देश मे एक साथ चुनाव होंने के फायदे

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जी के चक्रवर्ती

देश के दो राज्यों हरियाणा एवं महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन को लेकर चल रहे खीचतान के बीच झारखंड में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित किये जाने के बाद से यह बात एक बार फिर से चर्चा में है कि इस तरह से देश मे जल्दी-जल्दी चुनावों के होने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा? इससे समाज के लोंगों को कब और कैसे छुटकारा मिलेगा? सवाल है कि आखिरकार मौजूदा सरकार द्वारा देश में एक साथ चुनाव कराने की बातों का कई दफे जिक्र करने के वाबजूद हरियाणा एवं महाराष्ट्र के साथ ही देश के झारखंड राज्य में विधानसभा चुनाव को एक ही साथ कराने की पहल क्यों नहीं की गई?

इस तरह के प्रश्न का जो भी उत्तर हो लेकिन इस तरह की बातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अभी जैसे ही झारखंड विधानसभा चुनाव खत्म होंगे वैसे ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव भी नजदीक होंगे। फिर दिल्ली विधानसभा चुनाव के समाप्त होते ही उधर बिहार विधानसभा चुनाव निकट सर पर आ खड़े होंगे। यदि तनिक इस बात पर गौर करें तो हम कह सकते हैं कि ऐसा सिलसिला जल्द समाप्त नहीं होने वाला है।

इस तरह से बार-बार देश मे होने वाले चुनावों से मात्र सरकारी खजाने पर ही बोझ ही नही पड़ता बल्कि चुनाव के दौरान 100-200 दिन के लिए कर्मचारियों को इधर से उधर नहीं भेजे जाने से शासन- प्रशासनिक तंत्र के कार्यों में भी बाधाएं पहुँचना स्वाभाविक सी बातों है। इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न राजनीतिक दलों की प्राथमिकताए भी इससे प्रभावित होती हैं। हालांकि अभी कुछ समय पहले लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने पर बहस अवश्य हुई, लेकिन यह बहस बिना किसी नतीजे पर पहुंचे ही समाप्त हो गयी। जिसका मात्र एक ही कारण था कि राजनीतिक दलों ने देश मे एक साथ चुनाव कराने को लेकर गंभीरता का परिचय नहीं दिया।

यहां यह बात जरूर है कि लोकसभा के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव कराने में कुछ जायज परेशानियाँ अवश्य हैं, जहां तक हम परेशानियों की बात करें तो 16वीं लोकसभा के चुनाव में जीत दर्ज़ करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश मे चुनावी प्रक्रिया के एकत्रीकरण की बहस प्रारंभ किया, इसी रास्ते पर चलते हुए कदमों को आगे बढ़ाते हुए अब सरकार ने लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने की संभावनाओं को तलाशने का काम नीति आयोग को सौंप चुका है। चुनावी प्रक्रिया का एकत्रीकरण एक गंभीर विषय है, जिसका संबंध समकालीन राजनीति से तो है ही, साथ ही देश की जीवंत संवैधानिक प्रक्रियाओं से भी है। भारत जैसे इतने बड़े विशाल आबादी वाले देश में एक साथ इतने बड़े पैमाने पर इन चुनावों को करवाया जाना क्या इतना सहज कार्य है? इस राह में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?

लेकिन यह परेशानियां ऐसी भी नहीं है कि उनका कोई भी समाधान ढूंढा नही जा सकता है। हां यहां एक बात और है कि ऐसा करने के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना बहुत आवश्यक है। देश मे एक साथ चुनाव कराने को लेकर अनेको तरह की बातें विरोध में और अनेको पक्ष में हमेशा की जाती रहेंगी लेकिन आजादी के बाद से एक लम्बे समय तक यानी कि वर्ष 1952 से लेकर वर्ष 1967 तक हमारे देश मे एक साथ चुनाव सम्पन्न हुये हैं लेकिन इसे इंदिरा गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस सरकार द्वारा भंग कर दिया गया था, आखिरकार जो काम पूर्व में किया जा चुका है वही आज पुनः शरू क्यों नहीं किया जा सकता है?

जैसा कि राजनीतिक लोगों द्वारा एक साथ चुनाव को लेकर यह तर्क दिया जा रहा है कि ऐसा किये जाने पर क्षेत्रीय दलों को घाटा हो सकता है। इस तरह के तर्को में कुछ तथ्य अवश्य है, लेकिन इसके लिये लोकसभा चुनाव के दो या तीन साल के अंतराल पर सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं। इस प्रकार से यदि हम देखे तो पांच वर्षों के अवधि के दौरान देश को मात्र दो ही दफे चुनावों का सामना करना पड़ेगा जिसमें सर्वप्रथम लोकसभा का चुनाव और उसके बाद विधानसभाओं का चुनाव होना तय किया जाये।

हां देश का झारखंड राज्य नक्सली हिंसा से ग्रस्त होने के कारण वहां के 81 विधानसभा सीटों के लिए पांच चरणों में मतदान कराया जाना चाहिये। यहाँ पर एक और बात सामने निकल कर आती है कि लगभग एक साल पहले छत्तीसगढ़ में 72 सीटों के लिए दो चरणों में मतदान सम्पन्न हुआ था। इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि इस तरह के स्थितियों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए कि आखिर नक्सली संगठने देश के इन राज्यों में होने वाले चुनावों में कब तक दखलंदाजी करते रहेंगे?

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