पूर्व प्रधानमंत्री ने दी सरकार को नसीहत कहा: बदले की सियासत छोड़ देश को मंदी से उबारें मोदी

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कहा: बुद्धिजीवियों एवं विचारकों का सहयोग लेकर अर्थव्यवस्था संकट दूर करें

नई दिल्ली,03 सितम्बर 2019: देश के पूर्व प्रधानमंत्री और सबसे बड़े अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह ने सरकार से अपील की है कि वो बदले की राजनीति छोड़े और सभी बुद्धिजीवियों एवं विचारकों का सहयोग लेकर अर्थव्यवस्था को इस मानवनिर्मित संकट से बाहर निकाले।

पूर्व प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ अर्थशास्त्री के रूप में पांच या उससे अधिक प्रधानमंत्रियों को आर्थिक मामलों में सलाह दी है, इसलिए उनके इस बयान के मायने यह भी निकाले जा रहे हैं कि वह संकट में राजनीति से ऊपर उठकर सरकार की मदद करने के इच्छुक हैं। हालांकि उन्होंने कहा है कि आर्थिक कुप्रबंधन की वजह से ज्यादा तेजी से बढ़ने की क्षमता वाली हमारी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट आ गई है।

पूर्व प्रधानमंत्री ने रविवार को बयान जारी करके कहा, सरकार ने आर्थिक स्तर पर चौतरफा कुप्रबंधन का माहौल बनाया है जिसके कारण देश आर्थिक मंदी की गहरी चपेट में आ गया है। चिंताजनक स्थिति यह है कि पिछली तिमाही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) केवल 5% की दर से बढ़ी है जो इशारा करती है कि देश लंबी मंदी के दौर में है।

निवेशकों में उदासी है:

उन्होंने कहा, सरकार को इस स्थिति से निकलने के लिए बदले की राजनीति छोड़कर बुद्धिजीवियों एवं आर्थिक विचारकों को साथ लेकर अर्थव्यवस्था को इस मानव-निर्मित संकट से बाहर निकालने का प्रयास करना चाहिए। देश में रोजगार का सबसे बड़ा संकट पैदा हो गया है, अनुचित नीतियों के कारण भारी संख्या में नौकरियां खत्म हो गई है। अकेले ऑटोमोबाईल सेक्टर में 3.5 लाख व्यक्तियों को नौकरियों से निकाला गया है। असंगठित क्षेत्र में भी इसी प्रकार बड़े स्तर पर नौकरियां कम होंगी जिससे हमारी अर्थव्यवस्था में सबसे कमजोर कामगारों को रोजी रोटी से हाथ धोना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि चिंताजनक बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर केवल 0.6% है, इससे साफ है कि अर्थव्यवस्था अभी तक नोटबंदी के गलत फैसले और जल्दबाजी में लागू किए गए जीएसटी के नुकसान से उबर नहीं पाई है। घरेलू मांग में काफी गिरावट है और वस्तुओं के उपयोग की दर 18 महीने में सबसे निचले स्तर पर है।

वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने कहा, जीडीपी वृद्धि दर 15 साल के सबसे निचले स्तर पर है। कर राजस्व में बहुत कमी आई है और कर को लेकर छोटे तथा बड़े सभी व्यवसायियों के साथ जबरदस्ती हो रही है और एक तरह से देश में कर संबंधी आतंक का माहौल पैदा किया गया है।

अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए ठीक संकेत नहीं हैं:

उन्होंने कहा कि निवेशकों में उदासी है और यह सब अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए ठीक संकेत नहीं हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति भी गहरी चिंता का विषय है, किसानों को उनकी फसल के उचित मूल्य नहीं मिल रहे हैं और गांवों की आय गिर गई है।सरकार की नीतियों के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था डांवाडोल स्थिति में पहुंच गई है और किसानों की आय घटी है। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए यह संकेत ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, सरकार संस्थानों की स्वायत्तता को खत्म कर रही है,उन्होंने रिजर्व बैंक का हवाला दिया।

मीडिया ख़बरों के अनुसार हाल में सरकार ने रिजर्व बैंक से उसकी रिजर्व मद से 1.76 लाख करोड़ रपए लिए हैं, लेकिन इस पैसे का इस्तेमाल किस तरह से किया जाना है इसके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है।

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