
देवेश पाण्डेय ‘देश’
धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में 33 कोटि देवताओं का वास माना जाता है। महादेव की नगरी काशी को मन्दिरों का नगर भी कहा जाता है। मन्दिरों के इस नगर में कई ऐसे चमत्कारिक मन्दिर विराजमान हैं जिनका धार्मिक महत्व जानने के बाद जनमानस की आस्था उनके प्रति स्वत: बढ़ जाती है। ऐसा ही एक मन्दिर दशाश्वामंध घाट के समीप और प्रयागेश्वर महादेव मन्दिर के बगल में बन्दी देवी मन्दिर है। यह मन्दिर पाताल देवी के नाम से भी विश्व प्रसिद्ध है। यह मन्दिर अपनी अनोखी परम्परा के लिए जाना जाता है। इस मन्दिर में प्रसाद अथवा फूल-माला नहीं बल्कि माँ को ताला-चाबी चढ़ाया जाता है अर्थात भक्त अपनी बन्द किस्मत को खोलने के लिए मन्दिर में ताला और चाबी लाते हैं।
ऐसी मान्यता है कि अविरामपूर्वक इकतालिस दिनों तक सच्चे मन से माँ की पूजा-अर्चना करने और मन्दिर में ताला लगाने पर किसी भी व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि पाताल देवी कही जाने वाली बन्दी देवी को मुकदमों, कानूनी पेचीदगियों और मानसिक बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। इस मन्दिर में प्रतिष्ठïपित बन्दी देवी को भगवान श्रीकृष्ण और बलम की कुलदेवी माना जाता है। कुछ धार्मिक ग्रन्थों में बन्दी देवी लंकाधिपति रावण की कुल देवी भी बताया गया है।
धरती पर बन्दी देवी का प्रादुर्भाव कैसे हुआ? इसको लेकर मुख्यत: त्रेता युग एवं द्घापर युग से जुड़ी अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार त्रेता युग अर्थात रामायण काल की एक कहानी प्रचलित है कि जब राम की सेना से युद्घ करते समय रावण का सबसे प्रिय पुत्र मेघनाथ लक्ष्मण के हाथों मारा गया तो रावण अत्यन्त दुख के कारण व्यथित हो गया। उसने प्रण किया कि किसी भी प्रकार वह उसके र्पिय पुत्र मेघनाथ के हन्ता लक्ष्मण को किसी भी प्रकार से मारकर ही रहेगा। जब उसे लक्ष्मण का वध करने की कोई युक्ति नहीं सुझायी दी तो उसने पाताल लोक के अधिपति अपने भाई अहिरावा से सहायता लेने का विचार किया। इसके लिए उसने दूतों के माध्यम से पातालाधिपति अहिरावण को बुला भेजा। जब अहिरावण लंका आया तो उसने अपने भाई रावण से मेघनाथ के मारे जाने की कहानी सुनकर बड़ा दुखित हुआ और उतना ही क्रोधित भी।
अहिरावण ने पहले तो रावण समझाने का प्रयास किया कि राम भगवान विष्णु का अवतार हैं, अत: वह उनसे बैर न ले और उन्की पत्नी सीता को सम्मान के साथ प्रभु राम को सौंप दे। लेकिन जब रावण नहीं माना तो उसने काफी विचार कर एक योजना बनायी। वह राम और लक्ष्मण का अपहरण करके पाताल लोक ले जाने की योजना बनायी। जब वह अपनी योजना की चर्चा रावण के साथ कर रहा था, तभी उसकी योजना विभीषण के गुप्तचरों ने सुन ली और इसकी सूचना विभीषण तक पहुंचा दी। विभीषण ने अहिरावण की योजना की जानकारी हनुमान जी और सुग्रीव आदि तक पहुंचा दी और राम एवं लक्ष्मण की सुरक्षा अत्यन्त सुदृढ़ करने की हिदायत दी।
विभीषण अहिरावण की मायावी शक्तियों से भली प्रकार से परिचित थे, वह राम और लक्ष्मण सुरक्षा में कोई भी कमी अथवा त्रटि नहीं चाहते थे। हनुमान जी, सुग्रीव और अंगद आदि ने राम और लक्ष्मण की कुटिया के चारों ओर अभेद सुरक्षा घेरा बना दिया था। हनुमान जी सुरक्षा कवच को तोडऩा असंभव था। लेकिन मायावी शक्तियों को अपनी दासी बनाकर रखने वाले अहिरावण भी रावण की भांति ही अपना रूप बदलने में अत्यन्त निपुण था। इसी कारण विभीषण ने हनुमान जी को चेतावनी दी थी कि अहिरावण रूप बदल सकता है, वह इस विद्या में विशेषज्ञ है। लेकिन अहिरावण ने विभीषण का ही रूप धारण कर लिया और हनुमान जी एवं अन्य सभी को भ्रमित करके राम एवं लक्ष्मण की कुटिया में प्रवेश कर गया। उसने निद्रा में लीन राम और लक्ष्मण को नागपाश में बांधकर बन्दी बना लिया और दोनों भइयों को पाताल लोक लेे गया।
अहिरावण पाताल लोक की देवी पाताल देवी के समक्ष राम और लक्ष्मण की बलि देने की तैयारी करने लगा। पाताल देवी ही वास्तव में बन्दी देवी हैं। कहते हैं कि अहिरावण ने बन्दी माता को राम और लक्ष्मण की बलि देने से पहले उनसे कहा कि वे दोनों बलि पर चढऩे से पहले जिसको भी स्मरण करना चाहते हों, उसे स्मरण कर लें क्योंकि अब उन्हें कोई भी पाताल लोक से मुक्त नहीं करा पायेगा। इसके बाद प्रभु श्रीराम ने पाताल की देवी माँ बन्दी देवी का आह्वïान करते हुए उनसे प्रार्थना की कि उनके समक्ष किसी मनुष्य की नहीं बल्कि देवताओं की बलि दी जाने वाली है। इससे सम्पूर्ण विश्व में गलत संदेश जायेगा और देवताओं के ऊपर से मनुष्यों का विश्वास समाप्त हो जायेगा। उधर सुबह के समय राम और लक्ष्मण के कुटिया में न मिलने पर विभीषण समझ गये कि राम और लक्ष्मण के अपहरण का काम निसंदेह अहिरावण का ही है। जब विभीषण ने हनुमान जी को सारी स्थिति हनुमान जी को बतायी तो उन्होंने तत्काल ही पाताल लोक जाकर अपने प्रभु राम और लक्ष्मण को अहिरावण की कैद से छुड़ाने का निश्चिय किया।
हनुमान जी जब पाताल लोक पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाताल लोक की सुरक्षा में उन्हीं के जैसा एक वानर सुरक्षा में नियुक्त है। उस वानर का नाम मकरध्वज था। मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि वह उन्हीं का पुत्र मकरध्वज है। जब हनुमान जी ने उससे प्रश्न किया कि वह तो बाल ब्रहïमचारी हैं तो उनका पुत्र कैसे उत्पन्न हो सकता है? इस पर मकरध्वज ने उन्हें बताया कि जब वह लंका दहन करने के बाद समुद्र के किनारे बैठकर अपनी थकान मिटाने से पहले समुद्र के पानी से अपना मँुह धो रहे थे, तभी उनके पसीने की एक बूंद वहां उपस्थित एक मादा मगरमच्छ के मँुह में चली गयी थी जिससे उसे गर्भ ठहर गया था। उसी मादा मगरमच्छ ने मकरध्वज को जन्म दिया था। यह बताने के बाद मकरध्वज ने अपने पिता हनुमान जी को विधिवत प्रणाम किया और बताया अहिरावण ने ही उसका पालन-पोषण किया है। मकरध्वज ने हनुमान जी को यह भी बताया कि वह कैसे अहिरावण का वध कर पायेंगे। उसने हनुमान जी से यह भी कहा कि पाताल लोक में प्रवेश करने से उन्हें उसे युद्घ में हराना होगा। इसके बाद पिता-पुत्र दोनों का भयंकर युद्घ हुआ और हनुमान जी ने मकरध्वज को हराकर पाताल लोक में प्रवेश किया। मकरध्वज के अनुसार अहिरावण का वध तभी संभव था जब पांच दिशाओं में रखे दिये वह एकसाथ बुझा दिये जायें। इसके बाद हनुमान जी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया। पंचमुखी हनुमान में ये पांच रूप थे हनुमान, नरसिंह, गरुड़, वाराह एवं हयग्रीव के। पंचमुखी हनुमान का रूप धारण करके हनुमान जी ने वहां जल रहे पांचों दिये एकसाथ बुझा दिये। इसके बाद उन्होंने अहिरावण का वध कर दिया। इसके बाद हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त करवाया और सुरक्षित वापस ले आये। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शंकर विश्व के कल्याण के लिए पाताल लोक की अधिष्ठïात्री बन्दी देवी से पृथ्वी पर आकर निवास करने आवाह्नïन किया और इसके बाद ही वह कलयुग में पृथ्वी पर काशी में आकर निवास करने लगीं।
पाताल की अघिष्ठïत्री बन्दी देवी के पृथ्वी पर प्रादुर्भाव की एक अन्य कथा भी प्रचलित है। भगवान श्रीकृष्ण की कर्मस्थली मथुरा से थोड़ा आगे बढऩे पर बलदेवजी नामक एक तीर्थस्थल आता है। बलदेवजी से लगभग चार किलोमीटर आगे बलदेव-राया मार्ग पर जादौन राजपूतों का एक बहुत बड़ा एवं प्रसिद्ध बन्दी नाम का गाँव है। इस गाँव में बन्दी, आनन्दी और मनोवान्छा देवी का विशाल एवं भव्य मन्दिर है। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की कुलदेवी हैं बन्दी, आनन्दी और मनोवान्छा। वासुदेव एवं देवकी को को बन्धनों से मुक्त कराने और बाबा नन्द के घर आनन्द बरसाना में यही देवी पूजी जाती थीं। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था तो कंस के कारागार में कैद देवकी एवं वसुदेव को जंजीरों के बन्धनों से मुक्त करवाया था। वासुदेव की इन्हीं में प्रारम्भ से ही आस्था जुड़ी हुई थी। यही नहीं इन्ही बन्दी आनन्दी देवी ने ही कारागार से लेकर नन्द के घर तक का मार्ग भी प्रशस्त किया था, परिणामस्वरूप वासुदेव जी मार्ग की सारी दुष्कर बाधाओं को पार करके गोकुल तक पहुंच पाये थे।
बल्देव-राया मार्ग पर बलदेव से तीन किलोमीटर गाँव बन्दी में प्रत्येक वर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। मेले मेें भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और यदुवंशियों की कुल देवी बन्दी, आनन्दी और मनोवान्छा देवी की अराधना के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। इसी समय यहां बच्चों के मुण्डन संस्कार भी किये जाते हैं। बन्दी-आनन्दी देवी मन्दिर के समीप ही एक कुण्ड भी है, इस कुण्ड में स्नान करने के बाद ही देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। कुण्ड में स्नान करने से श्रद्घालुओं की मनोकामनाएं पूण्र होती हैं। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण एवं बलराम जी को लेकर नन्द बाबा एवं यशोदा तथाबलराम की माँ रोहिणी दोनों मुण्डन संसकार करवाने के लिए यहां लेकर आये थे। भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारा यहां सर्वप्रथम मन्दिर की स्थापना की गयी थी। ये तीनों देवी करील के कुंजों में विराजमान थीं। तत्पश्चसत गाँव में मन्दिर का जीर्णोद्वार सन्ï 1300 के आस-पास देवी के भक्त आगरा के सेठ घासीराम ने करवाया ािा। बन्दी देवी के चमत्कार का वर्णन भगवत के दसवें स्कन्ध के तीसरे और चौथे अध्याय में मिलता है। इसके अनुसार कंस के कारगार में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय योगमाया के चमत्कार से कारागार के सारे पहरेदार सो गये थे। वासुदेव कृष्ण को नन्द बाबा के घर छोड़ आये और वहां से वह कन्या भी ले आये। जन्म की सूचना पाकर जब कंस कारागार में आया तो योगमाया कंस के हाथ से छूटकर लुप्त हो गयीं। वासुदेव एवं देवकी को कंस के बन्धनों से मुक्त कराने वाली मैय्या और नन्द के घर आनन्द बरसाने वाली आगे चलकर बन्दी आनन्दी नाम से विख्यात हुईं।
तीसरी मनोवांछा देवी हैं। इनसे मैय्या यशोदा ने कंस और अन्य राक्षसों से कृष्ण-बलराम की रक्षा की कामना की थी। देवी ने यशोदा मँय्या की मनोकामना पूण्र की थी। यही देवी आगे चलकर मनोवांछा कहलायीं। आज भी मान्यता है कि मनोवांछा देवी भेगापन, टेढ़ापन, तुतलाना, हकलाना आदि दोषों को दूर करती हैं। इसके बदले में लोग देवी पर चांदी की जीभ और आंख अर्पित करते हैं। विशेष रूप से यह पूजा बच्चों के लिए ही की जाती है। वहीं बन्दी के यदुवंशी जादौन समाज में आज भी नववधू सबसे पहले देवी के दर्शन करती है। मन्दिर के समीप ही आनन्द कुण्ड मूर्तियों का प्राकट्य स्थल है। गर्ग संहिता के अनुसार माँ बन्दी ने राधा जी का श्रृंगार महारास में किया था। बन्दी देवी ने माथे का तिलक, आननदी ने कण्र आभूषण भेंट किये थे। बन्दी देवी भगवान श्री कृष्ण के समय से भी पहले की हैं। शिशु रूप में भगवान श्रीकृष्ण को केश मण्डन के बाद प्रथम केशोत्सर्जन करके यहां लाया गया था। यह प्रकरण बन्दी देवी की प्राचीनता और मथुरा के भगवान श्रीकृष्ण के सम्बन्ध को सिद्घ करती है। यहां बच्चों के मुण्डन संस्कार करानास अत्यन्त शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इन देवियों की स्थापना श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ब्रजनाभ ने की थी।
मंगलवार और शुक्रवार को माता की विशेष पूजा की जाती है। नवरात्र में माता का महत्व और महिमा अत्यधिक बढ़ जाती है। यूं तो माता को माल-पुआ व गुड़हल का भोग लगाया जाता है, परन्तु मुख्य रूप से बन्दी देवी माता मन्दिर में ताला और चाबी चढ़ाने की परम्परा है। कहते हैं कि भक्तगण अपनी मनोकामना मानकर माता के दरबार में ताला और चाबी चढ़ाते हैं, जिसके बाद भक्त ताला बन्द कर चाबी रख लेते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जिस किसी भी व्यक्ति की मनोकामना पूरी हो जाती है, वह मन्दिर में आकर के माता की पूजा-अर्चना करता है और उसके बाद ताले को खोलकर चाबी और ताला दोनों मां गंगा में प्रवाहित कर देता है। मन्दिर के पुजारी ने बताया कि मां के दरबार में देश-विदेश के भक्तों के साथ नामी नेता, माफिया और अधिकारी भी आते हैं और माता के दरबार में ताला-चाबी चढ़ाकर उनसे प्रार्थना करते हैं।
उन्होंने बताया कि कई सारे फिल्मी सितारे भी यहां आए हैं और उन्होंने कोर्ट कचहरी जैसे चक्करों से मुक्ति पाने के लिए यहां जप अनुष्ठान भी कराया है। इसके बाद उनकी सभी समस्याएं समाप्त हो गई हैं। मान्यता: कहा जाता है कि 41 दिनों तक सच्चे मन से पूजा और ताला चढ़ाने से कोर्ट-कचहरी के मुकदमों और परेशानियों से मुक्ति मिलती है। यहाँ दर्शन करने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं, विशेषकर वे जो कानूनी उलझनों में फंसे हैं। यह विश्व में देवी का इकलौता मन्दिर माना जाता है। पुजारी सुधाकर दुबे बताते हैं कि इसलिए माता को बंधनों से मुक्त करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। उन्होंने बताया कि जब काशी की स्थापना भगवान शंकर कर रहे थे, तब अलग-अलग देवी-देवताओं को यहां पर बसने का आमंत्रण दिया जा रहा था। तभी माता को आग्रह करके यहां पर स्थापित किया। तब से माता का यह प्राचीन मन्दिर यहां पर स्थापित है और लोगों को बंधनों से मुक्त होने का आशीर्वाद दे रहा है।
बन्दी देवी मन्दिर की प्राचीन स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरण है। इस मन्दिर की वास्तु कला वाराणसी के अन्य मन्दिरों की ही भांति नागर शैली को दर्शाती है। यह मन्दिर की स्थापना वास्तव में तीन हजार वर्षों से भी प्राचीन है। ज्ञान, संस्कृति और अध्यात्मिकता का केन्द्र माने जाने वाला मन्दिर समय के साथ-साथ कई बार उजड़ा और इसी प्रकार कई बार बना भी। कहा जाता है कि मुगल आक्रान्ताओं ने मन्दिर के भवन को तो कई बार क्षति पहुंचायी, लेकिन मुगल आक्रान्ताओं ने जब भी बन्दी देवी की प्रतिमा हानि पहुंचखने का प्रयास किया तो हर बार कुछ न कुछ ऐसा हुआ कि मुगल आक्रान्ता और उनके सैनिक भयभीत होकर भाग गये और माँ की प्रतिमा को दोबारा तोडऩे का साहस तक नहीं जुटा पाये।
ऐसा कहा जाता जिस भी मुगल सैनिक ने बन्दी देवी की प्रतिमा को तोडऩे का प्रयास किया वह या तो मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया या फिर मृत्यु को प्राप्त हुआ। काशी के बन्दी देवी मन्दिर में मुख्य रूप से बन्दी देवी का विग्रह तो स्थापित है ही इनके अतिरिक्त प्रयागेश्वर महादेव का लिंग भी स्थापित है। चार भुजाओं वाली बन्दी देवी मन्दिर के मध्य में ही प्रयागेश्वर महादेव का लिं ग स्थापित है। बन्दी देवी के दाहिनी ओर देवी वेणीमाधव की प्रतिमा विराजमान है जबकि बायीं ओर मारुति नन्दन हनुमान जी शोभ बढ़ा रहे हैं। बायीं ओर ही वासुकी सांप की प्रतिमा भी स्थापित है।






