सुमधुर कर्कट वाचिका वाचक चीख-चिल्लाहट पत्रकार गणों के ।
धनपशु पैदाइश मिथ्या भौंके चैनल्स पर पाकर धन सरकारों से ।।
ये धूर्त समूह समझे स्वयं को इससे नहीं बढकर कोई अन्य बड़ा ।
जितना महान ऊपर से दिखे होता तन मन धन से अदृश्य सड़ा ।।
सरकारी तंत्र को भ्रष्ट कराके भारत के जन जन को भटकाते हैं ।
फल अभी गिरा फल अभी गिरा तरु से एहसास नित करवाते हैं ।।
जनता वृक्षतल खड़ी एक पैर पर पत्रकारों के वो फल न पके न गिरे।
नहीं भय ईश्वर पुनर्जन्म निज संतति भविष्य भी भययुक्त करे ।।
भौंक भौंक धनपशुओं के चैनल्स पर करोड़ों अरबों के मालिक हैं हुए ।
कुत्ते कुतिया दुग्धपान हेतु ही नेताओं धनपशुओं के जंजीर बंधे ।।
सत्य को झूठ झूठ को सत्य दिखा पा धन खिले रंग चुनिया बबलू के ।
हुआ बेशर्म पत्रकार समाज भारत में मद्यपवत झाँव झाँव बेशर्मी से ।।
– स्वरचित







