पाला बदलने का पछतावा

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भाजपा या राजग से पाला बदलने वाले भाषण वीरों को पछतावा हुआ। वह जहां गए, वहां न सम्मान मिला, न जीत नसीब हुई। पहले से वहां मौजूद खिलाड़ी बैरी अवश्य हो गए। बड़ी दुविधा में फंस गए है। जाएं तो जाएं किधर, और नए ठिकाने पर रहें तो रहें कैसे। यहां तो सभी बेगाने ही नजर आ रहे है। पाला बदलने का निर्णय नवजोत सिंह सिद्धू ने पहले लिया था। वह भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में गए थे। उपमुख्यमंत्री की कुर्सी अवश्य नसीब हुई, लेकिन पंजाब की पूरी कांग्रेस, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री उन्हें पराया ही समझते है। नवजोत सिंह के साथ केवल उनकी पत्नी नवजोत कौर है।
शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा में थे तो खूब बोलते थे, कोई रोक टोक नहीं थी। बड़ी उम्मीद लेकर कांग्रेस में गए थे, उसी उम्मीद के साथ पत्नी पूनम को सपा में भेजा था, दोनों चुनाव लड़े, लेकिन बड़ी बड़ी बातों का मतदाताओं पर असर नहीं हुआ, अब शत्रुघ्न खामोश है। इन्हीं के साथी यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी भी फिलहाल खमोश है। यशवंत के बागी बयानों की वजह से शायद उनके पुत्र जयंत को इस बार मंत्री नहीं बनाया गया।बिहार के कांग्रेसी उन्हें बेगाना ही समझते है।
बिहार के ही उपेंद्र कुशवाहा राजग में थे। नरेंद्र मोदी की पिछली सरकार में मंत्री थे। महत्वाकांक्षा बढ़ी तो पाला बदल लिया। कांग्रेस और राजद के गठबन्धन में शामिल हो गए। अब कहीं के नहीं रहे, दो जगह से लड़े , दोनों जगह से पराजित हुए। उदित राज भाजपा में शामिल होने के बाद पहली बार लोकसभा में पहुंचे थे। लेकिन संतुष्ट नहीं हुए, शायद मंत्री बनने की अभिलाषा थी। यही उन्हें अक्सर विचलित करती थी। भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो कांग्रेस में चले गए। अब पछता रहे होंगे। जीतन राम मांझी राजग में थे, लालू यादव से उनका आम और लीची तक पर विवाद हुआ था। फिर मन बदला, उन्हीं के साथ चले गए। लोकसभा पहुंचने का सपना पूरा नहीं हो सका। उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर राजग में थे। भाजपा के साथ हाँथ मिलाने पर पहली बार चुनाव जीते थे। योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। लेकिन व्यवहार अहंकार से भरा था। उन्हें लग रहा था कि उन्हीं की दम पर भाजपा सरकार बनी है। भाजपा से अलग हो कर चुनाव लड़ा। असलियत सामने आ गई। एक क्षेत्र को छोड़ कर कहीं जमानत भी नहीं बची।
इनके विपरीत रामदास आठवले और राम विलास पासवान दूरदर्शी साबित हुए। राजग में रहे, पाला नहीं बदला। पुनः मंत्री बन गए। रामविलास पासवान की पार्टी के छह सदस्य विजयी हुए।
 नवजोत सिंह सिद्धू और शत्रुघ्न सिन्हा की कहानी लगभग एक जैसी है। दोनों पहले भाजपा में थे, दोनों बड़ा ओहदा न मिलने से परेशान थे, दोनों अपनी अपनी पत्नी को लोकसभा पहुंचाने के लिए बेकरार थे। दोनों भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गए। दोनों कांग्रेस के साथ तालमेल बैठाने में विफल साबित हो रहे है। इसलिए कांग्रेस के नेताओं से इनकी दूरियां बनी हुई है। सिद्धू को पंजाब के मुख्यमंत्री बिल्कुल पसंद नहीं करते। सिद्धू अपनी पत्नी के साथ मिलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल हुए है। कैप्टन भी पलटवार का कोई मौका हाँथ से जाने नहीं देते। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी इनके बीच तकरार चल रही थी। सिद्धू को ऐसी अपमानजनक स्थिति का सामना कभी भाजपा में नहीं करना पड़ा। सिद्धू की पत्‍नी ने आरोप लगाया था।
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेश कांग्रेस प्रभारी आशा कुमारी ने अमृतसर से उनकी टिकट कटवा दी थी।  सिद्धू भी बचाव में उतर गए, कहा कि उनकी पत्नी झूठ नहीं बोलती।  कैप्टन ने सिरे से आरोप खारिज कर दिए। कहा कि टिकट तय करने का काम हाईकमान करता है। वैसे चुनाव प्रचार में सिद्धू को नजरअंदाज किया गया। भाजपा में वह स्टार प्रचारक होते थे। इनके बीच विवाद दो हजार सत्रह में पंजाब में सरकार बनने के साथ ही शुरू हो गया था। उन्होंने कैप्टन को मुख्यमंत्री मानने से भी इंकार कर दिया था।
सिद्धू की पाकिस्तान यात्रा, वहां के सेनाप्रमुख से गले मिलने, पुलवामा प्रकरण आदि पर उनके विचारों का अमरिंदर सिंह ने खुला विरोध किया था। सिद्धू की हरकत के जबाब में  आतंकी हमले के विरोध में मुख्यमंत्री ने पाकिस्तान के खिलाफ  विधानसभा में निंदा प्रस्ताव पेश किया था। उन्होंने सिद्धू पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया था।
सदन के बाहर सिद्धू ने पाकिस्तान सरकार को दोषी मानने से इंकार कर दिया था।
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी राजनीतिक भूमिका की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से की थी। लेकिन पिछले पांच वर्षों तक वह आंतरिक प्रजातंत्र को हवा देते रहे। भाजपा में रहकर उसी को खामोश रखने का प्रयास करते रहे। चर्चा थी कि केंद्र में मंत्री न बनाये जाने से वह प्रधानमंत्री नरेंद मोदी से बहुत नाराज थे। इस नाराजगी को खुलकर बयान नहीं किया जा सकता था, इसलिए वह बड़े बड़े सैद्धांतिक डायलॉग मार रहे थे। लेकिन न उन्होंने भाजपा छोड़ी, न भाजपा ने उनके बयानों को गम्भीरता से लिया। इसलिए उनके पार्टी से बाहर नहीं निकाला गया। शत्रुघ्न सिन्हा को इसीलिए यह लगा होगा कि भाजपा उन्हें टिकट भी देगी। जो उन्हें पार्टी से निकाल नहीं सके वह भला उनकी टिकट क्या काटेंगे। लेकिन लगता है कि भाजपा हाईकमान उनको अपने सिंबल से चुनाव न लड़ाने का निर्णय बहुत पहले ही ले चुका था। इसलिए टिकट वितरण के समय उनके नाम पर विचार तक नहीं किया गया। जबकि शत्रुघ्न अंतिम समय तक इंताजर करते रहे।
अंततः उन्होंने मंशा समझ ली, और कांग्रेस में शामिल हो गए। कहाँ सिद्धांत की दुहाई देते थे, कहाँ कांग्रेस में आ गए। बिहार में वैसे भी कांग्रेस की स्थिति कमजोर है। राजद ने भी उस पर खूब हनक दिखाई। ऐसे में शत्रुघ्न को कांग्रेस की टिकट मिलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने यह नहीं सोचा होगा कि उसने जिसे पटना से उम्मीदवार बनाया है, वह लखनऊ पहुंच कर अपना किरदार बदल लेगा, वहां उंसकी पटकथा , संवाद, वह रोल सब कुछ बदल जायेगा।
शत्रुघ्न सिन्हा इस समय डबल रोल में है। यही बात कांग्रेस को परेशान कर रही है। वह उस घड़ी को कोस रही है, जब भाजपा छोड़कर आये शत्रुघ्न सिन्हा को उसने अपनी पार्टी में शामिल किया। इतना ही नहीं उन्हें मुंहमांगी सीट भी सौप दी। इन्हीं महाशय की पत्नी को सपा ने लखनऊ से उम्मीदवार बनाया है। फिर क्या था, शत्रुघ्न अपने को रोक नहीं सके, वह दौड़ कर लखनऊ आ गए। अपनी पत्नी ने नामांकन में साये की तरह साथ रहे। वहां का नजारा देखने लायक था। सब तरफ सपा और उसके साथ गठबन्धन में शामिल पार्टियों के झंडे थे। कुछ उत्साही कार्यकर्ता कांग्रेस और राहुल गांधी के विरोध में नारे भी लगा रहे थे।
शत्रुघ्न सिन्हा यह सब बड़े सहज भाव से देख सुन रहे थे। वह पत्नी के साथ बड़ी प्रसन्न मुद्रा में थे। पटना में उनके इर्द गिर्द कांग्रेस के झंडे थे, कांग्रेस के नेता कार्यकर्ता थे। शत्रुघ्न सिन्हा एक झटके में इन्हें छोड़ कर आये थे। इस प्रकार पाला बदलने वाले इन नेताओं ने अपने को अवसरवादी और परिवारवादी प्रमाणित किया है।

 

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