भाजपा के उपेक्षितों से भी साथ आने की अपेक्षा
स्वामी प्रसाद मौर्य, रीता जोशी, शत्रुघ्न सिन्हा और बाबा रामदेव पर भी हैं निगाहें
भाजपा मार्गदर्शन मंडल के आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी खामोशी से कर सकते हैं कांग्रेस का मार्गदर्शन
नवेद शिकोह
लखनऊ, 23 फरवरी। विभिन्न दलों और विचारधाराओं के उपेक्षितों के खैरख्वाहों को कबाड़ शब्द पर एतराज ना हो इसलिए बता दूं कि कांग्रेस इन्हें बेशकीमती कबाड़ यानी दुर्लभ बेशकीमती आर्काइव के नजरिए से देख रही है। मेरा नजरिया भी यही है कि सपा के उपेक्षित शिवपाल और बसपा से निकाले गये नसीमुद्दीन जैसे तमाम नेता सीप के उन मोतियों की तरह हैं जो सीप से बाहर निकलकर सीप को खोखला बना सकते हैं। किसी ऐतिहासिक राजमहल के कबाड़ के एक टुकड़े की आर्काइव वैल्यू राजमहल पर भारी पड़ जाती है और वो टुकड़ा राजमहल से बाहर निकलकर राजमहल को खंडहर में तब्दील कर देता है।
भाजपा का बढ़ता जनाधार और नरेंद्र मोदी की करिश्माई शख्सियत के सामने कांग्रेस के पास उम्मीद की दो रोशनियां ही हैं। एंटी इनकम्बैंसी और महागठबंधन। यूपी में सपा और बसपा के साथ महागठबंधन का सामंजस्य बनना बहुत ही मुश्किल है। अखिलेश यादव और मायावती के जनाधार की जली रस्सी के बल नहीं गये। ये बल पहले तो आपसी सहमति नहीं बना सकते है दूसरी बात ये कि अगर इब्तिदा में कामयाबी मिल भी जाती है तो इंतिहा का अंजाम इंतिहा से ज्यादा बुरा हो सकता है।(बिहार से बद्तर और गैस्ट हाउस कांड से ज्यादा डरावना) इन्हीं कारणों से कांग्रेस ने-‘ सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे’ की तर्ज पर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए आर्काइव कबाड़ बंधन तैयार करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं।
समाजवादी पार्टी में उपेक्षित शिवपाल यादव को कांग्रेस में शामिल करके सपा के संगठन और जनाधार के मोती से कांग्रेस के हाथ की उंगलियां सुशोभित हो सकती हैं।
कांग्रेस की योजना है कि वो सपा, बसपा और भाजपा के उपेक्षित, बागी और निकाले गये जनाधार वाले नेताओं को ससम्मान पार्टी में जगह देगी। जिससे कि विभिन्न जातियों और पार्टियों के नेताओं के जनाधार से कांग्रेस का कद और दायरा बढ़ जाये। इसी के साथ प्रतिद्वंद्वी दल भी कमजोर पड़ जाये। ये फार्मूला कांग्रेस से इसलिए अपनाया है क्योंकि उसके पास बहुत कुछ खोने के लिए कुछ नहीं है। और इस तोड़-फोड़ से पलटवार का भी कोई खतरा नहीं है। क्योंकि कांग्रेस के यूपी संगठन में ऐसे नेता ना के बराबर है जिन्हें कोई दल तोड़े।
आगामी लोकसभा चुनावी लड़ाइयों में एंटी भाजपा शक्तियों की एकता के आसार कम ही नजर आ रहे हैं। हां गैर भाजपाई की आपसी लड़ाई भी दिलचस्प हो सकती है। कांग्रेस ने नसीमुद्दीन को सम्मान पार्टी में शामिल करके इस बात के संकेत दे दिये हैं कि वो बसपा से गठबंधन नहीं करेगी, बल्कि बसपा के समर्थक मुस्लिम वोटरों में सेंध लगायेगी।
कांग्रेस इसी तरह का वार सपा पर भी कर सकती हैं। पार्टी से उपेक्षित शिवपाल यादव यदि कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं तो सपा संगठन का एक हिस्सा कांग्रेस की ताकत बन जायेगा और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा कमजोर पड़ जायेगी। ऐसे हालात में भाजपा विरोधी वोटर कांग्रेस की फिजा के समर्थन में आ जायेगा। उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इसी क्रम में भाजपा के उपेक्षित नेताओं से भी कांग्रेस संपर्क बनाये हुए है।
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार उत्तराखंड के बड़े जनाधार वाले नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की कांग्रेस वापसी की बातचीत चल रही है। यदि विजय बहुगुणा की घर वापसी हो जाती है तो उनकी बहन रीता बहुगुणा भी कांग्रेस में वापस आ सकती हैं। चुनावी वर्ष के अंत तक यदि एंटी इनकम्बैंसी दिखायी दी तो कांग्रेस एकमात्र विकल्प है इसलिए कांग्रेस राजनीतिक सौदेबाजी के बाजार में तोड़फोड़ के सीजन में वन प्लस वन जैसी स्कीम के मनमोहक और आकर्षक आफर तैयार कर लिये हैं।
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