डॉ दिलीप अग्निहोत्री
लोकसभा और राज्यसभा में अमित शाह का जवाब सभी विरोधियों पर भारी पड़ा। शाह ने तीन सौ सत्तर पर चर्चा को केवल संसद तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जनता की अदालत में भी इस विषय को रख दिया है। इसके समर्थकों को भविष्य में इसका जबाब अवश्य देना होगा। शाह ने तर्को के साथ एक लाइन खींच दी है। एक तरफ तीन सौ सत्तर के समर्थक है, जिन पर शाह ने अलगाववाद और घटलों के बचाव के लिए इस अनुच्छेद को बनाये रखने की हिमायत का आरोप लगाया है। इतना ही नही शाह ने ऐसे लोगो पर मानवाधिकार, विकास, गरीब, दलित व पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ जम्मू इस अनुच्छेद को हटाने वाले लोग है। ये राष्ट्रीय एकता और ईमानदारी से समग्र विकास चाहते है। तीन सौ सत्तर इसमें बाधक थी।संसदीय व्यवस्था में संख्या और विचार दोनों का महत्व है। जनादेश के अनुरूप संख्या बल में बदलाव होता रहता है। भारतीय जनता पार्टी के कभी लोकसभा में मात्र दो सदस्य हुआ करते थे, लेकिन उसने अपनी विचारधारा को कभी कमजोर नहीं होने दिया। वैचारिक मशाल को जलाए रखा। इसीलिए लोकसभा में दो सदस्य होने के बाबजूद वह अपना महत्व कायम रखने में सफल रही। इसी के बल पर आगे चलकर उसने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई और आज भारी बहुमत से नरेन्द्र मोदी की सरकार ने दूसरे कार्यकाल के लिए जनादेश हासिल किया है।
भाजपा के दो सँख्याबल के मुकाबले आज कांग्रेस उससे बहुत आगे है। यहां तक कि सपा की वर्तमान संख्या भी दुगने से ज्यादा है। मतलब तब भाजपा के दो सदस्य थे। आज कांग्रेस के बावन और सपा के पांच सदस्य है। लेकिन न्यूनतम सँख्याबल के बाद भी भाजपा अपना उच्च वैचारिक स्तर बनाये रखने में सफल रही थी। लेकिन सपा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस,पीडीपी ने संसद में अपनी जमकर फजीहत कराई है। संसद के दोनों सदनों में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को हटाने के संकल्प और जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक पर इन पार्टियों के विचार ने इनकी लाचारी को ही उजागर किया है। इनके आचरण से यही सन्देश गया कि ये पार्टियां संख्या बल के साथ साथ वैचारिक आधार पर भी लाचार हो चुकी है।
सपा ने गृहमंत्री द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावों का विरोध किया। इस विरोध की वैचारिक आधार पर मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। सपा का दावा रहा है कि राम मनोहर लोहिया उसके आदर्श है। उनके सिद्धंत के अनुसार ही इस पार्टी का नामकरण किया गया है। लेकिन सपा ने संसद में जो विरोध किया, वह राममनोहर लोहिया के विचारों का खुला उल्लंघन था। लोहिया ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर का खुला विरोध किया था। उनका कहना था कि यह अनुच्छेद कश्मीर को भारत मे पूरी तरह मिलने में बाधक है। इसलिए इस अस्थाई अनुच्छेद को हटा देना चाहिए। लेकिन लोहियावादी होने के दावेदारों ने तीन सौ सत्तर हटाने का विरोध किया। जम्मू कश्मीर के राज्यपाल ने तो लोहिया के विचारों के अनुरूप निर्णय किया। लेकिन सपा ने राज्यपाल के लिए बैगन की कहानी सुनाई। मतलब जो लोहिया के विचारों के अनुरूप कार्य करे, उस पर बैगन की कहानी लागू होती है। शायद यही कारण था कि सपा ने उनके विचार को छोड़ दिया है। जवाहर लाल नेहरू ने जिस अनुच्छेद को अस्थाई बताया था, कांग्रेस के सदस्य उसे स्थायी के तौर पर प्रदर्शित कर रहे थे।
कांग्रेस का आरोप था कि सरकार ने रातों रात नियमों की अनदेखी की है। जबकि यह मसला दशकों से चर्चा में रह है। इसे हटाने की मांग पुरानी है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसी के लिए अपना जीवन बलिदान किया था। ऐसी दलीलों से कांग्रेस ने अपनी वैचारिक लाचारी को ही प्रकट किया है।।जबकि अमित शाह ने भाजपा के विचारों का ही उद्घोष किया। सरकार उसी की प्रेरणा से यह राष्ट्रवादी निर्णय ले सकी। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान में जो जम्मू कश्मीर की सीमाएं तय की हैं उसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर और अक्साई चीन भी शामिल है। कश्मीर भारत का हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का अधिकार अनुच्छेद तीन सौ सत्तर में ही निहित है। इसे समाप्त करने का अधिकार राष्ट्रपति को था। जिस प्रक्रिया से इसे संविधान में शामिल किया गया था, उसी प्रक्रिया के पालन से इसे हटाया जा सकता था।सरकार ने यही किया है। लद्दाख की मांग पर उसे अलग किया गया है। कांग्रेस के मनीष तिवारी अपने इतिहास का ज्ञान बताने लगे। वह कश्मीर को जोड़ने का श्रेय जवाहर लाल नेहरू को दे रहे है। इस तरह उन्होंने पांच सौ बाँसठ रियासतों के अलावा जूनागढ़ व हैदराबाद पर चर्चा का मौका दे दिया। कांग्रेस के लिए यह बहस परेशान करने वाली थी।
कांग्रेस ने अनुच्छेद तीन सौ इकहत्तर का मुद्दा उठाया। इससे भी कुछ राज्यों को विशेषाधिकार मिला है। लेकिन कांग्रेस का यह दांव भी उल्टा पड़ा। क्योंकि इस अनुच्छेद का तीन सौ सत्तर से कोई मतलब ही नहीं था। इसमें कहा गया कि क,राष्ट्रपति महाराष्ट्र या गुजरात राज्य के संबंध में किए गए आदेश द्वारा यथास्थिति, विदर्भ, मराठवाड़ा और शेष महाराष्ट्र या सौराष्ट्र, कच्छ और शेष गुजरात के लिए पृथक विकास बोर्डों की स्थापना के लिए, इस उपबंध सहित कि इन बोर्डों में से प्रत्येक के कार्यकरण पर एक प्रतिवेदन राज्य विधान सभा के समक्ष प्रतिवर्ष रखा जाएगा। (ख) समस्त राज्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए, उक्त क्षेत्रों के विकास व्यय के लिए निधियों के साम्यापूर्ण आबंटन के लिए, और (ग) समस्त राज्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए, उक्त सभी क्षेत्रों के संबंध में, तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त सुविधाओं की और राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन सेवाओं में नियोजन के लिए पर्याप्त अवसरों की व्यवस्था करने वाली साम्यापूर्ण व्यवस्था करने के लिए, राज्यपाल के किसी विशेष उत्तरदायित्व के लिए उपबंध कर सकेगा।
जाहिर है कि अनुच्छेद तीन सौ इकहत्तर विकास के लिए है। जबकि तीन सौ सत्तर विभाजनकारी और विकास विरोधी है।
लद्दाख से भाजपा सांसद जामयांग सेरिंग का भाषण भी कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीएफ को कठघरे में खड़ा करने वाला था। उन्होंने इन पार्टियों द्वारा वोटबैंक की सियासत के तहत लद्दाख की अनदेखी का आरोप लगाया।लद्दाख के हिस्से की धनराशि को यहां तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। उनके कथन का इन पार्टियों के पास कोई जबाब नहीं था।
जामयांग सेरिंग का आरोप था कि हम किसी भी हालत में कश्मीर के साथ नहीं रहना चाहते थे लेकिन पिछली सरकारों ने हमारे पक्ष को जानने की कोशिश ही नहीं की। हमारी पहचान और भाषा, अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के कारण लुप्त हुई है। नरेंद्र मोदी सरकार ने लद्दाख के साथ न्याय किया है। यहां पहला विश्वविद्यालय नरेंद्र मोदी सरकार ने स्थापित किया।
जमयांग सेरिंग ने जो कसर छोड़ी उसे अमित शाह ने पूरा कर दिया। उनका कहना था कि इस अनुच्छेद के कारण ही बार बार कहना पड़ता है कि कश्मीर भारत का अंग है। तीन परिवार के लोग कश्मीरियत की बात करते है। जबकि प्रत्येक राज्य व क्षेत्र की संस्कृति भारत में सुरक्षित है। इन्हें तीन सौ सत्तर जैसे अनुच्छेद की जरूरत कभी नहीं हुई। तीन सौ सत्तर ने देश और दुनिया के मन में एक शंका पैदा कर दी थी कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है या नहीं। इसलिए बार बार हमको यह दोहराना पड़ता था।
कांग्रेस ने सरकार से स्टेट होल्डर से बात न करने का आरोप लगाया था। शाह ने ठीक कहा कि जो पाकिस्तान से चंदा लेते हैं, उनसे हम बात नहीं कर सकते। अलगाववादी हुर्रियत के नेताओं को कांग्रेस के शासन में बड़ी अहमियत मिलती थी। इसकी वजह से कश्मीर में अलगाववाद, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार,बढा। अनेक केंद्रीय कानून यहां लागू नहीं हो सके।बाल विवाह यहां अपराध नहीं है। अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय होता रहा। यह विकास, महिला और गरीब विरोधी है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नहीं बना।
शिक्षा का अधिकार ,भूमि अधिग्रहण बिल, डिलिमिटेशन, आरटीआई एक्ट लागू नहीं हो सकी। जाहिर है कि अमित शाह के जबाब से तीन सौ सत्तर की हकीकत देश के सामने आ गई है। इसका बचाव करने वाले कठघरे में आ गए है।







