दुधवा: जब उग्र हाथियों के झुण्ड से हुआ करीब से सामना

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दुधवा का यादगार संस्मरण: अनुराग प्रकाश

काफी पहले की बात है जब दुधवा में अपनी कार से भी सफारी कर सकते थे। अपनी छोटी कार मारुति 800 में मैं दुधवा में गेट नंबर 1 से अपने 2 मित्रों व दुधवा गाइड के साथ अंदर गया।

सफारी काफी अच्छी रही, झलक ही सही लेकिन बाघ के दर्शन हुए। काफी अच्छी संख्या में हिरण व बारहसिंघे नज़र आये। फिर एक जगह हमने गाड़ी किनारे पार्क कर मचान पर चढ़कर थोड़ा वक्त बिताने की सोची। गाड़ी किनारे खड़ी कर हम लोग मचान पर चढ़ गए व जानवरों का आवागमन देखने लगे।

तभी हमारे गाइड को एक तरफ से कुछ आवाज़े आई ……उसने कहा सर ….हाथी आरहे है इधर …..अब तो वो हमारी गाड़ी को भी नुकसान पहुँचा सकते है। मैंने कहा अब हम क्या करे ?
हम सब मिल कर शोर करे क्या???

उसने कहा नही । अगर हाथियों को पता चल गया कि हम ऊपर है , तो वो मचान पर भी अटैक कर सकते है …..अब चुपचाप मचान पर नीचे बैठ कर उन पर नज़र रखते है।

जंगल मे मैं हमेशा मचान पर या बंद रोड पर गाड़ी मोड़ कर व किनारे करके खड़ी करता हूँ …..ये मेरा नियम है …..ताकि दिक्कत होने पर तुरंत निकल लिया जाए, गाड़ी मोड़ने में समय बर्बाद न हो। और किनारे खड़ी करने से और गाड़ियों को भी अपनी गाड़ी खड़ी करने में आसानी होती है और गाड़ी जल्दी नज़र नही आती, बीच मे खड़ी होने की अपेक्षा।

खैर हम मचान के पटरो की झिरी से हाथियों का मूवमेंट देख रहे थे। करीब 12 से 15 हाथी थे वो हमारी गाड़ी के पास से निकलते हुए आस पास ही पेड़ो की पत्तियां खाने लगे। हम लोग सांस रोके ये सब नज़ारा देख रहे थे।

कुछ देर इंतज़ार के बाद हमारे गाइड ने मचान से थोड़ा सा नीचे उतर कर माहौल का जायजा लिया फिर ऊपर आकर हमसे बोला ……सर पहले हम और आप नीचे चलेंगे और गाड़ी में बैठ कर जब इशारा करेंगे तब ये लोग भी धीरे से आकर गाड़ी में बैठ जाएंगे और दरवाजा बिल्कुल आहिस्ता से बंद करेंगे और हम तुरंत गाड़ी स्टार्ट कर वहाँ से निकल लेंगे।

हमने ठीक वैसा ही किया डर व तनाव से पेट में दर्द सा महसूस होने लगा था किंतु हिम्मत जुटा कर हम गाड़ी तक आये। पेड़ो की टहनियां टूटने से साफ एहसास हो रहा था कि हाथी ज्यादा दूर नही है। गाड़ी में बैठ कर हमने अपने मित्रों को इशारा किया सेकण्ड्स में वो गाड़ी के अंदर आ गए और मैंने जैसे ही गाड़ी स्टार्ट की, उसकी आवाज़ से एक हाथी भी जोर से चिंघारा और हमने गाड़ी दौड़ा दी कुछ देर में ही हम सुरक्षित दूरी पर आ चुके थे और ताउम्र न भूलने वाले एहसास के साथ जंगल से बाहर जा रहे थे।

जंगल में हमेशा धैर्य से काम ले और जल्दबाज़ी बिल्कुल न करें। सावधानी ही सुरक्षा है।

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