राहुल कुमार गुप्त
किसान महाआंदोलन के बीच जैसे ही संसद सत्र शुरू हुआ विपक्ष ने किसानों के समर्थन में आ तीनों कृषि विधेयकों को वापस लेने की मांग की है। वहीं सत्ता पक्ष तीनों कृषि विधेयकों को किसानों के हित व देश की समृद्धि के लिए बेहतर बता रहा है। राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में स्पष्ट रूप से संदेश भी दिया है कि कुछ भी हो जाये ये बिल निरस्त नहीं किये जायेंगे। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भी विपक्ष से पूछा है कि कृषि बिलों में काला क्या है?
समस्या केवल यहीं पर आकर टिक गयी है कि आंदोलनरत किसानों को इसमें सफेदी नहीं दिखाई दे रही और सत्ता को इन बिलों में काला नहीं दिखाई दे रहा है। कुछ किसानों व विशेषज्ञों का मानना है कि इस काजल में कुछ सफेदी तो जरूर है पर काजल की कोठरी में इस सफेदी की उम्र बहुत कम है।
यह किसान आंदोलन राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना चुका है, कई विश्व प्रसिद्ध मानवतावादी हस्तियां किसान आंदोलन के पक्ष में अपना समर्थन दे रही हैं जिससे भारतीय सरकार थोड़ा दबाव में भी आयी है।
जिससे दिल्ली की कई सीमाओं पर लगाई गईं बड़ी-बड़ी कीलें निकालने का काम भी कुछ जगहों से शुरू हो गया है।
विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ती ग्रेटा थुनबर्ग, पाप सिंगर रिहाना जैसी हस्तियों का किसान समर्थन में आने पर सत्ता समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया में अपशब्दों का प्रयोग करना तथा तमाम अन्नदाताओं को आतंकवादी, देशद्रोही कहना भारत की संस्कृति को तार-तार करने वाला ही है।
इस आंदोलन का सही अंजाम क्या होगा?
सरकार किसानों से स्वस्थ वार्ता करे, किसानों की बातों को भी धैर्य पूर्वक सुने और समाधान निकालने के लिए दोनों तरफ से विशेषज्ञों की टीम हिस्सा लें। क्योंकि इस काजल में कुछ सफेदी भी है वही सफेदी देश के विकास व किसानों की समृद्धि में बड़ी सहायक साबित होगी, किंतु बिना दाग के ये सफ़ेदी काजल की कोठरी से निकलेगी कैसे??







