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बसंत के आते ही हमारे मेहमान पक्षियों के देश से कूच करने का समय है। यह पंक्षी नवम्बर के महीने में हमारे देश के अनेक शहर की झीलों, नदियों, पक्षी अभयारण्य और चिड़ियाघरों में प्रवासी पक्षीयां अपना बसेरा बना लेती हैं और बसंत ऋतु यानिकि फरवरी से मार्च के महीने के मध्य यह हमारे देश से वापस अपने देश को रवाना हो जाते हैं।
दरअसल आप और हम इन पक्षियों के प्रवास यानीकि माइग्रेशन के विषय में जितना अधिक जानेगे और समझेंगे उतना ही हम आश्चर्य में पड़ते चले जाएंगे। जैसा कि हम लोगों को पता ही होगा कि यह “माइग्रेशन” शब्द लैटिन भाषा का शब्द ‘माइग्रेटस’ से लिया गया है, इसका मतलब बदलाव होता है। पक्षियों के द्वारा किसी विशेष मौसम में भौगोलिक परिवर्तन को हम माइग्रेशन कहते है। हिंदी भाषा में इसे प्रवास कहा जाता और प्रवास का मतलब यात्रा पर जाना या एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से है। लेकिन इन पक्षियों का प्रवास केवल अपने देश तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि सुदूर देशों तक होता है, जहां पर इन पक्षियों को अपने रहने के लिये अनुकूल मौसम और भोजन मिल जाए वे वहीं पर अपना निवास बना लेते हैं। कई पक्षी तो ऐसे भी होते हैं, जो कई महीनों का सफर पूरा कर के दूसरे देश तक पहुंचते हैं।

ऐसा ही नहीं है कि दूसरे देश के पक्षियां ही भारत आते हैं, बल्कि भारत के पक्षी भी दूसरे देश में प्रवास पर जाते हैं। भारत के पक्षीयां लगभग दस हजार किलोमीटर तक का सफर तय करने के बाद रूस के निकट साइबेरिया पहुंचते हैं और इसी जगह से पक्षियां भारत में चले आते हैं। जो पक्षी भारत में आकर सर्दियां गुजारते हैं, वे उत्तरी एशिया, रूस, कजाकिस्तान तथा पूर्वी साइबेरिया के होते हैं। यह पक्षियां 2,000 से 5,000 किलोमीटर तक की दूरी आसानी से उड़कर पार कर लेते हैं, जबकि इस सफर को तय करने में इन्हें बहुत अधिक समय लगता है।

फिर भी यह बहुत आश्चर्यजनक बात है कि समुद्री और दुर्गम रेगिस्तानी प्रदेशों को पार करते हुये यह पाक्षियां यह पर उतरते हैं, जबकि इन दुर्गम स्थानों के ऊपर से वायुयान के माध्यम से पार करने में हम मनुष्य लोग भी हिचकिचाते हैं, फिर भी यह पक्षी आकार में बहुत बड़े भी नहीं होते। इन पक्षियों में गेहवाला जैसी छोटी-छोटी चिड़िया और अन्य छोटे-छोटे परिंदे भी सम्मिलित हैं। हमारे देश का सुप्रसिद्ध पक्षी राजहंस जो भारत में सर्दियां गुजारने के बाद तिब्बत में प्रवेश कर वहां पर स्थित मानसरोवर झील के किनारे अंडे देता है। इन पक्षियों का इस तरह के विचित्र स्वभाव को देखकर पक्षी विज्ञानिक लोग भी आश्चर्यचकित होते हैं।
पक्षियों में एक हैरत में डालने वाली एक बात और भी होती है कि जब यह पक्षियां प्रवास के लिए निकलते हैं तो अकेले न होकर बल्कि हजारों की संख्या में एक झुंड बनाकर आकाश में उड़ते हैं।
हमारे यहां चाहे ग्रीष्म ऋतु हो या शीत ऋतु भारत प्रवासी पक्षियों के लिये सर्वोत्तम स्थान है। किंगफिशर, रोजी, पेलिकन, वुड सैंडपाइपर, स्टार्लिग ब्लूथ्रोट आदि कुछ ऐसी ही प्रवासी पक्षीयां हैं, जो अपने लिये अनुकूल वातावरण ढूंढने के लिये अपना स्थान बदलते हैं। यदि वे एक बार माइग्रेशन प्रारम्भ कर देते हैं तो केवल अत्यंत खराब मौसम ही उन्हें रोक सकता है। साइबेरियन क्रेन, ग्रेट फ्लेमिंगो, रफ जैसे बहुत सी पक्षीयां माइग्रेसन के दौरान आकाश में बहुत ऊंची उड़ान भर सकते हैं। ये तभी प्रवास पर जाते हैं, जब इन्हें लगता है कि इनके शरीर मे इतना चर्वी इकट्ठा है, जो इनकी यात्रा के दौरान उनका साथ देगा।
शीत ऋतु में इन प्रवासी पक्षियों के देश मे बर्फ की मोटी पर्तें जम जाती है और हांड कंपकंपाने वाली ठंड के कारण इन पक्षियों का आहार बनने वाले जीव-जंतु या तो मर जाते हैं या जमीन के नीचे दुबक कर शीत-निद्रा में चले जाते हैं ऐसी अवस्था मे ऐसे जीव सर्दियों के समाप्त होने के बाद ही पुनः जागते हैं। ऐसी स्थिति में इन पक्षियों के लिए अपना आहार ढूंढना और उनके जिंदा रहना कठिन हो जाने के कारण वे भारत जैसे गर्म देशों में चले आते हैं, यहां उस वक्त बर्फ नहीं जमी रहती है और उन्हें उनका आहार भी ठीक ढंग से उपलब्ध हो जाता है।
– प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती