चौरी-चौरा महोत्सव के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के सहयोग से “सांस्कृतिकी”, लखनऊ विश्वविद्यालय” ने अपनी भाषा अपना देश” विषय पर एक राज्य-स्तरीय काव्य-संध्या का आयोजन सोमवार को मालवीय सभागार, लखनऊ विश्वविद्यालय में किया।
इसमें कुछ शीर्षस्थ कवियों आशीष अनल, डॉ. अखिलेश मिश्र, डॉ. मालविका हरिओम, पंकज प्रसून, हेमंत पाण्डेय एवं अभय सिंह निर्भीक ने कविता-पाठ के लिए प्रतिभाग किया। इस आयोजन के मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. आलोक कुमार राय एवं अध्य्क्ष डॉ.राज नारायण शुक्ल (अध्यक्ष, उप्र भाषा संस्थान) थे। अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में कुलपति ने आयोजक एवं मंच पर उपस्थित प्रसिद्ध कवियों को इस कार्यक्रम में आने के लिए हार्दिक बधाई दी।
उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन विश्वविद्यालय के छात्र एवं छात्राओं के सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं। उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी की कहानी ‘गेहूं और गुलाब’ का स्मरण किया। उन्होंने स्वनिर्मित रचना ‘नियति का निमंत्रण स्वीकार’ का वाचन किया। इसके बाद उन्होंने कवि गोपाल दास नीरज की कविता ‘अब तुम्हारा प्रेम भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसी’ त्रिपुरारी शर्मा द्वारा रचित ‘अनुभव हमेशा अनकहा ही रहता है’ भी सुना कर अपने निश्छल कवि ह्रदय का परिचय दिया।
इसके उपरान्त सांस्कृतिकी के सदस्य अरिंदम ने ‘आयो रे शुभ दिन आयो रे’ पर नृत्य प्रस्तुत किया। तत्पश्चात काव्य संध्या के सूत्रधार पंकज प्रसून ने कार्यक्रम की शुरुआत की और डॉ. मालविका हरिओम को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया, जिन्होंने ‘हमीं ने हल चलाए हैं तो तुमने अन्न पाया है’ का वाचन किया। हेमन्त पांडे- कानपुर ने कुछ कोरोना काल से जुडी हास्य कवितायें सुनाकर सारे श्रोतागण को प्रसन्नचित कर दिया।
डॉ. अखिलेश मिश्रा- वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, कई जिलों के डीएम रह चुके हैं ‘वो जताते रहे इश्क है’ का वाचन किया। पंकज प्रसून ने भी कविता ‘लड़कियां बड़ी लड़ाका होती हैं’ का वाचन किया। आशीष अनल ने भी अपनी वीर रस की कविता का पाठ किया। इस समारोह में विश्वविद्यालय के छात्र एवं छात्राओं ने भी प्रसिद्ध कवियों के बीच में स्वनिर्मित कविताओं का पाठ किया।
इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कई शिक्षक एवं छात्र छात्रों द्वारा उचित सामाजिक दूरी प्रोटोकॉल का पालन करते हुए उपस्थित थे। इसका समापन निदेशक संस्कृत प्रो. राकेश चंद्र और सहायक निदेशक डॉ. प्रशांत शुक्ला की अंतिम टिप्पणी से हुआ।







