खुदा जालिम है ! ये कैसे न माने

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नवेद शिकोह
( इस्लामी शरियत के आलिमो से इस सवाल पर फतवा देने की गुजारिश, अन्य धर्मों के धार्मिक विद्वानों से भी माँग रहा हूँ जवाब )
हमारा रहमदिल ( दयालु ) खुदा तो कही नहीं दिखता, हाँ , तुम्हारे जालिम खुदा का जुल्म उसके वजूद (अस्तित्व ) के सुबूत देता है।
 जो जुल्म के खिलाफ हो, दयालु हो, रहमदिल हो, न्याय प्रिय हो.. जिसकी हिदायतो ( निर्देशों ) की किताब मे निर्दोष इन्सान तो दूर निर्दोष जानवर की हत्या भी गुनाह-ए- कबीरा ( बड़ा गुनाह ) हो।
हमारे तसव्वुर ( कल्पना ) वाला ऐसा खुदा तो हमे मिला नहीं।
हाँ, हमे  तुम्हारे खुदा/भगवान के वजूद (अस्तित्व) पर तो यकीन करना ही पड़ेगा। जिसने इस सृष्टि की रचना की है.. हमे और आपको.. अरबों-खबरो जीव-जन्तुओ को इस कायनात (सृष्टि ) के कैन्वास पर उतारा है। जमीन-आसमान, नदियों-समुन्दरो, पहाड़ों और जंगलों का एक ऐसा कोलाज तैयार किया हैं जहाँ  जिन्दा रहने के लिये जुल्म करना….ज्यादतियाँ करना…तकलीफे देना… क्रूरता करना बेहद जरूरी (अनिवार्य ) है।
लगता है तुम्हारे खुदा ने दुनियाँ की सबसे बड़ी अकसरियत ( बहुसंख्यक वर्ग) जानवरो ( जीव-जन्तुओ ) की रचना ही जुल्म का तमाशा देखने के इरादे से की है। एक जानवर दूसरे जानवर पर जुल्म न करे….ज्यादती न करे….क्रूरता न करे….हत्या न करे..तकलीफ न दे…  एक जानवर दूसरे जिन्दा जानवर को फाड़कर खाये नहीं तो क्या भूखा मरकर जुल्म का दूसरा रूप अपना ले! क्या शेर घास खाकर जिन्दा रह सकता है ?
शेर और हिरन (जिन्दा हिरन शेर का सबसे लजीज भोजन) की रचना करने वाला क्या zulm (अत्याचार) न करने की हिदायत दे सकता है ?
आप कैसे इस बात को झुठला सकते है कि कुदरत ( प्रकृति ) की हकीकत का वजूद (अस्तित्व ) ही जुल्म पर आधारित है। खैर, कुदरत की इन सच्चाईयो को महसूस करने के बाद इस बात में तो कोई दो राय नही है कि- ” अल्लाह ( भगवान/God ) को प्यारी है कुर्बानी ” यहाँ कुर्बानी से मुराद (आशय )है- रहमदिली (दया ) को ताक पर रखकर जिन्दा जानवरों का गला काटकर उसके टुकड़े-टुकड़े करके उसके गोश्त ( माँस ) को खाना और खिलाना।
  कुदरत का निजाम (नेचर का सिस्टम) देखकर हम कतई नही कह सकते हैं कि कुर्बानी एक ढोग है और कुर्बानी अल्लाह को प्यारी नही है। इस कायनात (सृष्टि ) के रचनाकार ने सृष्टि के निजाम (सिस्टम ) को ही जुल्म (अत्याचार) पर आधारित रखा है।
हो सकता है हम जेहालत (अज्ञानता) के अंधेरे मे तुम्हारे खुदा पर जालिम होने का इल्जाम (आरोप) लगा कर गुनाह कर रहे हैं.. कुफ्र बक रहे हैं.. काफिर होने के सुबूत दे रहे हैं  ….तो फिर आओ.. आगे बढ़ो… मेरी मदद करो.. मुझे सही रास्ता दिखाओ … अपने इल्म की रौशनी की हकीकत से मुझे झूठा साबित कर दो।और तब ये भी हो सकता है कि हम जेहालत के अंधेरो से निकल आये और तुम्हारे जालिम खुदा मे मुझे मेरे तसव्वुर का रहमदिल (दयालु ) ….न्यायप्रिय…..शान्तिप्रिय…. खुदा दिखाई देने लगे।
( ऐसे सवाल हर मजहब के करोड़ों-अरबों लोगे के दिलों-दिमाग मे दफन होगे..पेवस्त होगे। पर काफिर(नास्तिक) होने के इल्जाम का डर उन्हें ऐसे सवाल उठाने की हिम्मत नहीं दे पाता। लेकिन मुझे लगता है कि किसी सवाल का जवाब खोजने मे खुद के इल्म की रौशनी कम पड़ रही हो तो मजहबी विद्वानों/आलिमो/जानकारो से ऐसे सवाल का जवाब पूछने मे हिचकना नही चाहिये है।)
फिलहाल..  बकराईद ( बकरीद ) की मुबारक

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