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    छदम नामों से मार रहा है बच्चों को इंसेफ्लाइटिस, हालात बेकाबू

    By June 18, 2019 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    बिहार के मुजफ्फरपुर में एक बार फिर से जापानी बुखार यानी एक्यूट इंसेफलाइटिस ने ताड़का स्वरूप धारण कर लिया है। नौनिहालों को निगलना शुरू कर दिया है। 13 जून, 2019 तक के प्राप्त आंकड़ों की बात की जाए तो 54 बच्चों को ताड़का बनी इंसेफलाइटिस ने निगल लिया है। 46 मासूमों की जान श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में और 8 बच्चों की मौत केजरीवाल अस्पताल में हुई है। अब तक कि मिली सूचनाओं के आधार पर लगभग दो सौ से अधिक बच्चों की जाने जा चुकी हैं लेकिन हालात अभी भी जस के तस बने हैं। इस बीमारी को स्थानीय भाषा में चमकी का नाम दिया जा रहा है। इस बुखार में बच्चों का शरीर कांपने लगता है, बेचैनी बढ़ जाती है। इस स्थिति को स्थानीय भाषा में ‘चमकी आना’ कहा जाता है।

    विगत वर्षों में इस तरह के मामले यूपी के गोरखपुर में भी देखने को मिला था वहां बीआरडी अस्पताल में सैकड़ों नौनिहालों ने अपनी जान गंवाई थी। उस समय आनन-फानन में स्वास्थ्य महकमें ने बहुत ही तत्परता दिखाई थी। एक डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा भी चला था। लेकिन उसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ नहीं पता। आई गई और बात हो गई के तर्ज पर स्वास्थ्य महकमा शुरू से काम करता रहा है। जहां तक मुजफ्फरपुर का मसला है तो यह भी नया मामला नहीं है। यहां पर भी विगत कई वर्षों से इस तरह के मामले आते रहे हैं। और यह बात सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद मीडिया को दिए अपने बयान में कह रहे हैं। उनका कहना है कि बरसात के पूर्व इस तरह के मामले आते हैं, वर्षा ऋतु शुरू होते ही यह बीमारी खत्म हो जाती है। अर्थात सूबे के सूबेदार को बीमारी के आगमन के बारे में जानकारी थी। बावजूद इसके इस बीमारी से बचावात्मक उपाय पर स्वास्थ्य महकमा ने ध्यान नहीं दिया। सूबे के सूबेदार मीडिया को सुझाव देते हुए नज़र आए कि उसे जागरूकता अभियान पर ध्यान देना चाहिए। उनको कौन बताए कि मीडिया तो माध्यम है, काम तो सरकार और जनमानस को ही करना है।

    केन्द्र सरकार हुई मुस्तैद

    इस बीच सु:खद खबर यह है कि देश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने इस मसले को गंभीरता से लिया है और सूबे के स्वास्थ्य महकमे के मुखिया मंगल पांडेय को तलब कर इस बावत पूरी जानकारी ली है। साथ में स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्वनी चौबे भी पूरी तरह तत्पर दिखे। नई दिल्ली के निर्माण भवन स्थित स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में मुजफ्फरपुर के एईएस को लेकर महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय से स्थिति का जायजा लिया गया। इस बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, सचिव स्वास्थ्य मंत्रालय श्रीमती प्रीति सुदान, संयुक्त सचिव लव अग्रवाल की उपस्थिति में इस मसले पर बिंदुवार चर्चा हुई। केंद्रीय टीम की रिपोर्ट की समीक्षा की गई। इस बीमारी को लेकर लोगों को जागरूक करने, सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में समुचित व्यवस्था के साथ आशा वर्करों को एक्टिव करने के साथ-साथ इस बीमारी के कारणों को लोगों को बताने पर बल दिया गया है।

    निंद्राशन में अफसरशाही

    हमेशा से होता आया है जब कोई बीमारी अपना सर उठाती है उस समय स्वास्थ्य महकमा के आला अधिकारी सक्रीयता के चरम पर दिखते हैं लेकिन जैसे-जैसे अखबार के पन्नों पर खबर प्रथम पृष्ठ से दूसरे-तीसरे होते हुए गायब हो जाती है, उसी रफ्तार में इनकी सक्रीयता भी निन्द्रासन में तब्दील हो जाती है। हालांकि इस बार का मामला सकारात्मक प्रतीत हो रहा है। बिहार कोटे से देश के स्वास्थ्य राज्य मंत्री बने अश्वनी चौबे ने मीडिया को दिए बयान में कहा है कि, इस बीमारी से लड़ने के लिए हर संभव सहायता की जायेगी। केन्द्र सरकार पूरी मदद करेगी।
    इन सब वायदों के बीच सूबे के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय इंसेफ्लाइटिस प्रभावित जिलों का दौरा करने वाले हैं। चर्चा तो देश के स्वास्थ्य मंत्री के दौरे की भी थी लेकिन यह रिपोर्ट लिखे जाने तक उनका दौरा रद्द हो चुका था। वैसे भी आम नागरिकों के पास अपने नेताओं पर विश्वास करने एवं उम्मीद रखने के सिवा और कुछ बचता भी नहीं है, सो बिहार के लोगों को यह उम्मीद है कि इस बार तो इस बीमारी के सही कारणों का पता सरकार जरूर लगा लेगी।

    बीमारी के कारण

    इंसेफलाइटिस पर हुए अभी तक के अध्य्यनों में यह कहा गया है कि यह रोग फ्लावी वायरस के कारण होता है। यह भी मच्छर जनित एक वायरल बीमारी है। जिसमें सिर में अचानक से दर्द शुरू होता है, शरीर कमजोर पड़ने लगता है। इसका लक्ष्ण भी बहुत हद तक सामान्य बुखार जैसा ही होता है। इसका असर शरीर के न्यूरो सिस्टम पर पड़ता है। इस बावत वरिष्ठ न्यूरो सर्जन मनीष कुमार कहते हैं कि, दिमाग के उत्तक में सूजन आ जाता है। एक तरह से दीमाग अपना काम करना बंद करने लगता है। मरीज सेंसलेश हो जाता है। कुछ मामलों में मरीज को दौरे भी पड़ सकते हैं।

    बचाव ही ईलाज है

    इस बीमारी के बचाव के बारे में डॉ. मनीष कहते हैं कि अशुद्ध पानी एवं मच्छरों के कारण ही यह बीमारी अपना पैर पसार पाती है। ऐसे में सबसे जरूरी यह है कि हम साल के बारहों महीने पानी को उबाल कर एवं साफ कपड़ा से छान कर मिट्टी के बर्तन में रखें, फिर पीएं। दूसरा धूप से बचें। मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करें। फूल बांह के कपड़े पहनें।

    67 साल पुरानी है यह बीमारी

    बिहार के मुजफ्फरपुर में यह बीमारी भले ही कुछ दशक पूर्व आई हो लेकिन भारत में इसका इतिहास बहुत पुराना है। आज से 67 वर्ष पूर्व यानी 1952 में पहली बार महाराष्ट्र के नागपुर परिक्षेत्र में इस बीमारी का पता चला। वहीं सन् 1955 तमिलनाडू के उत्तरी एरकोट जिला के वेल्लोर में पहली बार क्लीनिकली इसे डायग्नोस किया गया। 1955 से 1966 के बीच दक्षिण भारत में 65 मामले सामने आए। धीरे-धीरे इस बीमारी ने भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। भारत में पहली बार इस बीमारी ने 1973 फिर 1976 में पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा तबाही मचाई। पंश्चिम बंगाल के वर्दवान एवं बांकुरा जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। 1973 में बांकुरा जिला में इस रोग से पीड़ित 42.6 फीसद लोगों की मौत हुई। 1978 आते-आते यह बीमारी देश के 21 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में फैल गयी। इसी दौरान भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 1002 मामले सामने आए जिसमें 297 मौतें हुई। सिर्फ यूपी की बात की जाए तो 1978 से 2005 तक यह बीमारी 10,000 से ज्यादा मौतों का कारण बनी। 2005 में जो हुआ उसने इस बीमारी की ताकत से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को परिचित कराया। सिर्फ गोरखपुर में 6061 केस सामने आए जिसमें 1500 जानें गईं। इसी तरह 2006 में 2320 मामलों में 528 बच्चों को अपनी जान गवानी पड़ी। 2007 में 3024 मामलों में 645 मौत। इस तरह 2007 तक देश में 103389 मामले सामने आए जिसमें 33,729 रोगियों को नहीं बचाया जा सका। एक शोध में यह बात सामने आई है कि भारत में 597,542,000 लोग जापानी इंसेफ्लाइटिस प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं और 1500-4000 मामले प्रत्येक वर्ष सामने आ रहे हैं। यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अभी तक हम लोग जिन आंकड़ों की बात कर रहे हैं, वे सब रिपोर्टेड हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होंगे जो रिपोर्ट नहीं हुए होंगे। ऐसे में जब बिना रिपोर्ट किए गए मामलों की नज़र से इस बीमारी को हम देखें तो पता चलेगा कि यह बीमारी कितनी ताकतवर हो चुकी है। नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) जिसे पहले हमलोग राष्ट्रीय एंटी मलेरिया प्रोग्राम (एनएएमपी) के नाम से जानते थे, इन दिनों भारत में जेई के मामले को मोनिटर कर रही है। अभी तक देश के 26 राज्यों में कभी-कभार तो 12 राज्यों में अनवरत यह बीमारी अपना कहर बरपा रही है।

    यह इंटरनेशनल बीमारी है

    इंसेफलाइटिस की जड़ों को अगर हम ढूढ़ें तो पता चलता है कि इसका जन्म सबसे पहले जापान में हुआ था। शायद यहीं कारण है कि इसे जापानी इंसेफलाइटिस कहा जाता है। आज से 148 वर्ष पूर्व जापान में यह बीमारी सबसे पहले पहचान में आई। 53 वर्षों के बाद इस बीमारी ने अपना विकराल रूप दिखाया और 1924 में जापान में 6000 केस पंजीकृत हुए। यहां से इसका फैलाव एशिया के देशों में हुआ। 1960 के दशक में चलाए गए टीकाकरण अभियान के कारण इस पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया। जापान के अलावा, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों में इसने अपना पैर पसारा फिर 1952 में इसका प्रवेश भारत में हुआ।

    अंत में…

    व्यवस्था की बात की जाए तो 1951-52 में पहली बार भारत में लोकसभा चुनाव हुआ था। तब से लेकर अब तक तमाम प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री बने और चले गए लेकिन 1952 से चली आ रही इस बीमारी का मुकम्मल ईलाज भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं ढ़ूढ़ पाई। देश के नौनिहाल मरते रहे और आज भी मर रहे हैं। सूरज आग उगल रहा है, प्रकृति जहर उगलने लगी है। हमने प्रकृति की प्रकृति को तोड़ने-मरोड़ने का काम किया है और प्रकृति हमारी प्रवृति को चुनौती दे रही है। ऐसे में प्राकृतिक नियमों का पालन ही इस तरह की बीमारियों से बचाव का सर्वोत्तम उपाय है। फिलहाल तो सूरज की आग और व्यवस्था की मार से उबरने की राह आसान नहीं दिख रही है।

    • आशुतोष कुमार सिंह

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