लघुकथा: सेवा का फल

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शंकर को प्राप्त करने के लिए पार्वती ने घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर ने उन्हें दर्शन दिये और उनकी इच्छा पूरी करके अंतर्धान हो गये। अपनी मनोकामना के पूर्ण होने पर पार्वती के आनंद का ठिकाना न रहा। वह अपने आश्रम के बाहर एक शिला पर बैठकर विचारों में डूब गई।

तभी उन्हें किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। पार्वती शिला से उठकर उस ओर बढ़ीं, जिधर से वह आर्तनाद आ रहा था। वहां पहुंचकर देखती क्या हैं कि सरोवर में एक बच्चे को ग्राह ने पकड़ लिया है और वह बालक चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है, “मुझे बचाओ। मुझे यह ग्राह खा जायगा। मैं अपने माता-पिता की अकेली संतान हूं। मैं नहीं रहूंगा तो मेरे माता-पिता भी नहीं रहेंगे।” पार्वती का दिल यह सुनकर व्यथित हो उठा।

उन्होंने ग्राह से कहा, “इस बालक को छोड़ दो।” ग्राह बोला, “संध्या के समय जो यहां आता है, उसे में अपना भोजन बना लेता है।” पार्वती ने आग्रह भरे स्वर में कहा, “मैंने हिमालय के शिखर पर कठोर तप किया है। उसी के बल पर कहती हूं कि इसे छोड़ दो।” ग्राह बोला, “तुम उस तप को मुझे अर्पित कर दो, तो मैं इसे मुक्त कर दूंगा।” पार्वती ने पुलकित होकर कहा, “यह क्या, मैं जीवन भर के सारे तप तुम्हें अर्पित करती हूं।”ग्राह ने बालक को छोड़ दिया। बोला, “देवी, तुम्हारी दीनसेवा से मैं बहुत संतुष्ट हूं। तुम्हारी तपस्या को भी लौटाये देता हूं।

”पार्वती ने कहा, “मैंने जो कुछ किया है, सोच-समझकर किया है। मैं तप को वापस नहीं ले सकती। तप की क्या है, फिर कर लूंगी।” ग्राह यह सुनकर अंतर्धान हो गया। पार्वती फिर से तप करने की सोचने लगीं, तभी शंकर प्रकट हो गये। बोले, “तुम्हें तप करने की जरूरत नहीं है। अपना तप तुमने मुझे ही दिया था। मैं ही तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ग्राह बनकर आया था। तुम्हारा तप अब अनंत गुना अक्षय हो गया।”

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