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    Home»धर्म»Spirituality»Short Inspirational

    आज फिर ‘आजाद’ जैसे क्रान्तिकारी जज्बे की जरूरत!

    By July 23, 2019 Short Inspirational No Comments10 Mins Read
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    23 जुलाई: चन्द्रशेखर आजाद की जयन्ती

    प्रदीप कुमार सिंह

    अंग्रेजी उपनिवेशवाद के युग में भारत सहित विश्व के लगभग 54 देशों में अंग्रेजी राज के प्रति नफरत और आक्रोश फैला हुआ था। उपनिवेशवाद में यूरोपीय देशों ने पूँजी के द्वारा ‘सर्वोच्च लाभ’ प्राप्त किया है। उपनिवेशवाद का पूरे यूरोप का मुख्य केन्द्र इंग्लैण्ड रहा है। उपनिवेशवाद का तात्पर्य है आर्थिक दृष्टि से विकसित देशों के द्वारा अविकसित देशों का शोषण। पिछड़े देशों की सारी आर्थिक व्यवस्था उनपर निर्भर रहती है। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की अन्यायपूर्ण विचारधारा के कारण अंग्रेज के गुलाम 54 देशों के मूल निवासी गरीबी, बीमारी, अशिक्षा तथा गुलामी से भरा अपमानजनक जीवन जी रहे थे। विश्व के इन देशों की प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करके तथा मानव संसाधन का शोषण करके अंग्रेज अपने देश इंग्लैण्ड को समृद्ध कर रहे थे।

    इस कालखण्ड में गुलाम भारत में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश चरम सीमा पर था। स्वाधीनता आन्दोलन के लिये पूरे राष्ट्र में एक दबी हुई चिगंारी धधक रही थी। ऐसे विकट समय में अमर बलिदानी, भारत माँ के वीर, क्रान्तिकारी सपूत, अप्रतिम साहस के पर्याय चन्द्रशेखर आजाद भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति तथा स्वाभिमान को पुनः स्थापित करना चाहते थे। आजाद ने मातृभूमि की आजादी के लिये खुद के प्राणों को न्योछावर कर दिया यही बलिदान आगे चल कर आजादी का सुप्रभात बना।

    आजाद ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था की पैरवी करते हुये कहा था कि बिना आजाद हुये आप समाज के अन्तिम व्यक्ति तक सम्मानपूर्वक जीवन जीने के संवैधानिक अधिकार को नहीं पहुंचा सकते। जैसे पंक्षी आजाद न हो तो वह आसमान में उड़ नहीं सकते। आजाद ने बताया था कि मेरी माँ चाहती थी कि मैं संस्कृत के विद्वान के रूप में अपनी पहचान बनाऊँ। किन्तु मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलानी थी इसलिये मैंने क्रांति का मार्ग चुना। आजाद जब तक जीवित रहे तब तक आजाद रहे और जब शहीद हुए तब भी आजाद।

    चन्द्रशेखर का जन्म 23 जुलाई 1906 में मध्य प्रदेश के झबुआ जिले के एक गांव में हुआ था। आजाद की एक खासियत थी न तो वे दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। चन्द्रशेखर उस समय पढ़ाई कर रहे थे। 15 वर्ष की उम्र में वह गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सैकड़ों छात्रों के साथ कूदकर आजादी की लड़ाई के यौद्धा बन गये। चन्द्रशेखर को अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार किया तथा अदालत में जज ने नाम पूछा तो उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि आजाद। उसके बाद जज ने पूछा तुम्हारे पिता का नाम क्या है? तो उन्होंने पूरी निडरता से कहा कि आजादी। जज ने पूछा तुम्हारा घर कहा है? तो उन्होंने कहा कि जेलखाने में। यह सुनकर अंग्रेज जज ने गुस्से से भरकर 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई हर कोड़े पर आजाद एक ही नारा लगा रहे थे – भारत माता की जय। वन्दे मातरम्। इस साहसिक घटना ने बालक चन्द्रशेखर को चन्द्रशेखर आजाद बना दिया।

    1922 में जब गांधी जी ने चौरीचौरा में हुई हिंसक घटना के विरोध में अपना आंदोलन रद्द कर दिया, तो इससे आजाद अत्यधिक निराश हुए। वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। अब वह हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। जब क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र हुए तब आजाद ने राम प्रसाद बिस्मिल के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में लखनऊ की तहसील काकोरी स्टेशन के पास ब्रिटिश खजाना तथा हथियार लेकर जा रही ट्रेन को लूटने की योजना बनायी। 1 अगस्त 1925 को काकोरी में ट्रेन से ब्रिटिश खजाना लूटा गया। अंग्रेज चन्द्रशेखर आजाद को तो पकड़ नहीं सके लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां एवं रोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 को तथा उससे 2 दिन पूर्व 17 दिसम्बर को राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी को फाँसी पर लटका कर मार दिया गया था। काकोरी काण्ड में 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी और 16 को कड़ी कैद की सजा हो गयी।

    काकोरी कांड के अमर बलिदानी – शहीद राम प्रसाद बिस्मिल के विचार थे – न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पे दीवाना।

    शहीद अशफाक उल्ला खां के विचार थे – सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए कातिल में है।

    शहीद रोशन सिंह ने कहा था कि जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन, वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।

    शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने कहा था कि ‘‘मैं मर नहीं रहा हूँ , बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।’’

    चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा लेने वाली वीर महिला दुर्गा भाभी क्रांतिकारियों के लिए हथियार जुटाती थी। दुर्गा भाभी ने भगत सिंह तथा राजगुरू को वेश बदल कर भागने में मदद की थी। श्रीमती दुर्गावती देवी (दुर्गा भाभी) क्रान्तिकारी भगवती चरण बोहरा की पत्नी थी, इनके पति रावी नदी के किनारे बम का परीक्षण करते वक्त शहीद हुए थे।

    काकोरी काण्ड के बाद आजाद वेश बदलकर छिपे रहे और फिर दिल्ली आ गये। चन्द्रशेखर आजाद ने उत्तर भारत के सभी क्रान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। दिल्ली में उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसियेशन की स्थापना की। सभी ने एक नया लक्ष्य निर्धारित किया – हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत। योजना के अनुसार व्यापक रूप से बम बनाने का काम शुरू हुआ।

    पूरे देश में 1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ विरोध तथा प्रदर्शन हो रहे थे। लाहौर में अंग्रेजांे की लाठी से चोट खाकर लाला लाजपत राय जी की मृत्यु हो गयी। भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए ब्रिटिश डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल स्काॅट को गोली मारने का दृढ़ निश्चय किया। उन्होंने स्काॅट को पहचानने में गलती की और असिस्टेंट सुप्रिंटेंडेंट सैण्डर्स को मार गिराया। राजगुरू ने आगे बढ़कर उस पर पहला फायर किया। उसके बाद भगत सिंह और सुखदेव दोनों ने उस पर अपने पिस्तौल खाली कर दिये।

    भारतीयों के असंतोष के मूल कारण को समझने के बजाय अंग्रेजी शासन ने डिफेंस आॅफ इंडिया एक्ट के अंतर्गत पुलिस को और अधिक शक्तियां दे दीं। यह एक्ट केंद्रीय विधानसभा में लाया गया, जहां पर एक मत से गिर गया। इसके बावजूद इसे एक अध्यादेश के रूप में लाया गया। भगत सिंह को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जहां इस अध्यादेश को पास करने के लिये बैठक होने वाली थी। यह सावधानीपूर्वक बनाई गई योजना थी। इस योजना का उद्देश्य भारतीयों द्वारा अंग्रेजों के दमन को अब और नहीं सहा जाएगा इस बात सरकार का ध्यान आकर्षित करना था। यह निर्णय लिया गया कि बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अपनी गिरफ्तारी दे देंगे। इस साहसिक घटना का असर सारे देश में होेगा।

    भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को कंेद्रीय विधानसभा के हाॅल में बम फेंका और जानबूझकर खुद को गिरफ्तार करवाया। मुकदमे के दौरान भगतसिंह ने बचाव के लिये वकील लेने से इंकार कर दिया। 7 अक्टूबर, 1930 को एक विशेष अदालत द्वारा भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सजा सुनाई गयी। भगत सिंह और उनके साथियों को 23 मार्च, 1931 को तड़के फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया। ये तीनों आजादी के मतवाले ‘मेरा रंग दे बसंती का चोला’ गीत हंसते-गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गये। सैण्डर्स हत्याकाण्ड में सरदार भगत सिंह, राजगुरू तथा सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाये जाने पर आजाद काफी आहत हुए। आजाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों महान क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। तब आजाद ने संकल्प लिया था कि वह कभी ब्रिटिश पुलिस द्वारा पकड़े नहीं जायेंगे।

    इलाहाबाद में आजाद अपनी साईकिल पर बैठकर 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क गये। एक गद्दार ने ब्रिटिश पुलिस को आजाद के ठिकाने की जानकारी दे दी। आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस ने घेर लिया। आजाद पूरी बहादुरी के साथ काफी देर तक ब्रिटिश पुलिस का सामना करते रहे और जब आखिरी गोली बची तो उन्होंने खुद को गोली मारकर भारत माता के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी। आजाद की बलिदान के समय अल्प आयु मात्र 24 वर्ष 7 महीने और 4 दिन थी। ऐसा करके चन्द्रशेखर आजाद ने अपने नाम को सार्थक कर दिया। वह आजाद ही जिए और आजाद ही मरे। आजादी के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चन्द्रशेखर आजाद पार्क रख दिया गया।

    आज की पीढ़ी को ज्यादा जानकारी न हो कि आजाद अपनी मातृभूमि से कितना अधिक प्यार करते थे। ऐसे लोग जो आज देश विरोधी नारे लगा रहे हैं और भारत के टुकड़े करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्हें चन्द्रशेखर आजाद की जीवनी बहुत ध्यान से पढ़नी चाहिए। चन्द्रशेखर आजाद तथा उनके जैसे हजारों शहीदों ने भारत की आजादी के लिए अपनी जान दे दी थी। वे आज जब यह देखते होगे कि आजादी के नाम पर हमारे देश में क्या-क्या हो रहा है। तो सोचिए उनकी आत्मा को कितना दुःख पहुँचता होगा। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने आजाद की बहादुरी के बारे में कहा था कि, “मैं साहसी चंद्रशेखर आजाद को सलाम करता हूं, जिन्होंने अपने साहस से असंख्य भारतीयों का दिल जीत रखा है।”

    21वीं सदी के आपसी परामर्श के युग में विश्व का संचालन परमाणु शस्त्रों की होड़ से नहीं किया जाना चाहिए वरन् प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून से होना चाहिए। परमाणु बमों की होड़ के दुष्परिणाम के कारण आज धरती माता बारूद के ढेर पर बैठी है। संसार भर में जनता का टैक्स का पैसा वेलफेयर (जन कल्याण) में लगने की बजाय वाॅरफेयर (युद्ध की तैयारी) में लग रहा है। शक्तिशाली देशों की देखादेखी विश्व के अत्यधिक गरीब देश भी अपनी जनता की बुनियादी आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य की सुविधायें उपलब्ध करने की बजाय अपने रक्षा बजट प्रतिवर्ष बढ़ा रहे हैं।

    हमारा मानना है कि जगत गुरू भारत ही अपनी संस्कृति, सभ्यता तथा संविधान के बलबुते सारे विश्व को बचा सकता है। इसके लिए हमें प्रत्येक बच्चे के मस्तिष्क में बचपन से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महान संस्कृति डालने के साथ ही उन्हें यह शिक्षा देनी होगी कि हम सब एक ही परमपिता परमात्मा की संतानें हैं और हमारा धर्म है – सारी मानवजाति की भलाई। मानव जाति को अब संकल्प लेना चाहिए कि प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्धों, दो देशों के बीच होने वाले अनेक युद्धों तथा हिरोशिमा और नागासाकी जैसी दुखदायी घटनाएं दोहराई नहीं जायेगी।

    आजाद का आजादी का अभियान 1947 में आजाद भारत के रूप में पूरा हो चुका है। भारत के आजाद होते ही विश्व के 54 देशों ने अपने यहां से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेका था। आजाद ने अपने साहसिक कार्यों द्वारा हमें सीख दी थी कि आजादी जीवन है तथा गुलामी मृत्यु है। देश स्तर पर तो लोकतंत्र तथा कानून का राज है लेकिन विश्व स्तर पर लोकतंत्र न होने के कारण जंगल राज है। द्वितीय विश्व युद्ध विभाषिका से घबराकर अमेरिका की पहल से वर्ष 24 अक्टूबर 1945 को विश्व की शान्ति की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी।

    संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय ही अलोकतांत्रिक तरीके से सबसे ज्यादा परमाणु हथियारों से लैश अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन तथा फ्रान्स को वीटो पाॅवर (विशेषाधिकार) दे दिया गया। इन पांच देशों द्वारा अपनी मर्जी के अनुसार विश्व को चलाया जा रहा है। आजाद जैसी महान क्रान्तिकारी आत्माओं के प्रति सच्ची श्रद्धाजंलि यह होगी कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक तथा युवा भारत को अब वीटो पाॅवररहित एक लोकतांत्रिक विश्व व्यवस्था (विश्व संसद) के गठन की पहल पूरी दृढ़ता के साथ करना चाहिए। विश्व स्तर पर लोकतंत्र तथा कानून के राज को लाने के इस बड़े दायित्व को हमें समय रहते निभाना चाहिए।

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