जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से जले नोटों की बारामदगी के मामले में आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट में चौंकाने वाले हुए खुलासे
नई दिल्ली, 20 जून 2025: दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज और वर्तमान में इलाहाबाद हाई कोर्ट में कार्यरत जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से जले हुए नोटों की बरामदगी के मामले ने भारतीय न्यायपालिका में हलचल मचा दी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी 64 पन्नों की रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ गंभीर आरोपों की पुष्टि करते हुए उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की है।
क्या था मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 14 मार्च 2025 की रात को दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास (30, तुगलक क्रेसेंट) में आग लगने की घटना हुई थी। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली से बाहर थे। आग बुझाने पहुंची दिल्ली अग्निशमन सेवा की टीम को स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में जले और अधजले नोटों की गड्डियां मिलीं। इस घटना ने तुरंत सुर्खियां बटोरीं और न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठने लगे।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 22 मार्च 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी.एस. संधावालिया, और कर्नाटक हाई कोर्ट की जज जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।
जांच समिति के प्रमुख निष्कर्ष
जांच समिति ने 10 दिनों तक गहन जांच की, जिसमें 55 गवाहों से पूछताछ, डिजिटल और फोरेंसिक साक्ष्यों की समीक्षा, और घटनास्थल का दौरा शामिल था। समिति की 4 मई 2025 को सौंपी गई रिपोर्ट में निम्नलिखित प्रमुख निष्कर्ष सामने आए:
स्टोर रूम पर जस्टिस वर्मा का नियंत्रण: समिति ने पाया कि जिस स्टोर रूम में जले हुए नोट बरामद हुए, उस पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का “गुप्त या सक्रिय नियंत्रण” था। इस कमरे में बाहरी लोगों की पहुंच संभव नहीं थी, और केवल जस्टिस वर्मा, उनके परिवार, और विश्वसनीय कर्मचारी ही वहां जा सकते थे।
नकदी की बरामदगी: स्टोर रूम में 500 रुपये के नोटों की कई गड्डियां मिलीं, जिनमें से कुछ आंशिक रूप से जली हुई थीं। दिल्ली पुलिस और अग्निशमन विभाग के गवाहों ने इसकी पुष्टि की। एक गवाह ने कहा, “मैंने अपने जीवन में पहली बार इतनी बड़ी मात्रा में नकदी देखी।”
साक्ष्य नष्ट करने का संदेह: जांच में सामने आया कि 15 मार्च 2025 की सुबह जस्टिस वर्मा के निजी सचिव राजिंदर सिंह कार्की और कर्मचारियों राहिल और हनुमान ने स्टोर रूम से जले हुए नोटों को हटाने में भूमिका निभाई। यह कार्य अग्निशमन और पुलिस कर्मियों के जाने के बाद किया गया।
जस्टिस वर्मा की साजिश की थ्योरी खारिज: जस्टिस वर्मा ने दावा किया कि यह उनकी छवि खराब करने की साजिश थी और नकदी उनकी या उनके परिवार की नहीं थी। उन्होंने कहा कि स्टोर रूम में अप्रयुक्त फर्नीचर और कबाड़ रखा जाता था, और यह बाहरी लोगों के लिए सुलभ था। हालांकि, समिति ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि नकदी की मौजूदगी और उसका रिकॉर्ड वास्तविक समय में दर्ज किया गया था, जिसे साजिश करार देना अविश्वसनीय है।
जस्टिस वर्मा का असामान्य व्यवहार: समिति ने जस्टिस वर्मा के आचरण पर भी सवाल उठाए। उन्होंने न तो पुलिस में शिकायत दर्ज की और न ही दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या भारत के CJI को इस घटना की सूचना दी। इसके अलावा, 20 मार्च को उन्होंने बिना किसी आपत्ति के इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरण को तुरंत स्वीकार कर लिया, जो उनके एक दशक से अधिक के बेदाग रिकॉर्ड के विपरीत था।
समिति की सिफारिश में महाभियोग
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जस्टिस वर्मा का कदाचार इतना गंभीर है कि उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। यह सिफारिश भारत के संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत की गई है, जिसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित करना आवश्यक है।
रिपोर्ट के आधार पर, पूर्व CJI संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की है।
जस्टिस वर्मा का पक्ष
जस्टिस वर्मा ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सौंपे अपने जवाब में कहा कि नकदी से उनका या उनके परिवार का कोई संबंध नहीं है। उन्होंने दावा किया कि स्टोर रूम एक खुली जगह थी, जहां कोई भी आ-जा सकता था, और यह उनकी छवि को बदनाम करने की साजिश है। उन्होंने इस्तीफा देने से भी इनकार कर दिया है।
आगे की कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 22 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा को उनके मूल कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट, में स्थानांतरित कर दिया था, और उन्हें कोई न्यायिक या प्रशासनिक कार्य सौंपने से मना किया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके स्थानांतरण के खिलाफ हड़ताल की थी और इसे “डंपिंग ग्राउंड” के रूप में इस्तेमाल करने की निंदा की थी।
अब यह मामला संसद के समक्ष प्रस्तुत होने की संभावना है। यदि जस्टिस वर्मा इस्तीफा नहीं देते, तो मानसून सत्र में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है।
न्यायपालिका के लिए एक गंभीर चुनौती
यह मामला भारतीय न्यायपालिका के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अभूतपूर्व पारदर्शिता दिखाते हुए जांच रिपोर्ट, तस्वीरें, और वीडियो को अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक किया है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस मुद्दे पर कहा कि विधायिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि सामंजस्य के साथ काम करना चाहिए।
बता दें कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर उठे सवालों के बीच, यह मामला न केवल जस्टिस वर्मा के भविष्य, बल्कि भारतीय न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गहरा प्रभाव डाल सकता है।







