इस ठूंठ से दरख़्त को गौर से देखेंगे तो जीवन और मृत्यु दोनों के चिन्ह नजर आएंगे। अपना वजूद बचाने की जद्दोजहद में दरख़्त फिलहाल कामयाब होता दिख रहा है, पर कब तक!
नीम का यह दरख़्त कभी भरा-पूरा था। बहार इस पर पूरी रवानी में होती थी। मौसम आते ही इसमें फूल लगते और फलन भी खूब होता। इसकी छाया में जीव विश्राम भी करते। लेकिन, एक समय ऐसा आया कि आंधी ने इसके पूरे वजूद को ही खत्म करने की कोशिश की। पेड़ की डालें और मजबूत तना हवा के वेग के आगे टिक न सके और धराशाई हो गए।

तना लगभग खत्म हो गया। बस एक तरफ का थोड़ा-सा हिस्सा ही बचा। एक पल्ले की आकार का। लगा कि यह अब खत्म हो जाएगा। लेकिन प्रकृति खुद को रचती भी है। डैमेज कंट्रोल कोई प्रकृति से सीखे। वक्त ने मेहरबानी की और इसके उपरी सिरे पर नए कल्ले फूटने शुरू हो गए। धीरे-धीरे ठूंठ के शीर्ष पर एक बुके जैसा उभर आया, छोटी-छोटी टहनियों के रूप में।
अब यह काफी समय से ऐसे ही है। खुद का वजूद बचाए हुए। दरख़्त की यह जिजीविषा इंसान के लिए सीखने की चीज है। सब कुछ खत्म होने पर भी सब खत्म नहीं होता। संभावनाएं हमेशा बची रहती हैं। गर्दिश में रहिए तो ऐसे रहिए कि जबीं पर हार के निशान नहीं दिखें। और अंतिम समय तक उम्मीद न खोइए। जिंदगी आपके इस्तकबाल को हमेशा तैयार रहती है।
अब यह दरख़्त हर आने-जाने वाले के लिए हैरत की चीज हो गया है। जो भी पास से गुजरता है, ठिठक कर एक बार देखता जरूर है। इसके सर पे धूप का साया तो है पर खुद ये अपनी छाया से महरूम है। ये दरख़्त किसी को छाया तो खैर नहीं से सकता, पर उम्मीद तो दे सकता है। यही बहुत है। किसी ने कहा है…
किसी दरख़्त से सीखो सलीका जीने का,
धूप छांव से रिश्ता बनाए रहता है।
- विनायक राजहंस







