आदाब लखनऊ!… में आपका कश्मीरी चाय से स्वागत है

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मुस्कुराये कि आप लखनऊ में हैं: लीजिये सर्दी में नवाबी शान के साथ कश्मीरी चाय का मज़ा

लखनऊ, 29 दिसम्बर 2018: यदि आप लखनऊ घूमने आए हैं तो यहां पुराने शहर जरूर जाइए और अगर आपने सर्दियों में मिलने वाली गुलाबी चाय का स्वाद नहीं लिया तो समझ लीजिए, लखनऊ देखा ही नहीं आपने! चीनी मिट्टी का एक प्याला हो, प्याले में समोसा हो और जिसमें पड़ी हो एक चम्मच मलाई। फिर लहराई जाए गुलाबी धार, तो यूं होता है नशा तैयार, वह प्यार है।

यानी कश्मीरी चाय! इस कश्मीरी चाय में पड़ने वाला समोसा दरअसल प्रचलित भाषा में सुहाल या जीरा है इस समोसे को उर्दू में साबूदाना भी कहा जाता है। बालाई होती है मलाई, हालांकि कुछ लोग दोनों में अंतर मानते हैं। बता दें कि यह चाय करीब 6 घंटे में तैयार होती है। एक बार यह बन जाए तो फिर इसमें गड़बड़ संभव नहीं। यह घर से जितनी बनकर आएगी यदि उससे अधिक बनानी पड़ जाए तो फिर घर ही जाना पड़ेगा।

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घर भी ठीक शब्द नहीं क्योंकि चाय विक्रेता द्वारा जहां चाय बनाई जाती है उस जगह को कारखाना कहते हैं। जहाँ 61 लीटर के कंटेनर में चाय आती है।

चाय कारखाने से आने के बाद चूल्हे पर चढ़ी रहती है और लगातार उबला करती है। कभी यह चाय केवल प्याले में बिकती थी लेकिन उसके महंगे दामों और मोबाइलाइजेसन के दबाव में और अब में प्लास्टिक के कप में भी मिल जाती है। हालाँकि प्लास्टिक के इस कप में चाय पीना और चाय वाले यानि दोनों की बेज्जती करना है। एक प्याला चाय चालीस रुपए की है जबकि गिलास वाली चाय 25 की पड़ती है प्याले वाली चाय आम चाय की तरह सुड़क कर नहीं पि जाती है बल्कि चम्मच से खाई जाती है बता दें कि कश्मीरी चाय में जावित्रि, लौंग, जायफल और दूसरे गरम मसाले पड़ते हैं, जबकि इसमें गुलाबी रंग केसर से आता है।

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