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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    प्रकृति तो ऐसे ही वापस लेती है ?

    ShagunBy ShagunAugust 6, 2025Updated:August 6, 2025 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    वायरल वीडियो में कैद हुयी भारी तबाही
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    सुशील कुमार

    प्रकृति और इंसान का रिश्ता हमेशा से एक संतुलन पर टिका रहा है। प्रकृति ने हमें जीवन दिया, संसाधन दिए, और हमारी हर जरूरत को पूरा किया। लेकिन आधुनिक युग में यह संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। इंसान के लालच और तथाकथित विकास की अंधी दौड़ ने प्रकृति को इस कदर छलनी किया है कि अब वह अपना हिसाब बराबर करने पर उतारू है। उत्तराखंड के धराली गांव में हाल ही में बादल फटने से आई भयावह तबाही इसका जीवंत उदाहरण है। यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हमारे गैर-जिम्मेदाराना रवैये का दुखद परिणाम है।

    धराली, गंगोत्री धाम के रास्ते में बसा एक छोटा-सा गांव, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। लेकिन हाल ही में वहां की नदियों ने ऐसा कहर बरपाया कि पलक झपकते ही नदी किनारे बने मकान, होटल, होमस्टे, और बाजार मलबे के ढेर में बदल गए। भारी बारिश के साथ पहाड़ों से बहकर आए पत्थर, मलबा, और पेड़ों ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में दिखा कि कैसे माचिस की तीलियों की तरह इमारतें ढह रही थीं और लोग असहाय होकर चीख रहे थे। यह मंजर किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने वाला था। कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका ने इस त्रासदी को और भी भयावह बना दिया।

    वायरल वीडियो में कैद हुयी भारी तबाही

    इस तबाही का कारण सिर्फ भारी बारिश नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारी बरसों की छेड़छाड़ भी है। हमने पहाड़ों को काटकर सड़कें, सुरंगें, और पावर प्लांट बनाए। जंगलों को उजाड़कर कंक्रीट के जंगल खड़े किए। नदियों के किनारों को अतिक्रमण का शिकार बनाकर वहां बस्तियां और होटल बना दिए। पर्यटन के नाम पर पहाड़ों को कचरे का ढेर बना दिया गया। प्लास्टिक, बोतलें, और अन्य कचरे ने नदियों और जंगलों की सेहत को और बिगाड़ दिया। क्या हमने कभी सोचा कि इस लूट का अंजाम क्या होगा? प्रकृति के पास हर चीज का हिसाब है। वह चुपचाप सहती है, लेकिन जब उसकी सहनशक्ति जवाब देती है, तो वह धराली जैसे हादसों के रूप में अपना गुस्सा जाहिर करती है।

    प्रकृति भेदभाव नहीं करती। जो हमने उससे लिया, वही वह हमें लौटाएगी, कभी बाढ़ के रूप में, कभी भूस्खलन के रूप में, तो कभी बादल फटने की शक्ल में। उत्तराखंड जैसे हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। केदारनाथ त्रासदी से लेकर अब धराली तक, बार-बार हमें चेतावनी मिल रही है, लेकिन हम सबक लेने को तैयार नहीं। हमारी नीतियां और योजनाएं अभी भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। अनियंत्रित निर्माण, अवैध खनन, और जंगलों की कटाई अब भी बदस्तूर जारी है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर हम पहाड़ों को और कमजोर कर रहे हैं।

    यह समय आत्ममंथन का है। हमें यह समझना होगा कि विकास और प्रकृति का संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। टिकाऊ विकास ही भविष्य का रास्ता है। हमें जंगलों को बचाने, नदियों को स्वच्छ रखने, और पहाड़ों पर अनियंत्रित निर्माण को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी देनी होगी और पर्यटकों को जागरूक करना होगा कि वे प्रकृति का सम्मान करें। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखें।

    धराली की त्रासदी एक चेतावनी है। प्रकृति हमें बार-बार मौका दे रही है कि हम सुधर जाएं, लेकिन यह मौका अनंत नहीं है। अगर हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली आपदाएं और भी भयावह होंगी। प्रकृति ने हमें जीवन दिया, लेकिन हमने उसे बर्बादी दी। अब वह हमें तबाही लौटा रही है। सवाल यह है कि हम कब तक अपनी गलतियों को अनदेखा करते रहेंगे? आइए, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का रास्ता अपनाएं, वरना वह हमें और सबक सिखाएगी और तब शायद हमारे पास पछताने का मौका भी न बचे।

    Shagun

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