कश्मीर का भारतीयकरण

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री

इस बार पटेल जयंती पर मनाया जाने वाला राष्ट्रीय एकता दिवस सच्चे अर्थों में सार्थक रहा। सरदार पटेल अनुच्छेद तीन सौ सत्तर से असहमत थे। नरेंद्र मोदी सरकार ने उनके सपने को साकार किया। इकतीस अक्टूबर को जम्मू कश्मीर राष्ट्रीय एकीकरण की मुख्यधारा में शामिल हुआ। इसके ठीक पहले यूरोपीय यूनियन के सांसद कश्मीर गए थे। जिन्होंने भी कश्मीर पर भारत के निर्णय से सहमति व्यक्त की। इनका कहना था कि कश्मीर भारत का है, इसलिए उसपर किसी प्रकार के निर्णय का अधिकार भी भारत को है।

ऐसा लगता है कि कांग्रेस अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के लिए अभी तक बेचैन है। यूरोपीय सांसदों की जम्मू कश्मीर यात्रा पर उंसकी प्रतिक्रिया से यही जाहिर हुआ। उसने सरकार पर हमला बोला, कहा कि सरकार जम्मू कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण कर रही है। उसने सांसदों की इस यात्रा में योगदान करने वाली एक महिला पर भी सवाल उठाए, यूरोपीय सांसदों पर भी व्यक्तिगत टिप्पणी की। इससे यही लगा कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व जमीनी स्थिति और जनमानस के मिजाज को समझने में नाकाम है। उसने इतना भी संयम नहीं दिखाया कि विदेशी मेहमानों के वापस चले जाने के बाद बयान जारी करती। ये संसद सदस्य किसी जांच दल के रूप में नहीं आये थे। इनके जम्मू कश्मीर आने से भारत की ही प्रतिष्ठा बढ़ी है। भारत ने दिखा दिया कि उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। पाकिस्तान और तुर्की इसी बात का आरोप लगा रहे थे। जहाँ तक कश्मीर मसले के अंतर्राष्ट्रीयकरण करने का कांग्रेसी आरोप है, उसे हास्यास्पद ही कहा जायेगा।

ऐसी बातें तो अनुच्छेद तीन सै सत्तर और पैंतीस ए की समाप्ति के बाद ही निरर्थक हो गई थी। ऐसा करके मोदी सरकार ने यह दिखा दिया कि कश्मीर पर निर्णय का पूरा अधिकार केवल भारत का है। इसमें किसी अन्य देश को हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है। भारत के इस बयान को पूरे विश्व का अभूतपूर्व समर्थन मिला।

पाकिस्तान की बात अलग है, तुर्की, साइप्रस अपवाद की तरह है। सभी ने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय मसला नहीं है। बल्कि यूरोपीय सांसदों की यात्रा से कश्मीर मसले का भारतीयकरण हुआ है। क्योंकि इन सभी ने एक स्वर में कहा कि कश्मीर में भारत जो भी कर रहा है, यह उसका अधिकार है। यह भारत का आंतरिक मामला है। कांग्रेस सहित कुछ पार्टियों ने भारतीय सांसदों को जम्मू कश्मीर जाने के रोकने की आलोचना की। इन्होंने कहा कि कांग्रेस व कम्युनिस्ट पार्टी के सांसदों को जम्मू कश्मीर जाने से रोका गया। जबकि यूरोपीय सांसदों को वहां जाने की अनुमति दी गई।

नेशनल कांफ्रेंस व पीडीपी के कई नेता नजरबंद है, इनमें सांसद भी शामिल है। कांग्रेस प्रवक्ता ने यह बयान तब दिया, जब यूरोपीय सांसद भारत में थे। इससे कांग्रेस की ही फजीहत हुई है। यह तथ्य यूरोपीय सांसदों के सामने आ गया। उन्हें पता चला कि कुछ भारतीय सांसदों को कश्मीर जाने से क्यों रोका गया, क्यों कुछ नेता नजरबंद है। जिन्हें रोका गया वह कश्मीर में शांति देखने नहीं जा रहे थे। यह वहां को लोगों को उकसाने का भी प्रयास कर सकते थे। यह सरकार का बयान नहीं, बल्कि इसके लिए इनके ही बयानों को देखना होगा। ये वही नेता है जो कह रहे थे कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटा तो कोई यहां तिरंगा उठाने वाला नहीं मिलेगा, कोई कह रहा था कि कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा, यह तीन सौ सत्तर से ही जुड़ा था, केंद्र ने भारत की गर्दन काट दी है।

ऐसे बयान देने वालों को रोकना ही राष्ट्रीय हित में था। ऐसे लोगों ने ही जम्मू कश्मीर और लद्दाख के लोगों को सत्तर वर्षों तक इसी मुगालते में रखा,उनको अधिकारों से वंचित रखा। ये सभी तीन सौ सत्तर के हटने से बौखलाए हुए है। जबकि यूरोपीय संसद सदस्य भारत आने से पहले ही कह चुके थे कि कश्मीर भारत का आंतरिक मसला है। जबकि कांग्रेस और कम्यूनिस्ट नेता तीन सौ सत्तर पर पाकिस्तान जैसी भाषा बोल रहे थे। यूरोपियन यूनियन प्रतिनिधि मंडल में शामिल सांसदों ने बुधवार को कश्मीर के हालात से संतुष्ट हुए। कहा कि यह भारत का आंतरिक मामला है। यहां केवल सीमापार के आतंकवाद की समस्या है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में यूरोप भारत के साथ हैं।

आतंकवाद केवल भारत का मुद्दा नहीं है कि बल्कि पूरे विश्व का मसला है। इन सांसदों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के द्वारा अपने बयान साझा किए। इससे भारत के पक्ष को वैश्विक मजबूती मिली है। कांग्रेस सहित कुछ पार्टियों के नेता अवश्य निराश है। योरोपीय सांसदों ने कहा कि भारत एक शांत देश है। कश्मीर भारत का ही अंग है। यहां के लोगों को भारत से ही उम्मीदें हैं। उनके इस दौरे को राजनीतिक चश्मे से देखा जाना बिल्कुल ठीक नहीं है। हम सिर्फ यहां हालात का जायजा लेने आए हैं। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर व पैंतीस ए को हटाना भारत का आंतरिक मामला है। अब कश्मीर में शांति व विकास का दौर शुरू होगा। भारत पाकिस्तान के बीच वार्ता से ही शांति स्थापित हो सकती है।

यूरोपियन यूनियन के सांसदों ने आतंकवाद के मसले पर भारत का समर्थन किया। यूरोपीय देश आतंकवाद के खिलाफ हैं। यूरोपीय संसद में इस कश्मीर दौरे की रिपोर्ट पेश नहीं की जाएगी।

इन्होंने असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोगों के बयान को अनुचित बताया। कहा कि हम लोग नाजीवादी नहीं, शांति वार्ता के पक्ष में हैं। अगर हम ऐसे होते तो हमें कभी नहीं चुना जाता। उन्होंने नाजी शब्द के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई। जाहिर है कि असदुद्दीन ओवैसी ने विदेशी सांसदों के सामने अपने मसखरेपन का ही परिचय दिया है।

ओबैसी ने इन सांसदों को नाज़ी लवर्स बताया था। जबकि ओबैसी खुद सदैव नफरत की ही बात करते है। ये यूरोपीय सांसद नियंत्रण रेखा पर भी गए थे। जमीनी स्थिति देखी। आमजन से मुलाकात की। राज्यपाल के अलावा प्रशासनिक अधिकारियों, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों व निर्वाचित ब्लाक विकास परिषद के सदस्य व सरपंचों से मिले थे। यहां शांति थी। इसका प्रमाण यह भी था कि इन्होंने खुशनुमा माहौल में डल झील की सैर की। जाहिर है कि यूरोपीय यूनियन के सांसदों की यात्रा से भारत के पक्ष को ही मजबूती मिली है।

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