..इसलिए तीन साल बेमिसाल
योगी सरकार के तीन साल कितने बेमिसाल थे यहां इस बात की समीक्षा नहीं कर रहे हैं। लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में पत्रकारो़ के वेलफेयर के लिए सरकार और संवाददाता समिति के योगदान की एक मिसाल के साथ सरकार की तीसरी वर्षगांठ पर शुभकामनाएं। उ.प्र.राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के भी लगभग दो वर्ष पूरे होने वाले हैं और समिति का कार्यकाल भी एक माह बाद समाप्त हो रहा है। इसलिए संवाददाता समिति की एक विशेष उपलब्धि की भी सराहना।
ये सच है कि अस्ल पत्रकार के तेवर आलोचनात्मक ही होते हैं। किसी भी सत्ता या ताक़त की तारीफों के पुल बांधना पत्रकारिता का काम नहीं है, किंतु दाल में नमक बराबर ही सही कलम को कभी सकारात्मक नज़रिये की तरफ भी बढ़ना चाहिए।
कुछ लोगों की धारणा है कि मैं सरकारों और पत्रकार संगठनों के ख़िलाफ ज़हर उगलता हूं, हांलाकि मेरा मानना है कि सत्ता या किसी भी ताकत के आलोचनात्मक पहलुओं को मुखरित करना पत्रकारिता का दायित्व है, और दुनियां-जहान पर उंगलियां उठाने वाली पत्रकारिता के पेशे की कमियां भी उजागर हो। इसलिए अपने गिरेबां में झांकते हुए कथित बड़े पत्रकारों की कथित दलाली…. कथित छोटे पत्रकारों की खाने पर कथित लूटमार…. गंदी और स्वार्थ की राजनीति वाली पत्रकारों की संगठनबाजी पर सवाल उठाते हैं।
लेकिन आज एक पत्रकार मित्र की खैरियत जानकर भोलेनाथ वाला विष पी लेने का मन है। जो संसार भर के शहद और अमृत जैसा है।
मित्र की खैरियत की खुशी के अहसास ने अहसास दिलाया कि कि ये झूठ है कि सरकार पत्रकारों के दर्द का अहसास नहीं कर रही है। ये भी झूठ है कि उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति और उसके पदाधिकारियों ने कुछ भी बेहतर काम नहीं किया। झूठ तो ये भी है कि कोई अखबार छोटा बड़ा होता है। कभी कभी जो कारनामा बेनाम, संघर्षशील और कम संसाधन वाले अखबार दिखा देते हैं वो बड़े-बड़े ब्रांड अखबार नहीं दिखा पाते।
करीब पच्चीस वर्षों से अधिक समय से आधा दर्जन से ज्यादा जाने पहचाने अखबारों से जुड़े लिखाड़ और ईमानदार पत्रकार राकेश मिश्रा की प्रेस मान्यता खत्म हो गई थी। ये जिस ‘प्रभात अखबार में काम कर रहे थे उसका प्रसार कम होने के तकनीकी कारणों से इनकी प्रेस मान्यता बरकरार नहीं रह पायी। फिर पत्रकार मनोज मिश्रा ने इस जुझारू पत्रकार को अपने अखबार से मान्यता दिलवा दी।
दुर्भाग्य से पत्रकार राकेश मिश्रा को मेजर ब्रेन स्ट्रोक पड़ा और डाक्टरों ने साफ कह दिया कि 95% इनके बचने की उम्मीद नहीं है। फिर उन्हें पीजीआई ले जाया गया जहां ये पूरे दो महीने वैंटीलेटर पर रहे। क्योंकि उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति अपने अथक प्रयासों से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए पीजीआई में निशुल्क इलाज करवाने का जीओ बहुत पहले ही करवा चुकी थी। इसलिए राकेश मिश्रा का बारह लाख के सरकारी खर्चे पर बेहतरीन इलाज हुआ। और इस तरह एक ईमानदार और गरीब पत्रकर की ज़िन्दगी बच गई।
एक पत्रकार मित्र का जीवन बचाने के लिए धन्यवाद योगी सरकार।
शुक्रिया उ.प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति।
- नवेद शिकोह







