संविधान के अनुरूप राज्यपाल की भूमिका

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार बहुमत साबित कर सकेगी या नहीं, यह कुछ समय बाद पता चलेगा, किंतु राज्यपाल का निर्णय अपनी जगह सही था। उन्होंने संविधान की भावना का पालन किया। वह चाहते तो शुरू में ही सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला सकते थे। उन्होंने पूरी प्रक्रिया का पालन किया। इस प्रकरण से कई तथ्य उजागर हुए। पहला यह कि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तत्काल निर्णय की बात नहीं मानी, दूसरा यह कि अब कांग्रेस और एनसीपी के लिए कोई पार्टी साम्प्रदायिक नहीं रही, तीसरा यह कि शिवसेना, कांग्रेस,एनसीपी सत्रह दिन में भी किसी निर्णय पर क्यों नही पहुंच सकी।

राज्यपाल ने किस आधार पर निर्णय लिया इस पर भी विचार किया जाएगा। प्रथमद्रष्टया यह लगा होगा कि राज्यपाल ने सभी पक्षों को पर्याप्त अवसर दिया। कांग्रेस, एनसीपी व शिवसेना इतने दिन बाद भी किसी निर्णय से राज्यपाल को अवगत कराने में विफल रही। इस बीच सबसे बड़ी पार्टी को अजित पवार, उनके कई साथी विधायक और कुछ निर्दलीय विधायको ने समर्थन दिया। ऐसे में राज्यपाल ने इस नए गठबन्धन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। यहां तक कि प्रक्रिया संविधान की भावना के अनुरूप थी। संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते है। इसी में आगे कहा गया कि मंत्रिपरिषद विधानसभा के विश्वास पर्यन्त पद पर रहेगी।

इन प्रावधानों को जोड़कर देखे तो स्पष्ट होता है कि राज्यपाल सबसे बड़े दल या गठबन्धन के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने क्रमशः सभी पार्टियों को अवसर दिया। सभी ने इनकार किया। इसके बाद भी उन्होंने सत्रह दिन प्रतीक्षा की। उनके सामने अंतिम बार भाजपा और अजित पवार गुट की दावेदारी थी। इस गठजोड़ के नेता देवेंद्र फडणवीस थे। उनको सकरार बनाने के लिए आमंत्रित करना संविधान की भावना के अनुकूल था। इसके बाद बहुमत का निर्णय विधानसभा में ही होना चाहिए। इसके लिए राज्यपाल ने सामान्य रूप से ही समय सीमा दी। इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। याचिकाकर्ता इस बात से बेहाल थे कि सुप्रीम कोर्ट तत्काल बहुमत परीक्षण का आदेश दे, नहीं तो खरीद फरोख्त होगी। इन लोगों को यह भी बताना चाहिए था कि इतना दिन बाद भी शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी कोई निर्णय क्यों नहीं ले सकी। क्या उनकी बैठकों में सब कुछ सामान्य था, या वहां भी कुछ लेनदेन या सौदेबाजी की चर्चा चल रही थी।

लगता नहीं कि इन तीन पार्टियों को पूरा समय देने के बाद राज्यपाल का देवेंद्र फडणवीस को सरकार बनाने हेतु आमंत्रण देना गलत था। उस समय की स्थिति में यही गठबन्धन सबसे आगे था। शिवसेना, कांग्रेस,एनसीपी तीनों ही दुविधा की शिकार थी। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अवश्य कहा था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन बिडम्बना देखिए कि इसके लिए न उद्धव ने मन बनाया था, न कांग्रेस ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। इसके पहले उद्धव अपने पुत्र आदित्य को मुख्यमंत्री बनाने के लिए परेशान थे। जाहिर है कि इन तीनों पार्टियों के बीच बड़े पेंच थे। ऐसे में राज्यपाल के निर्णय को शायद अनुचित नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकरण से दूसरी बात यह उजागर हुई कि कांग्रेस के लिए अब कोई भी साम्प्रदायिक नहीं रहा। जब वह हिंदूवादी पार्टी शिवसेना से हाँथ मिला सकती है, तब इस विषय पर अब उसके सामने बोलने के लिए कुछ बचा नहीं है। अभी तक वह दावा करती थी कि भाजपा और शिवसेना साम्प्रदायिक पार्टियां है। इनको रोकने के लिए वह कुछ भी कर सकती है। अब उसकी यह दावेदारी समाप्त हुई। शिवसेना का हिंदुत्व एजेंडा किसी से छिपा नहीं था। कुछ दिन पहले ही उद्धव ठाकरे सपरिवार अयोध्या आये थे। यहां उन्होंने बाबरी ढांचे के विध्वंस में शिवसैनिकों के योगदान पर गर्व व्यक्त किया था। इसी के साथ उद्धव ने केंद्र सरकार से अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण सुनिश्चित करने की मांग की थी। यह जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आने के पहले की बात है। इसके अलावा हिंदुत्व से जुड़े प्रत्येक मसले पर शिवसेना मुखर रही है।
बिडम्बना देखिए अब कांग्रेस को उसके साथ हाँथ मिलाने में भी कोई संकोच नहीं रहा। वह सरकार बनाने पर निर्णय भले ही न ले सकी हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में वह शिवसेना के साथ है। यही बात एनसीपी पर लागू है। शरद पवार भी कभी कांग्रेस से बगावत करने वालों में शामिल रहे है। उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था। फिर वह सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले संप्रग में शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट में वह भी शिवसेना के साथ है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी की है। देवेन्द्र फडणवीस और अजीत पवार को आमंत्रित करने वाला राज्यपाल का आदेश व समर्थन पत्र कोर्ट में पेश करने को कहा है। जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी की ओर से दायर याचिका पर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने बहस की। कपिल सिब्बल ज्यादा ही बेकरार थे। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा के पास बहुमत है तो आज ही उन्हें विश्वास मत हासिल करने का आदेश दिया जाए।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि शिवसेना और उसके गठबंधन को बांबे हाईकोर्ट जाना चाहिए था, सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं आना चाहिए था। मुकुल रोहतगी का दावा था कि सरकार के गठन की प्रक्रिया सही है, इसलिए दलों को नोटिस जारी कर तीन चार दिन के बाद सुनवाई हो। उन्होंने कहा कि चौबीस अक्टूबर से नौ नवम्बर के बीच अगर शिवसेना के पास संख्या थी तो सत्रह दिनों तक सरकार क्यों नहीं बनी। राज्यपाल ने देवेंद्र फडणवीस को सरकार बनाने का न्यौता देकर सही काम किया है। रोहतगी ने कहा कि राज्यपाल के फैसले की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती है। अनुछेद दो सौ बारह के मुताबिक गलत प्रक्रिया अपनाने की वजह से किसी राज्य की विधायिका के क्रियाकलाप पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। यह विधायिका का ही अधिकार है।