एलिस इन वंडरलैंड

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चार्ल्स एल. डॉजसन ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर थे। गणित पर उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। उन्हें बच्चों को काल्पनिक कहानियां सुनाने का बहुत शौक था। एक बार उन्होंने कुछ बच्चों को एक कथा सुनाई, जिसमें एक बच्ची नींद में जादुई संसार में पहुंच जाती है। यह कथा बच्चों को बहुत पसंद आई। उन्होंने रेवरेंड चार्ल्स एल. डॉजसन से उस कहानी को लिखने के लिए कहा। काफी समय बीत गया। एक दिन उनका एक मित्र घर आया। वह चार्ल्स की अलमारी में पुस्तकें देखने लगा।

वहीं उसके हाथ एक धूल जमी पाण्डुलिपि लगी। पांडुलिपि का शीर्षक ‘एलिस इन वंडरलैंड’ था। शीर्षक देखकर उन्होंने उसे पढ़ना शुरू किया तो अंत तक पढ़कर ही दम लिया। इसके बाद वह उसे पब्लिश करने के लिए ले गए। ‘एलिस इन वंडरलैंड’ के लेखक लुइस कैरोल थे। कुछ ही समय में इस पुस्तक ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। लोग इस किताब के लेखक लुइस कैरोल से मिलने के लिए बेचैन होने लगे। आखिरकार लेखक ने स्वयं को सार्वजनिक करने की ठान ली। जब वह लोगों से रुबरु हुए तो लोग उन्हें देखकर दंग रह गए, क्योंकि वह तो प्रफेसर चार्ल्स एल. डॉजसन थे।

उन्होंने कहा कि जब उनके मित्र ने इस पुस्तक को प्रकाशित कराने की जिद की तो उन्होंने उसे छद्म नाम से प्रकाशित कराने के लिए कहा। उन्हें लग रहा था कि लोग उनके द्वारा बच्चों की लिखी हुई पुस्तक देखकर उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे और सोचेंगे कि वह बच्चों की कहानियां लिखता है। हैरानी तो उन्हें तब हुई, जब लोग उन्हें ‘एलिस इन वंडरलैंड’ के लेखक लुइस कैरोल के नाम से ही जानने लगे। इसके बाद उन्होंने अपने छद्म नाम को ही अपना लिया। आज भी असंख्य लोग लुइस कैरोल से तो परिचित हैं जबकि चार्ल्स एल.डॉजसन को कम ही जानते हैं।

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