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    Home»धर्म»Spirituality

    नश्वर शरीर में ही आकार लेती शाश्वत चेतना!

    ShagunBy ShagunMay 17, 2026Updated:May 18, 2026 Spirituality No Comments10 Mins Read
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    rahul guptaराहुल कुमार गुप्ता

    मनुष्य का अस्तित्व केवल हाड़-मांस और त्वचा से बना यह दृश्यमान स्थूल शरीर नहीं है, बल्कि इसके भीतर चेतना की एक ऐसी अंतहीन, अखंड और अनवरत धारा प्रवाहित होती रहती है जो जन्म और मृत्यु की सीमाओं को भी लांघ जाती है। भारतीय ऋषियों-मनीषियों ने गहन अंतर्यात्रा और ध्यान के शिखर पर पहुंचकर मानव चेतना के इस रहस्य को डिकोड किया और इसके चार मुख्य सोपानों या अवस्थाओं की खोज की, जिन्हें जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय कहा गया है।

    मांडूक्य उपनिषद जैसे सनातन शास्त्रों में इन अवस्थाओं का अत्यंत सूक्ष्म और तार्किक विवेचन मिलता है। चेतना की इस यात्रा को केवल एक आध्यात्मिक धारणा मान लेना भूल होगी, क्योंकि आज का आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस भी इन अवस्थाओं को अपने तरीके से स्वीकार कर रहा है और इनके वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत कर रहा है। जब हम इन चारों अवस्थाओं को सनातन और विज्ञान के ध्यान में रखकर देखते हैं, तो जीवन और मृत्यु का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है, और जब इतिहास के पन्नों से उन महान ऋषियों के उदाहरण सामने आते हैं जिन्होंने इसे जिया, तो यह दर्शन जीवंत हो उठता है।

    चेतना की पहली अवस्था है जागृत, जिसे शास्त्र वैश्वानर भी कहते हैं। इस अवस्था में हमारी चेतना पूरी तरह से बहिर्मुखी होती है। हम अपनी पांच ज्ञानेंद्रियों, आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा के माध्यम से बाहरी भौतिक जगत का अनुभव करते हैं। तर्क, बुद्धि, कर्म और सांसारिक व्यवहार इसी धरातल पर संपन्न होते हैं। यह हमारे चेतन मन का वह क्षेत्र है, जहाँ हम जागते हुए निर्णय लेते हैं और योजनाएँ बनाते हैं। यदि न्यूरोसाइंस की भाषा में कहें, तो इस समय हमारा मस्तिष्क बीटा तरंगें उत्सर्जित करता है, जो उच्च सतर्कता और तार्किक सोच को दर्शाती हैं।

    विज्ञान मानता है कि जागृत अवस्था में हम केवल उसी सत्य को देख पाते हैं जो हमारे सामने ठोस रूप में उपस्थित है, लेकिन यह चेतना का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है, ठीक उसी तरह जैसे समुद्र में तैरते हुए बर्फ के पहाड़ का केवल ऊपरी सिरा दिखाई देता है। अधिकांश मानवता अपना पूरा जीवन इसी एक अवस्था के दायरे में समेटकर समाप्त कर देती है, बिना यह जाने कि इसके भीतर और कितने गहरे लोक छिपे हैं।

    जैसे ही हम आँखें मूंदकर निद्रा की गोद में जाते हैं, चेतना की दूसरी अवस्था का जन्म होता है, जिसे स्वप्न अवस्था या शास्त्रों में तैजस कहा गया है। यहाँ बाहरी इंद्रियाँ शांत हो जाती हैं, भौतिक संसार ओझल हो जाता है, लेकिन भीतर का मन पूरी तरह सक्रिय रहता है। मन स्मृति के कबाड़खाने और दबी हुई इच्छाओं के धागों से स्वयं का एक नया, काल्पनिक और अनंत संसार रच लेता है। स्वप्न में व्यक्ति राजा भी बन सकता है और रंक भी, और जब तक वह स्वप्न में रहता है, उसे वह काल्पनिक संसार ही पूर्ण सत्य प्रतीत होता है। मनोविज्ञान इसे अवचेतन मन की जादुई दुनिया कहता है, जहाँ दिनभर की दबी हुई भावनाएँ, डर और आकांक्षाएँ प्रतीकों के रूप में प्रकट होती हैं।

    आधुनिक विज्ञान, इस अवस्था को आरईएम स्लीप कहा जाता है। ( यह नींद का एक गहरा और महत्वपूर्ण चक्र है। जो नींद के 90 मिनट बाद से शुरू होती है। नींद का लगभग 20 फीसदी हिस्सा ऐसी ही नींद होती है जिसे आर ई एम स्लीप कहते हैं । यह अवस्था मुख्य रूप से याददाश्त को मजबूत करने, सीखने की क्षमता बढ़ाने और मानसिक तनाव को दूर करने के लिए जानी जाती है।) इस अवस्था में मस्तिष्क थीटा तरंगों के प्रभाव में होता है। यह अवस्था दर्शाती है कि चेतना को जीवंत अनुभव करने के लिए किसी बाहरी भौतिक शरीर या ठोस पदार्थ की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है। मन अकेले ही पूरा ब्रह्मांड रचने में सक्षम है।

    इसके बाद चेतना और गहराई में उतरती है, जिसे सुषुप्ति या गहरी, स्वप्नरहित निद्रा की अवस्था कहा जाता है। शास्त्रों में इसे प्राज्ञ नाम दिया गया है। यहाँ न तो बाहरी जगत रहता है, न ही मन का कोई स्वप्न। यहाँ तक कि मनुष्य का अपना अहंकार अर्थात मैं का भाव भी विलीन हो जाता है। सुषुप्ति में जाने के बाद कोई राजा नहीं रहता, कोई संन्यासी नहीं रहता, कोई अमीर या गरीब नहीं रहता। सभी भेद मिट जाते हैं। यह परम शांति, गहन विश्रांति और आनंद का वह सागर है, जहाँ से लौटकर सुबह मनुष्य कहता है कि ‘आज मुझे बहुत सुख की नींद आई।’ मनोवैज्ञानिक रूप से यह अचेतन मन की गहराई है।

    विज्ञान इस अवस्था को स्लो-वेव स्लीप कहता है। (धीमी तरंग वाली नींद’ या आम भाषा में गहरी नींद कहा जाता है। यह नॉन-आरईएम नींद का तीसरा चरण होता है, जिसमें आपका शरीर सबसे गहरी आराम की अवस्था में चला जाता है।) इस अवस्था में मस्तिष्क डेल्टा तरंगें उत्सर्जित करता है। यह सबसे धीमी तरंगें होती हैं। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि इसी सुषुप्ति अवस्था में शरीर अपनी सबसे गहरी हीलिंग और कोशिकाओं की मरम्मत करता है। यह अवस्था इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब अहंकार और विचार विलीन होते हैं, तभी सच्ची शांति मिलती है।

    परंतु ऋषियों ने कहा कि कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। इन तीनों अवस्थाओं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति के पार एक चौथी अवस्था है, जिसे तुरीय कहा गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ ही है चौथा स्तर। तुरीय कोई ऐसी स्थिति नहीं है जिसे कहीं बाहर से लाना पड़े, बल्कि यह वह शुद्ध चैतन्य स्वरूप है जो जागृत में भी पीछे छिपे साक्षी के रूप में उपस्थित था, स्वप्न के दृश्यों को भी देख रहा था और सुषुप्ति के खालीपन का भी अनुभव कर रहा था। यदि तुरीय न हो, तो जागने पर हमें यह कैसे याद रहेगा कि हमने रात में कोई बुरा सपना देखा था या हम बहुत गहरी नींद सोए थे? उस खालीपन को रिकॉर्ड करने वाला जो तत्व हमारे भीतर मौजूद है, वही साक्षी है, वही आत्मा है। यह अवस्था शुद्ध बोध की है।

    आधुनिक विज्ञान में क्वांटम फिजिक्स जिस शुद्ध चेतना या ऑब्जर्वर इफेक्ट की बात करता है, वह तुरीय के बहुत करीब है। वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और कर्ट गोडेल जैसे विचारकों ने भी माना था कि इस दृश्य जगत के पीछे एक ऐसी चेतना काम कर रही है जो समय और स्थान के बंधनों से मुक्त है। न्यूरोसाइंस के आधुनिक शोधों में देखा गया है कि जब उच्च कोटि के ध्यानी परम अवस्था में होते हैं, तो उनके मस्तिष्क में गामा तरंगें देखी जाती हैं, जो पूर्ण सामंजस्य और ब्रह्मांडीय चेतना का सूचक हैं।

    इतिहास साक्षी है कि जब कोई ऋषि या साधक इस तुरीय अवस्था, इस परम चैतन्य को प्राप्त कर लेता है, तो उसका संपूर्ण व्यक्तित्व, उसकी भाषा, उसका व्यवहार और उसका संसार को देखने का नज़रिया पूरी तरह रूपांतरित हो जाता है। अष्टावक्र गीता के प्रणेता महर्षि अष्टावक्र इसका अद्भुत उदाहरण हैं। जब राजा जनक की सभा में उनके आठ अंगों से टेढ़े शरीर को देखकर लोग हँसे, तो अष्टावक्र ने मुस्कुराते हुए कहा था कि राजा जनक, मैं यहाँ ज्ञानियों की सभा में आया था, लेकिन यहाँ तो सब चर्मकार बैठे हैं जो केवल चमड़ी को देखना जानते हैं, भीतर की चेतना को नहीं। अष्टावक्र पूरी तरह से उस तुरीय साक्षी अवस्था में प्रतिष्ठित थे, जहाँ शरीर का टेढ़ापन उनकी चेतना को छू भी नहीं पाता था। इस परम बोध को प्राप्त करने के बाद उनमें एक ऐसी अलौकिक निर्भयता और करुणा का संचार हुआ कि उन्होंने सम्राट जनक को एक क्षण में आत्मज्ञान की ओर अग्रसर कर दिया।

    इसी प्रकार महर्षि रमण के जीवन का प्रसंग अत्यंत संवेदनशील और आंखें खोलने वाला है। मात्र सत्रह वर्ष की आयु में उन्हें अचानक मृत्यु का अत्यधिक भय सताया। उन्होंने पलायन करने के बजाय उस भय का सामना करने का निश्चय किया। वे सीधे लेट गए, अपने शरीर को कड़ा कर लिया और सोचने लगे कि अब यह शरीर मर गया है, इसे श्मशान ले जाकर जला दिया जाएगा, लेकिन क्या शरीर के मरने से मैं भी मर गया? क्या मैं यह शरीर हूँ? जैसे ही उन्होंने इस गहरे शून्य में गोता लगाया, उन्हें साक्षात् अनुभव हुआ कि वे शरीर नहीं, बल्कि वह चेतना हैं जो कभी नहीं मरती। इस एक घटना ने उन्हें सदा के लिए तुरीय अवस्था में स्थापित कर दिया। इसके बाद उनके जीवन में ऐसा रूपांतरण आया कि वे मौन के महासागर बन गए। उनके पास आने वाले लोग केवल उनके शांत सान्निध्य में बैठकर ही अपने मन की व्याकुलता खो देते थे। उनके लिए कोई शत्रु नहीं था, कोई मित्र नहीं था, यहाँ तक कि उनके आश्रम में आने वाले पशु-पक्षी भी उनकी उसी आत्मिक चेतना का हिस्सा बन गए थे।

    ऋषि याज्ञवल्क्य ने जब अपनी पत्नी मैत्रेयी को बृहदारण्यक उपनिषद में चेतना का यही अमरत्व समझाया, तब मैत्रेयी ने सांसारिक धन-दौलत को ठुकराते हुए कहा था कि मैं उस धन का क्या करूँगी जो मुझे अमरता न दे सके? याज्ञवल्क्य ने उन्हें सिखाया कि पति, पत्नी या पुत्र से प्रेम इसलिए नहीं होता कि वे शरीर हैं, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उन सबमें एक ही आत्म-चेतना, एक ही साक्षी तत्व निवास करता है। इस सत्य को जानने के बाद याज्ञवल्क्य का संपूर्ण जीवन सांसारिक आसक्तियों से ऊपर उठकर परम परोपकार और ज्ञान के प्रसार में लीन हो गया। वे राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करते थे, लेकिन उनका मन सदा उस चौथी अवस्था में लीन रहता था, जहाँ संसार का कोई भी द्वंद्व उन्हें विचलित नहीं कर पाता था।

    चेतना के इस अनवरत प्रवाह और इन ऋषियों के अनुभवों को समझने के बाद, जन्म और मृत्यु का भय स्वतः ही समाप्त हो जाता है। भारतीय अध्यात्म में मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि चेतना के वस्त्र का परिवर्तन माना गया है। जैसे हर काली और डरावनी रात के बाद एक सुनहरी और नवीन सुबह का आगमन निश्चित होता है, ठीक वैसे ही इस जर्जर स्थूल शरीर के छूटने के बाद अंतहीन चेतना पुनः एक नवीन यात्रा, एक नए जीवन का आरम्भ करती है। ऊर्जा के संरक्षण का नियम भी यही कहता है कि ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न किया जा सकता है, इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। हमारी चेतना भी ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वह अंश है जो कभी नहीं मरती, केवल अपना माध्यम बदलती है। यही गीता का सार भी है।

    आध्यात्मिक साधना का वास्तविक और अंतिम उद्देश्य इस संसार को छोड़कर जंगलों या पहाड़ों में पलायन करना नहीं है, बल्कि अपने दैनिक जीवन के कर्तव्यों को निभाते हुए उस आंतरिक साक्षी भाव को पहचानना है, ठीक वैसे ही जैसे राजा जनक ने राजपाठ संभालते हुए भी स्वयं को जीवनमुक्त रखा। जब एक साधक, एक आम मनुष्य अपने भीतर इस सत्य का साक्षात्कार कर लेता है और उसका अंतर्मन पूरी प्रामाणिकता से यह उद्घोष कर उठता है कि मैं यह हाड़-मांस का नश्वर शरीर नहीं हूँ, मैं विचारों और भावनाओं का यह अशांत मन भी नहीं हूँ, अपितु मैं तो वह अविनाशी, शुद्ध चैतन्य हूँ, तब उसके भीतर तुरीय के दिव्य द्वार स्वतः ही उद्घाटित होने लगते हैं।

    रूपांतरण की इस बेला में मनुष्य के भीतर से क्रोध, ईर्ष्या, भय और संकीर्णता सदा के लिए विदा हो जाते हैं, और उनका स्थान असीम करुणा, शांति और समत्व ले लेते हैं। संसार के दृश्य, परिस्थितियाँ, सुख-दुःख और देह के रंग बदलते रहते हैं, चलते रहते हैं, लेकिन उसके भीतर बैठा वह परम साक्षी, वह दिव्य चैतन्य सदा अचल, अडिग और चिरस्थिर रहता है। यही जीवन की पूर्णता है और यही चेतना का परम महासागर है जिसमें विलीन होना ही हर जीव का अंतिम गंतव्य है।

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