय संबंधों की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी। अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। भारत मालद्वीप,और श्रीलंका तीनों सीमापार के आतंकवाद से प्रभावित रहे है। इसीलिए मोदी ने इन देशों में आतंकवाद से निपटने के लिए वैश्विक सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव किया, जिसे कई देशों का समर्थन मिला।
इसी प्रकार किर्गिस्तान की यात्रा के माध्यम से ही नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के विरोध का सन्देश दिया। पाकिस्तान के आग्रह के बाबजूद मोदी ने उसके हवाई मार्ग के प्रयोग से इनकार कर दिया। वह लंबी दूरी तय करके किर्गिस्तान पहुंचे।
 पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भारत से वार्ता शुरू करने के लिए परेशान है। उन्होंने ने चुनाव में जीत पर नरेंद्र मोदी को फोन पर बधाई दी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में अमन और चैन बनाए रखने की इच्छा भी व्यक्त की थी। लेकिन मोदी अपने रुख पर कायम रहे। उन्होंन इमरान से कहा था कि अमन चैन के लिए पाकिस्तान को आतंकवाद बन्द करना होगा। इसके बाद भी इमरान के प्रयास जारी रहे। वह दो बातें चाहते थे। पहली यह किर्गिस्तान जाते समय नरेंद्र मोदी पाकिस्तानी वायु मार्ग का प्रयोग करें। दूसरी यह कि शंघाई सम्मेलन के दौरान नरेंद्र मोदी उनसे मुलाकात को तैयार हो जाये।
इन दिनों पाकिस्तान आतंकवाद के मुद्दे पर अलग थलग है। भारत से वार्ता के माध्यम से इमरान इस अलगाव को शिथिल करना चाहते थे। इसके लिए सुनियोजित ढंग से उन्होंन अपने विदेश सचिव को दिल्ली भी भेजा था। वैसे उनकी दिल्ली यात्रा को निजी बताया गया था। लेकिन वह इमरान का वही दो सूत्रीय एजेंडा लेकर दिल्ली आए थे। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक आतंकियों के खिलाफ पाकिस्तान के रवैये में ठोस बदलाव नहीं आता, उसके साथ कोई बातचीत नहीं होगी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह भी साफ कर दिया कि शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में इमरान खान के साथ नरेंद्र मोदी की बैठक नहीं होगी। इस तरह पाकिस्तानी विदेश सचिव सुहैल मेहमूद के अरमानों पर पानी फिर गया। उन्हें मायूस होकर वतन लौटना पड़ा।
उन्हें बताया गया कि  पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। इसके लिए आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को संतोषजनक कदम उठाने होंगे।
शंघाई सहयोग संगठन का गठन दो हजार एक में हुआ था। यह राजनीतिक और सुरक्षा समूह है। उस समय चीन, रूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान इसके स्थाई सदस्य थे। इसे सदस्य देशों के बीच सैन्य और आर्थिक सहयोग के लिए बनाया गया था। इसमें खुफिया जानकारी साझा करने और मध्य एशिया में आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाना शामिल है। भारत और पाकिस्तान दो हजार सत्रह में इसके स्थाई बने। इसका मुख्यालय बीजिंग में है।
 इस प्रकार नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के विरोध में अपनी प्रतिबद्धता कायम रखी। उन्होंने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक जाने के लिए ओमान, ईरान और मध्य एशियाई देशों के वायु क्षेत्र का प्रयोग किया।
यहां मुख्य सम्मेलन के अलावा नरेंद्र मोदी ने द्विपक्षीय वार्ताओं पर भी जोर दिया। इसमें  रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उनकी बैठक खासतौर पर महत्वपूर्ण रही। नरेंद्र मोदी ने किर्गिस्तान के राष्ट्रपति के साथ भी वार्ता को आगे बढ़ाया। वह मोदी के शपथ ग्रहण में नई दिल्ली आए थे।
उन्होंने ही मोदी को शंघाई सम्मेलन का औपचारिक निमंत्रण भी दिया था। नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में वैश्विक सुरक्षा स्थिति और आर्थिक सहयोग का मुद्दा उठाया। सम्मेलन की समाप्ति के बाद मोदी एक दिवसीय किर्गिस्तान की औपचारिक द्विपक्षीय यात्रा पर रहे। इसका आग्रह वहां के राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में ही किया था। मोदी अपने पिछले कार्यकाल में भी किर्गिस्तान की यात्रा कर चुके है। तब दोनों देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा, व्यापार और निवेश सहित कई द्विपक्षीय क्षेत्रों में समझौते हुए थे। इससे दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत हुए। मोदी ने  राष्ट्रपति जीनबेकोव के साथ भारत किर्गिज बिजनेस फोरम को भी संबोधित किया। किर्गिस्‍तान के साथ व्यापार आगे बढ़ाने के लिए पांच साल की योजना तैयार की गई है। राष्ट्रपति जीनबेकोव से नरेंद्र मोदी की उपयोगी वार्ता हुई। व्यापार और निवेश के बढ़ाने पर सहमति बनी। मोदी ने द्विपक्षीय निवेश को बढ़ावा देने की बात कही।
उन्होंने भारत के आर्थिक विकास और प्रौद्योगिकी में उन्नति का उल्लेख किया। भारत के युवा और अन्वेषक भारत के पांच ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। सम्मेलन में सभी सदस्यों ने आतंकवाद को लेकर साझा घोषणापत्र जारी किया है। चौदह समझौतों पर भी हस्ताक्षर किये गए। नरेंद्र मोदी  ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले, इसका वित्तपोषण करने वाले और आतंकियों की मदद करने वाले देशों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के मसले पर वैश्विक सम्मेलन का आह्वान भी किया। मोदी ने चीन के सामने पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद  का मुद्दा उठाया। कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद समाप्त करने के प्रति गम्भीर नहीं है। उन्होंने चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग को इस वर्ष भारत आने का न्योता दिया। जिसे  उन्होंने स्वीकार किया। मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात की।
अमेठी में राइफल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने में रूस का आभार व्यक्त किया। जाहिर है कि इस सम्मेलन के साझा घोषणा पत्र में नरेंद्र मोदी के विचारों को सर्वाधिक महत्व दिया गया। इसके अलावा मोदी खासतौर पर किर्गिस्तान, चीन और रूस के साथ द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढाने में सफल रहे है। घोषणा पत्र में नरेंद्र मोदी के विचारों को यथावत स्थान दिया गया। कहा गया- हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आह्वान करते हैं कि आतंकवाद से मुकाबले में वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दें। इसमें संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका हो, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों को बगैर किसी राजनीतिकरण और दोहरे मानदंड के पूरी तरह लागू करेगा और ऐसा करते हुए सभी देशों की संप्रभुता एवं आजादी के प्रति आदर का भाव रखेगा।
आतंकवाद, आतंकवादी एवं चरमपंथी विचारधारा का फैलाव, जनसंहार के हथियारों का प्रसार, हथियारों की होड़ जैसी चुनौतियां और सुरक्षा संबंधी खतरे सीमा पार प्रकृति के होते जा रहे हैं। इन पर वैश्विक समुदाय द्वारा विशेष ध्यान देने, बेहतर समन्वय और रचनात्मक सहयोग करने की जरूरत है। सदस्य राष्ट्र आतंकवाद के हर स्वरूप की निंदा करते हैं। निश्चित ही यह भारत के लिए कूटनीतिक कामयाबी है।

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