यूरोपीय संघ के सांसदों का कश्मीर दौरा और घाटी के हालात

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जी के चक्रवर्ती

कश्मीर पहुंचे यूरोपीय संघ के सांसदों का नजरिया भारत के इस राज्य की हालातों पर किये गये आंकलन के आधार पर भारत के इस राज्य की वर्तमान स्थिति के विषय में अंतरास्ट्रीय विश्व समुदाय के लोगों के रुख एवं नजरिये को कितना प्रभावित करने में सक्षम होगा यह तो घाटी के मौजूदा हालात और स्थितियों पर ही निर्भर करेगा। यूरोपीय देशों के सांसदों के सदस्यों की टीम श्रीनगर पहुंचते ही आतंकियों ने जिस तरह वहां पर काम काज के उद्देश्यों से गये मजदूरों को भी निशाना बना डाला इससे तो यही स्पष्ट होता है कि कश्मीर में मौजूदा समय के हालात तो बिलकुल सामान्य नही है। वरन वहाँ के हालात सामान्य होने में अभी और भी वक्त लगेगा।

जम्मू कश्मीर पर अभी जिस तरह की स्थिति मौजूद है उसे संभलाने में सफलता तभी मिल पायेगी जब तक कि वहां के मौजूद आतंकी वहां से भागने को विवश नही हो जाते हैं। साथ ही घाटी के आम कश्मीरी जनता दहशत फैलाने वाले आतंकवादियों के खिलाफ खुल कर सामने नही आ जाते। यहां के माहौल में कहीं अधिक आसानी के साथ परिवर्तन लाया जा सकता है।

जबकि ऐसा कतई नही है कि कश्मीर में इससे पहले बाहरी लोगों को निशाना नही बनाया गया हो, लेकिन जहां तक निकट कुछ दिनों पहले की बात करें तो घाटी में बाहर के लोगों को जिस तरह से उन्हें मौत के घाट उतारा गया है उससे तो यही बात निकल कर सामने आती है कि पाकिस्तानी परस्त आतंकवादी गैर कश्मीरी लोगों में डर का माहौल पैदा करना चाहता हैैं, जबकि यह इस तरह के सभी कार्य उनकी तथाकथित लड़ाई का राजनीतिक अधिकारों से कोई भी सरोकार नहीं है। बल्कि सच तो यह है कि कश्मीर में वहां के लोगों के अधिकारों के नाम पर आतंकियों का कारोबार बदस्तूर जारी है इसीलिए उन निर्दोष लोगों को भी मारने में भी गुरेज नही है जबकि ऐसे मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग वहां कश्मीरी लोगों के भलाई एवं उन्नति में उनका हाथ बंटाने के लिए वहां रह रहे हैैं।

कश्मीर में पिछले तीन महीने के दौरान दस हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबारी नुकसान हो चुका है। ले-देकर कुछ उम्मीदें सेब व्यापारियों की बनी हुईं थीं और सरकार ने कारोबारियों को पूरी सुरक्षा मुहैया कराने का भरोसा भी दिया था। लेकिन अब वहाँ के हालात कुछ और ही बयां करते हैं। बागों में सेब पड़े सड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें उठाने और मंडियों तक पहुंचाने वाला या ओर कोई पुख्ता इंतजाम भी नहीं है।

यूरोपीय देशों के सांसदों के अलावा सम्पूर्ण विश्व समुदाय इन सब चीजो की अनदेखी नहीं कर सकता कि कश्मीर पहुँचे ट्रक ड्राइवरों एवं वहां पर देश के अन्य हिस्से से गये मजदूरों पर किए गए आतंकी हमलों में एक दर्जन से अधिक लोग अपने जान से हाथ धो बैठे। चूंकि ऐसे आतंकी हमले हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के इशारों पर इस तरह के हमलों को अंजाम दे रहे हैैं इसलिए इससे एक किसी हद तक संतुष्ट हुआ जा सकता है कि यूरोपीय देशों के सांसदों ने कश्मीर में आतंक के लिए पाकिस्तान पर निशाना साधते हुये आतंक और आतंकवादियों के खिलाफ चलने वाले लड़ाई में भारत का साथ देने की इच्छा जाहिर की है।

आखिरकार पाकिस्तान कब तक ऐसे कारनामो से बाज आयेगा? इससे भी अहम प्रश्न तो यह है कि पाकिस्तान अपने जमीन से आतंकवाद और आतंकवादियों को कब तक पालता पोसता रहेगा? ऐसे में इस तरह के प्रश्नों के उठने से यह हमारे लिए अच्छा नहीं हुआ कि यूरोपीय देशों के सांसदों के कश्मीर दौरे को लेकर विवाद जैज़ी इस्थिति उठ खड़ा हुआ है।

इन सांसदों के भारत के कश्मीर दौरे को लेकर उठाए गए विपक्ष के सभी तरहों के प्रश्नों को बिल्कुल से नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता, क्योंकि विपक्ष के इस तरह की मांगों में निश्चित रूप से वजन है कि आखिर इन सांसदों को कश्मीर आमंत्रित करने के पहले हमारे देश के विपक्षी नेताओं को वहां क्यों नहीं जाने दिया गया? विपक्ष के ऐसे सही प्रश्न के बीच इस तरह के बात को भी सही कहा जायेगा है कि विपक्षी नेताओं के कश्मीर दौरे को यूरोपीय संघ के सांसदों जैसे विश्व समुदाय में कोई भी अहमियत नही रखती है।

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