जी के चक्रवर्ती
हम सभी ने जिया है अपने बचपन की यादें, शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसे अपना बचपन याद न आता हो। बचपन की अपनी मधुर यादों में माता-पिता, भाई-बहन, यार-दोस्त, स्कूल वे दिन, जब किसी के आम के पेड़ पर चढ़कर ‘चोरी से’ खूब आम खाना किसी के खेत से गन्ना उखाड़कर चूसना और बाकी के बचे गन्ने के टुकड़े से एक दूसरे को मारना, इस तरह के उधम मचते दौड़ते भागते घर पहुंचने पर मम्मी के डांट-फटकार सुंनना फिर मम्मी ने एक थैला पकड़ा कर कहना जा इसे गावं के भड़भूजे भुजन से भुजवा ला! मै खुशी-खुशी उछलते कूदते झूमते-झामते झोले को कंधे पर रख कर चल पड़े भुजवे के दुकान की ओर एक बार फिर से मौका मिला बाहर जाने यह बहुत बड़ी बात थी।
और धीरे-धीरे आखिरकार पहुंच ही गये भुजन के दुकान पर -अरे क्या लाये हो बचुआ, बाबा अम्मा ने कुछ जुंधरी दिया है, कंधे पर से झोला उतार कर भुजन को दिया और उसने कहा – ”अच्छा यहां रख दो अभी भुजे देता हूँ।
मैं उसके दुकान के सामने ही पहले से खेल रहे कुछ बच्चे की ओर मै जाने लगा तो भुजन ने कहा अरे बचुआ पैसे लाये हो तो हमें देते जाओ कहीं खेलने में तुमसे गिर न जाये मैंने झट से पैसे भुजन के हाथ मे रख दिये और उन खेलते बच्चों में शामिल हो कर खेलने लगा, अचानक भुजिया ने जोर से चिल्लाया अरे बचुआ भुजा भून गया आओ लेइ जाओ।
यह सुनते ही मैं दौड़ा और झोला हाथ मे लटकाये घर की ओर चल पड़ा पहले से खेल रहे बच्चों में से एक बच्चा हमारे पड़ोस के घर मे रहता था वह भी भुजा भुनाने आया था। मुझे झोला उठाये घर की तरफ जाता देख वह भी झट अपना थैला उठा कर मेरे पीछे-पीछे चलने लगा। मैं अपने झोले में से भुजा निकाल कर खाता जाता और आगे बढ़ता जाता। मुझे भुजा खाता देख कर वह मेरे बगल में आ कर कहा अरे मुझे भि जरा अपना भुजा ख़िलाओं ”मैने कहा ”अरे तुम भी तो अपना भुजा मुझे ख़िलाओं !
उसने झट से अपने थैले में से एक मुठ्ठी भुजा निकाल कर मुझे दिया और फिर एक मुठ्ठी भुजा मैने भी उसे दिया। इस तरह दोनो दोस्त बातें करते जाते और सपने थैले में से भुजा निकाल -निकाल कर खाते जाते देखते देखते घर आ गया।
घर की चार दिवारी में प्रवेश करते करते अचानक झोले पर ध्यान गया ! सोचा एक मुठ्ठी अंतिम बार और निकल लूं अब भुजा खाने को नही मिलेगा यह सोच कर अंतिम मुठ्ठा निकलने के लिये जैसे ही झोले में हाथ डाला दिल एकदम से दिल धक सा रह गया ? क्योंकि भुजा लगभग खत्म हो चुका था थोड़े बहुत दाने थैले के तलहटी में पड़े थे अब घर के अंदर प्रवेश करने की इच्छा खत्म हो चुकी थी लेकिन घर तो जाना ही था और डांट भी खाना था बहुत बड़ी बात नही मारे भी जायें और ऐसा ही हुआ उस दिन कसम से खूब पिटा।
अब यहाँ जरुरी है बताना कि जिस किसी ने भी अपने बचपन में शरारत या नटखट नहीं की, उसने अपना बचपन को क्या खाक जिया, क्योंकि ‘बचपन का दूसरा नाम’ नटखट होता है। शोर व उधम मचाते, चिल्लाते बच्चे सबको लुभाते हैं। दुनिया मे ऐसा कौन होगा जिसे बच्चे और फूल अच्छे नही लगते हों।
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