रसातल में कांग्रेस की राफेल उड़ान

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री

राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद के कार्यकाल का अधिकांश समय राफेल पर समर्पित था। उन्होंने इस दौरान लगभग सभी सभाओं में प्रधानमंत्री के विरुद्ध अमर्यादित नारे लगवाए। कई विधानसभाओं और लोकसभा तक उनकी यह नारेबाजी चलती रही। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का हवाला दे कर अपने कथन को सही बताया था। अच्छा रहा कि राहुल ने समय रहते इसके लिए माफी मांग ली, और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें माफ भी कर दिया। लेकिन राहुल ने अपने लिए विश्वास का जो संकट पैदा किया है, उससे निकलना आसान नहीं होगा।

राफेल समझौते पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल याचिका करने वालों के लिए नहीं है। इस पर अमर्यादित अभियान चला रहे लोग भी शर्मशार हुए है। इसके सूत्रधार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी थे। उन्होंने राफेल समझौते में न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत व अमर्यादित आरोप लगाए थे, बल्कि अपशब्दों का प्रयोग भी किया। इसमें आरोप लगाने , तहकीकात करने और फिर फैसला सुनाने का काम राहुल खुद कर रहे थे। उनका कहना था कि देश का प्रधानमंत्री चोर है, हमने विमान की कीमत कम लगाई थी, प्रधानमंत्री फ्रांस जाते हैं, पता नहीं खरीद प्रक्रिया में क्या बदलाव करते हैं, कीमत बढ़ जाती है। वह चौकीदार नहीं बेईमान है।

राफेल डील को रद्द कराने के लिए कांग्रेस ने जो आसमान सिर पर उठाया था, उसे भूलना मुश्किल है। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे लेकर कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकसभा के आम चुनाव के दौरान अपनी प्रत्येक जनसभा में वह चौकीदार चोर का नारा लगवाते थे। कहा कि गोवा के एक मंत्री के ऑडियो में राफेल की सच्चाई है। इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि क्या वह इस बात की गारंटी लेते हैं कि ऑडियो सही है। राहुल तो हवा में तीर चला रहे थे। उनके पास कोई प्रमाण नहीं था। इस लिए पलट गए। ऑडियो सुनने की जिद छोड़ दी। अनिल अंबानी और एचएएल को लेकर कई बार सवाल उठाये गए।

अंबानी, भारत और फ्रांस की सरकार, दसॉ कम्पनी सभी ने इन आरोपों को निराधार साबित किया। एचएएल को उबारने के लिए केन्द्र सरकार ने बावन बार सहायता दी थी। राफेल डील में दसॉ ने एचएएल से निर्मित होने वाले लड़ाकू विमान की गारंटी लेने से मना कर दिया था। उसका कहना था कि एचएएल के साथ मिलकर भारत में एक लड़ाकू विमान बनाने में उसे ढाई गुना अधिक समय लगता। उसने किसी और पार्टनर को चुनने के लिए देश की ऑफसेट नीति का सहारा लिया। इस ऑफसेट पार्टनर नीति को पूर्व की यूपीए सरकार ने दो हजार तेरह में बनाया था।

कांग्रेस सरकार दस में कोई करार नहीं कर सकी थी। दो हजार सोलह में जो सौदा हुआ, उसके आधार पर बेयर एयरक्राफ्ट अर्थात युद्धक प्रणालियों से विहीन विमान का दाम यूपीए की कीमत से नौ प्रतिशत कम था और हथियारों से युक्त विमान यूपीए की तुलना में बीस प्रतिशत सस्ता था। ऑफसेट का मतलब है कि किसी विदेशी से सौदा करते हैं तो कुछ सामान अपने देश में खरीदना होता है। राफेल में तीस से पचास प्रतिशत सामान भारत में खरीदने की बात है। कुल ऑफसेट उनतीस हजार करोड़ रुपये का है। कांग्रेस ने एक लाख तीस करोड़ होने का आरोप लगाया था। ऑफसेट तय करने का काम विमान तैयार करने वाली कंपनी का था। कांग्रेस राफेल खरीद प्रक्रिया जानने को बेताब थी। उसका भी माकूल जवाब मिला। राफेल की खरीद के दौरान पूरी प्रक्रिया का पालन किया गया। अनुबंधन वार्ता समिति, कीमत वार्ता समिति आदि की चौहत्तर बैठकें हुई।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी दी थी। कांग्रेस ने राफेल पर हंगामा किया था। पहला राफेल विमान भारत को मिलने के बाद भी कांग्रेस की प्रतिक्रिया नकारात्मक ही रही। विजयदशमी को विमान मिलना था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारतीय परंपरा के अनुसार फ्रांस में शस्त्र पूजन किया। कांग्रेस को यह पूजन पसंद नहीं आया। उसे निराशा हाथ लगी। राफेल विमान निर्माता कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक ट्रेपर ने भारतीय रक्षा मंत्री को पहला विमान सौंपा था। भारत और फ्रांस के बीच सामरिक संबंधों में नया अध्याय जुड़ा है। भारत सरकार भारतीय वायु सेना की क्षमता बढ़ाने और उसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों और हथियारों से लैस करने के लिए कटिबद्ध है। दसॉ कंपनी समय सीमा के अंदर सभी राफेल विमानों की आपूर्ति कर देगी। दो हजार बाइस तक सभी छत्तीस राफेल भारत को मिल जाएंगे। इससे भारतीय वायु सेना की शक्ति बहुत बढ़ जाएगी।